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# Viyahapannatti 12.1: Uddeśaka 1: śaṃkha

Viyāhapannatti: Hindi translation (Dīparatnasāgara, 2019) 12.1

- **Language:** Hindi

### Uddeśaka 1: śaṃkha

### [12.1.529](https://indike.org/pramana/in.jaina.sveta.anga.5~hi-deepratnasagar2019.12.1.529)

बारहवें शतक में दस उद्देशक हैं – (१) शंख, (२) जयन्ती, (३) पृथ्वी, (४) पुद्‌गल, (५) अतिपात, (६) राहु, (७) लोक, (८) नाग, (९) देव और (१०) आत्मा।  
शतक – १२ – उद्देशक – १

### [12.1.530](https://indike.org/pramana/in.jaina.sveta.anga.5~hi-deepratnasagar2019.12.1.530)

उस काल और उस समय में श्रावस्ती नगरी थी। कोष्ठक उद्यान था, उस श्रावस्ती नगरी में शंख आदि बहुत – से श्रमणोपासक रहते थे। (वे) आढ्य यावत्‌ अपरिभूत थे; तथा जीव, अजीव आदि तत्त्वों के ज्ञाता थे, यावत्‌ विचरते थे। उस ‘शंख’ श्रमणोपासक की भार्या ‘उत्पला’ थी। उसके हाथ – पैर अत्यन्त कोमल थे, यावत्‌ वह रूपवती एवं श्रमणोपासिका थी, जीव – अजीव आदि तत्त्वों की जानने वाली यावत्‌ विचरती थी। उसी श्रावस्ती नगरीमें पुष्कली नामका श्रमणोपासक रहता था। वह भी आढ्य यावत्‌ जीव – अजीवादि तत्त्वों का ज्ञाता था यावत्‌ विचरता था।  
उस काल और उस समय में महावीर स्वामी श्रावस्ती पधारे। परीषद्‌ वन्दन के लिए गई, यावत्‌ पर्युपासना करने लगी। तत्पश्चात्‌ वे श्रमणोपासक भी, आलभिका नगरी के श्रमणोपासक के समान उनके वन्दन एवं धर्म – कथाश्रवण आदि के लिए गए यावत्‌ पर्युपासना करने लगे। श्रमण भगवान महावीर ने उन श्रमणोपासकों को और महती महापरीषद्‌ की धर्मकथा कही। यावत्‌ परीषद्‌ वापिस चली गई। वे श्रमणोपासक भगवान महावीर के पास धर्मोपदेश सूनकर और अवधारण करके हर्षित और सन्तुष्ट हुए। उन्होंने श्रमण भगवान महावीर को वन्दन – नमस्कार किया, प्रश्न पूछे, तथा उनका अर्थ ग्रहण किया। फिर उन्होंने खड़े होकर श्रमण भगवान महावीर को वन्दन – नमस्कार किया और कोष्ठक उद्यान से नीकलकर श्रावस्ती नगरी की ओर जाने का विचार किया।

### [12.1.531](https://indike.org/pramana/in.jaina.sveta.anga.5~hi-deepratnasagar2019.12.1.531)

उस शंख श्रमणोपासक ने दूसरे श्रमणोपासकों से कहा – देवानुप्रियो ! तुम विपुल अशन, पान, खादिम और स्वादिम तैयार कराओ। फिर हम उस प्रचुर अशन, पान, खाद्य और स्वाद्य का आस्वादन करते हुए, विस्वादन करते हुए, एक दूसरे को देते हुए भोजन करते हुए पाक्षिक पौषध का अनुपालन करते हुए अहोरात्र – यापन करेंगे। इस पर उन श्रमणोपासकों ने शंख श्रमणोपासक की इस बात को विनयपूर्वक स्वीकार किया।  
तदनन्तर उस शंख श्रमणोपासक को एक ऐसा अध्यवसाय यावत्‌ उत्पन्न हुआ – ‘उस विपुल अशन, पान, खाद्य और स्वाद्य का आस्वादन, विस्वादन, परिभाग और परिभोग करते हुए पाक्षिक पौषध (करके) धर्मजागरणा करना मेरे लिए श्रेयस्कर नहीं प्रत्युत अपनी पौषध – शाला में, ब्रह्मचर्यपूर्वक, मणि, सुवर्ण आदि के त्यागरूप तथा माला, वर्णक एवं विलेपन से रहित, और शस्त्र – मूसल आदि के त्यागरूप पौषध का ग्रहण करके दर्भ के संस्तारक पर बैठकर अकेले को ही पाक्षिक पौषध के रूप में धर्मजागरणा करते हुए विचरण करना श्रेयस्कर है।’ इस प्रकार विचार करके वह श्रावस्ती नगरी में जहाँ अपना घर था, वहाँ आया, (और अपनी धर्मपत्नी) उत्पला श्रमणोपासिका से पूछा। फिर पौषधशाला में प्रवेश किया। पौषधशाला का प्रमार्जन किया; उच्चारण – प्रस्रवण की भूमि का प्रति – लेखन किया। डाभ का संस्तारक बिछाया और उस पर बैठा। फिर पौषधशाला में उसने ब्रह्मचर्य यावत्‌ पाक्षिक पौषध पालन करते हुए, (अहोरात्र) यापन किया।  
तत्पश्चात्‌ वे श्रमणोपासक श्रावस्ती नगरी में अपने – अपने घर पहुँचे। और उन्होंने पुष्कल अशन, पान, खाद्य और स्वाद्य तैयार करवाया। एक दूसरे को बुलाया और परस्पर कहने लगे – देवानुप्रियो ! हमने तो पुष्कल अशन, पान, खाद्य और स्वाद्य तैयार करवा लिया; परन्तु शंख श्रमणोपासक अभी तक नहीं आए, देवानुप्रियो ! हमे शंख श्रमणोपासक को बुला लाना श्रेयस्कर है। इसके बाद उस पुष्कली श्रमणोपासक ने कहा – ‘देवानुप्रियो ! तुम सब अच्छी तरह स्वस्थ और विश्वस्त होकर बैठो, मैं शंख श्रमणोपासक को बुलाकर लाता हूँ।’ यों कहकर वह श्रावस्ती नगरी में जहाँ शंख श्रमणोपासक का घर था, वहाँ आकर उसने शंख श्रमणोपासक के घर में प्रवेश किया।  
पुष्कली श्रमणोपासक को आते देखकर, वह उत्पला श्रमणोपासिका हर्षित और सन्तुष्ट हुई। वह अपने आसन से उठी और सात – आठ कदम सामने गई। पुष्कली श्रमणोपासक को वन्दन – नमस्कार किया, और आसन पर बैठने को कहा। फिर पूछा – ‘कहिए, देवानुप्रिय ! आपके आने का क्या प्रयोजन है ?’ पुष्कली श्रमणोपासक ने, उत्पला श्रमणोपासिका से कहा – ‘देवानुप्रिये ! शंख श्रमणोपासक कहाँ है ?’ उत्पला – ‘देवानुप्रिय ! बात ऐसी है कि वह पौषधशाला में पौषध ग्रहण करके ब्रह्मचर्ययुक्त होकर यावत्‌ (धर्मजागरणा कर) रहे हैं। तब वह पुष्कली श्रमणोपासक, जिस पौषधशाला में शंख श्रमणोपासक था, वहाँ उसके पास आया और उसने गमनागमन का प्रतिक्रमण किया। फिर शंख श्रमणोपासक को वन्दन – नमस्कार करके बोला – ‘देवानुप्रिय ! हमने वह विपुल अशन, पान, खादिम और स्वादिम आहार तैयार करा लिया है। अतः देवानुप्रिय ! अपन चलें और वह विपुल अशनादि आहार एक दूसरे को देते और उपभोगादि करते हुए पौषध करके रहें। शंख श्रमणोपासक ने पुष्कली श्रमणो – पासक से कहा – ‘देवानुप्रिय ! मेरे लिए उस विपुल अशन, पान, खाद्य और स्वाद्य का उपभोग आदि करते हुए पौषध करना कल्पनीय नहीं है। मेरे लिए पौषधशाला में पौषध अंगीकार करके यावत्‌ धर्मजागरणा करते हुए रहना कल्पनीय है। अतः हे देवानुप्रिय ! तुम सब अपनी ईच्छानुसार उस विपुल अशन, पान, खाद्य और स्वाद्य आहार का उपभोग आदि करते हुए यावत्‌ पौषध का अनुपालन करो।  
तदनन्तर वह पुष्कली श्रमणोपासक, शंख श्रमणोपासक की पौषधशाला से लौटा और श्रावस्ती नगरी के मध्य में से होकर, जहाँ वे (साथी) श्रमणोपासक थे, वहाँ आया। फिर उन श्रमणोपासकों से बोला – शंख श्रमणो – पासक निराहार – पौषधव्रत अंगीकार करके स्थित है। उसने कह दिया कि ‘देवानुप्रियो ! तुम सब स्वेच्छानुसार उस विपुल अशनादि आहार को परस्पर देते हुए यावत्‌ उपभोग करते हुए पौषध का अनुपालन करो। शंख श्रमणो – पासक अब नहीं आएगा।’ यह सूनकर उन श्रमणोपासकों ने उस विपुल अशन – पान – खाद्य – स्वाद्यरूप आहार को खाते – पीते हुए यावत्‌ पौषध करके धर्मजागरणा की।  
इधर उस शंख श्रमणोपासक को पूर्वरात्रि व्यतीत होने पर, पिछली रात्रि के समय में धर्मजागरिकापूर्वक जागरणा करते हुए इस प्रकार का अध्यवसाय यावत्‌ उत्पन्न हुआ – ‘कल प्रातःकाल यावत्‌ जाज्वल्यमान सूर्योदय होने पर मेरे लिए यह श्रेयस्कर है कि श्रमण भगवान महावीर को वन्दना – नमस्कार करके यावत्‌ उनकी पर्युपासना करके वहाँ से लौट कर पाक्षिक पौषध पारित करूँ। प्रातःकाल सूर्योदय होने पर अपनी पौषधशाला से बाहर नीकला। शुद्ध एवं सभा में प्रवेश करने योग्य मंगल वस्त्र ठीक तरह से पहने, और अपने घर से चला। वह पैदल चलता हुआ श्रावस्ती नगरी के मध्य में होकर भगवान की सेवा में पहुँचा, यावत्‌ उनकी पर्युपासना करने लगा। वहाँ अभिगम नहीं (कहना चाहिए)। तदनन्तर वे सब श्रमणोपासक, (दूसरे दिन) प्रातःकाल यावत्‌ सूर्योदय होने पर स्नानादि (नित्यकृत्य) करके यावत्‌ शरीर को अलंकृत करके अपने – अपने घरों से नीकले और एक स्थान पर मिले। फिर सब मिलकर पूर्ववत्‌ भगवान की सेवा में पहुँचे, यावत्‌ पर्युपासना करने लगे।  
भगवान महावीर ने उन श्रमणोपासकों और उस महती महापरीषद्‌ को यावत्‌ – धर्मदेशना दी। बाद वे सभी श्रमणोपासक श्रमण भगवान महावीर से धर्म श्रवण कर और हृदय में अवधारणा करके हर्षित एवं सन्तुष्ट हुए। फिर उन्होंने खड़े होकर श्रमण भगवान महावीर को वन्दन – नमस्कार किया। तदनन्तर वे शंख श्रमणोपासक के पास आए और कहने लगे – देवानुप्रिय! कल आपने ही हमें कहा था कि ‘‘देवानुप्रियो ! तुम प्रचूर अशनादि तैयार करवाओ, हम आहार देते हुए यावत्‌ उपभोग करते हुए पौषध का अनुपालन करेंगे। किन्तु फिर आप आए नहीं और आपने अकेले ही पौषधशाला में यावत्‌ निराहार पौषध कर लिया। अतः देवानुप्रिय ! आपने हमारी अच्छी अवहेलना की!’’ भगवान महावीर ने उन श्रमणोपासकों से कहा – ‘आर्यो ! तुम श्रमणोपासक शंख की हीलना, निन्दा, कोसना, गर्हा और अवमानना मत करो। क्योंकि शंख श्रमणोपासक प्रियधर्मा और दृढ़धर्मा है। इसने सुदर्शन नामक जागरिका की है।

### [12.1.532](https://indike.org/pramana/in.jaina.sveta.anga.5~hi-deepratnasagar2019.12.1.532)

गौतम स्वामी ने श्रमण भगवान महावीर स्वामी को वन्दन – नमस्कार किया और पूछा – भगवन्‌ ! जागरिका कितने प्रकार की है ? गौतम ! जागरिका तीन प्रकार की कही गई है, यथा – वृद्ध – जागरिका, अबुद्ध – जागरिका और सुदर्शन – जागरिका। भगवन्‌ ! किस हेतु से कहा जाता है ? गौतम ! जो उत्पन्न हुए केवलज्ञान – केवलदर्शन के धारक अरिहंत भगवान हैं, इत्यादि स्कन्दक – प्रकरण के अनुसार जो यावत्‌ सर्वज्ञ, सर्वदर्शी हैं, वे बुद्ध हैं, वे बुद्ध – जागरिका करते हैं, जो ये अनगार भगवंत ईर्यासमिति, भाषासमिति आदि पाँच समितियों और तीन गुप्तियों से युक्त यावत्‌ गुप्त ब्रह्मचारी हैं, वे अबुद्ध हैं। वे अबुद्ध – जागरिका करते हैं। जो ये श्रमणोपासक, जीव – अजीव आदि तत्त्वों के ज्ञाता यावत्‌ पौषधादि करते हैं, वे सुदर्शन – जागरिका करते हैं। इसी कारण से, हे गौतम ! तीन प्रकार की जागरिका यावत्‌ सुदर्शन – जागरिका कही गई है।

### [12.1.533](https://indike.org/pramana/in.jaina.sveta.anga.5~hi-deepratnasagar2019.12.1.533)

इसके बाद उस शंख श्रमणोपासक ने श्रमण भगवान महावीर को वन्दन – नमस्कार किया और पूछा – ‘भगवन्‌! क्रोध के वश – आर्त्त बना हुआ जीव कौन – से कर्म बाँधता है ? क्या करता है ? किसका चय करता है और किसका उपचय करता है ? शंख ! क्रोधवश – आर्त्त बना हुआ जीव आयुष्यकर्म को छोड़कर शेष सात कर्मों की शिथिल बन्धन से बंधी हुई प्रकृतियों को गाढ़ बन्धन वाली करता है, इत्यादि प्रथम शतक में असंवृत अनगार के वर्णन के समान यावत्‌ वह संसार में परिभ्रमण करता है, यहाँ तक जान लेना। भगवन्‌ ! मान – वश – आर्त्त बना हुआ जीव क्या बाँधता है ? इत्यादि पूर्ववत्‌ प्रश्न। क्रोधवशार्त्त जीवविषयक कथन के अनुसार जान लेना। इसी प्रकार माया – वशार्त्त जीव, तथा लोभावशार्त्त जीव के विषय में भी, यावत्‌ – संसार में परिभ्रमण करता है, यहाँ तक जानना। श्रमण भगवान महावीर से यह फल सूनकर और अवधारण करके वे श्रमणोपासक उसी समय भयभीत, त्रस्त, दुःखित एवं संसारभय से उद्विग्न हुए। उन्होंने श्रमण भगवान महावीर को वन्दन – नमस्कार किया और जहाँ शंख श्रमणोपासक था, वहाँ उसके पास आए। शंख श्रमणोपासक को उन्होंने वन्दन – नमस्कार किया और फिर अपने उस अविनयरूप अपराध के लिए विनयपूर्वक बार – बार क्षमायाचना करने लगे। इसके पश्चात्‌ उन सभी श्रमणो – पासकों ने भगवान से कईं प्रश्न पूछे, इत्यादि सब वर्णन आलभिका के (श्रमणोपासकों के) समान जानना चाहिए, यावत्‌ वे अपने – अपने स्थान पर लौट गए  
भगवान गौतम ने श्रमण भगवान महावीर को वन्दन – नमस्कार करके पूछा – भगवन्‌ ! क्या शंख श्रमणो – पासक आप देवानुप्रिय के पास प्रव्रजित होने में समर्थ है? गौतम ! यह अर्थ समर्थ नहीं है; इत्यादि समस्त वर्णन ऋषिभद्रपुत्र श्रमणोपासक के समान कहना, यावत्‌ सर्व दुःखों का अन्त करेगा। ‘हे भगवन्‌ ! यह इसी प्रकार है। यह इसी प्रकार है।’

## Translations (2)

- [Viyāhapannatti: Gujarati translation (Dīparatnasāgara, 2020)](https://indike.org/pramana/in.jaina.sveta.anga.5~gu-deepratnasagar2020.12.1.529) — Gujarati
- [English (machine translation)](https://indike.org/pramana/in.jaina.sveta.anga.5~en-mt.12.1.529) — English, machine translation

## Commentaries (2)

- [Viyāhapannatti: ṭīkānusārī vivecana](https://indike.org/pramana/in.jaina.sveta.anga.5!deepratnasagar.785) — Muni Dīparatnasāgara 2000, Gujarati
- [Bhagavatīvṛtti](https://indike.org/pramana/in.jaina.sveta.anga.5!abhayadeva.v6.p54) — Abhayadeva Sūri, Sanskrit

## Linked texts (1)

- [Viyāhapannatti](https://indike.org/pramana/in.jaina.sveta.anga.5.12.1.529) — Sudharman, Ardhamāgadhī Prakrit

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Source: [https://indike.org/pramana/in.jaina.sveta.anga.5~hi-deepratnasagar2019.12.1](https://indike.org/pramana/in.jaina.sveta.anga.5~hi-deepratnasagar2019.12.1) · Pramāṇa
