भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c23: १७—वट्टेलुत्तु लिपि
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c23
- Language
- Hindi
१७—वट्टेलुत्तु लिपि
c23.1
ई. स. की सातवीं शताब्दी के अन्त के आसपास से (लिपिपत्र ६३ से ६४).
c23.2
४ ऍ. इं; जि. ७, पृ. १९४ के पास के प्लेट (लेखसंख्या २७) से.
c23.3
यह लिपि तामिळ लिपि का घसीट रूप ही है और इसके अक्षर बहुधा गोलाई लिये हुए या ग्रंथिदार होते हैं. इसका प्रचार मद्रास इहाते के पश्चिमी तट तथा सब से दक्षिणी विभाग में ई. स. की ७ वीं शताब्दी के अंत के आसपास से चोल, पांड्य आदि वहां के राजवंशों के शिलालेखों और दानपत्रों में मिलता है. कुछ समय से इसका व्यवहार बिलकुल उठ गया है.
c23.4
७ ऍ. इं; जि. ३, पृ. ७२ के पास के प्लेट के नीचे के भाग से.
c23.5
लिपिपत्र ६३ वां.
c23.6
३ ऍ. इं; जि. ९, पृ. २३२ के पास के प्लेट से.
c23.7
यह लिपिपत्र जटिलवर्मन् के समय के आणैमले के शिलालेख९, उसी राजा के दानपत्र१० और वरगुणपांड्य के अंबासमुद्रम् के लेख११ से तय्यार किया गया है. आणैमले के लेख का ‘अ’ और ‘आ’ कूरम के दानपत्र (लिपिपत्र ६०) के उक्त अक्षरों के कुछ विकृत और घसीट रूप हैं. मुख्य अंतर
c23.8
१ ऍ. इं; जि. ७, पृ. १४४ के पास के प्लेट, लेख G से.
c23.9
६ लिपिपत्र ६२ में वाकलकायम छप गया है जिसको शुद्ध कर पाठक वालककायम पढ़ें.
c23.10
९ ऍ. इं; जि. ८, पृ. ३२० के पास के प्लेट, लेख दूसरे से.
c23.11
१० इं. ऍ; जि. २२, पृ. ७० और ७१ के बीच के प्लेटों से.
c23.12
११ ऍ. इं; जि. ६, पृ. ९० के पास के प्लेट से.
c23.13
यही है कि बाहर की ग्रंथि भीतर की ओर बनी है. 'इ' कूरम के दानपत्र के 'इ' के नीचे के अंश को बाईं ओर न मोड़ कर दाहिनी ओर मोड़ने और घसीट लिखने से बना हो ऐसा प्रतीत होता है. उ, क, ङ, च, ञ, ट, ण, त, न, प, म, य, र, ल, व, ळ और ऱ लिपिपत्र ६० में दिये हुए उक्त अक्षरों के घसीट रूप ही हैं. जटिलवर्मन् के दानपत्र का 'ई' प्राचीन तासिळ 'ई' (देखो, लिपिपत्र ६२) का घसीट रूप मात्र है. 'ए' और 'ओ' लिपिपत्र ६० में दिये हुए उक्त अक्षरों के ही ग्रंथिवाले या घसीट रूप हैं.
c23.14
लिपिपत्र ६४ वां.
c23.15
यह लिपिपत्र मांबळ्ळि से मिले हुए श्रीवल्लभगौडे के कोल्लम् (कौलंब) संवत् १४६ (ई. स. ६७३) के दानपत्र१, कोचीन से मिले हुए भास्कररववर्मन् के दानपत्र२ और कोट्टयम् से मिले हुए वीरराघव के दानपत्र३ से तय्यार किया गया है. इसकी लिपि में लिपिपत्र ६३ की लिपि से जो कुछ अंतर पाया जाता है वह त्वरा से लिखे जाने के कारण ही समयानुसार हुआ है. कोट्टयम् के दानपत्र में जो ई. स. की १४ वीं शताब्दी के आसपास का माना जा सकता है, 'ए' ओर 'ओ' के दीर्घ और ह्रस्व रूप मिलते हैं. वर्तमान कनड़ी, तेलुगु, मलयाळम् और तामिळ लिपियों में भी 'ए' और 'ओ' के दो दो रूप अर्थात् ह्रस्व और दीर्घ मिलते हैं, परंतु १४वीं शताब्दी के आसपास तक के तेलुगु-कनड़ी, ग्रंथ और तामिळ लिपियों के लेखों में यह भेद नहीं मिलता; पहिले पहिल यह वीरराघव के दानपत्र में ही पाया जाता है. अतएव संभव है कि इस भेद का ई. स. की १४ वीं शताब्दी के आसपास तामिळ लिपि में प्रारंभ हो कर दूसरी लिपियों में उसका अनुकरण पीछे से हुआ हो. नागरी लिपि में 'ए' और 'ओ' में ह्रस्व और दीर्घ का भेद नहीं है इस लिये हमने 'ए' और 'ओ' के ऊपर आड़ी लकीर लगा कर उनको दीर्घ 'ए̄' और दीर्घ 'ओ̄' के सूचक बनाया है.
Linked texts (8)
- Mayidavōlu plates, time of Śiva-Skandavarman, year 10 — Prakrit
- Epigraphia Indica
- Benares copper-plate inscription of Karṇadeva. The [Chedi] year 793 — Sanskrit
- Salotgi pillar inscription of the Mahāmaṇḍaleśvara Govuṇarasa (C) — Kannada
- Anaimalai Inscription, No. II — Tamil
- Jambukeśvara Inscription of Vālaka-Kāmaya. Śaka-Saṁvat 1403 — Tamil
- Inscription of Vijaya-Kampavikramavarman (ed. Hultzsch 1903) — Tamil
- Kariyamāṇikka-Perumāḷ temple at Vijayamaṅgalam inscription of Rājakēsarivarman Vīra-Pāṇḍya — Tamil