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# भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c24: १८—खरोष्ठी लिपि

भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c24

- **Language:** Hindi

### १८—खरोष्ठी लिपि

### [c24.1](https://indike.org/pramana/ins.epigraphy.ojha-1894.c24.1)

ई. स. पूर्व की चौथी शताब्दी से ई. स. की तीसरी शताब्दी तक (लिपिपत्र ६५ से ७०).

### [c24.2](https://indike.org/pramana/ins.epigraphy.ojha-1894.c24.2)

खरोष्ठी लिपि आर्य लिपि नहीं, किंतु अनार्य (सेमिटिक) अरमइक लिपि से निकली हुई प्रतीत होती है (देखो, ऊपर पृ. ३४-३६). जैसे मुसलमानों के राज्यसमय में ईरान की फ़ारसी लिपि का हिंदुस्तान में प्रवेश हुआ और उसमें कुछ अक्षर और मिलाने से हिंदी भाषा के मामूली पढ़े लिखे लोगों के लिये काम चलाऊ उर्दू लिपि बनी वैसे ही जब ईरानियों का अधिकार पंजाब के कुछ अंश पर हुआ तब उनकी राजकीय लिपि अरमइक का वहां प्रवेश हुआ, परंतु उसमें केवल २२ अक्षर, जो आर्य भाषाओं के केवल १८ उच्चारणों को व्यक्त कर सकते थे, होने तथा स्वरों में ह्रस्व दीर्घ का भेद और स्वरों की मात्राओं के न होने के कारण यहां के विद्वानों में से खरोष्ठ या किसी और ने

### [c24.3](https://indike.org/pramana/ins.epigraphy.ojha-1894.c24.3)

१ ऐपि. इंडि; जि. ६, पृ. २३६ के पास के प्लेट से.

### [c24.4](https://indike.org/pramana/ins.epigraphy.ojha-1894.c24.4)

२ ऐपि. इंडि; जि. ३, पृ. ७२ के पास के प्लेट के ऊपरी अंश से.

### [c24.5](https://indike.org/pramana/ins.epigraphy.ojha-1894.c24.5)

३ ऐपि. इंडि; जि. ४, पृ. २६६ के पास के प्लेट से.

### [c24.6](https://indike.org/pramana/ins.epigraphy.ojha-1894.c24.6)

नये अक्षरों तथा ह्रस्व स्वरों की मात्राओं की योजना कर मामूली पढ़े हुए लोगों के लिये; जिनको शुद्धा-शुद्ध की विशेष आवश्यकता नहीं रहती थी, काम चलाऊ लिपि बना दी (देखो, ऊपर पृ. ३५-३६). यह लिपि फ़ारसी की नांई दाहिनी ओर से बाईं ओर लिखी जाती है और आ, ई, ऊ, ऋ, ऐ और औ स्वर तथा उनकी मात्राओं का इसमें सर्वथा अभाव है. संयुक्त व्यंजन भी बहुत कम मिलते हैं, जिनमें भी कितने एक में तो उनके घटक व्यंजनों के अलग अलग रूप स्पष्ट नहीं होते किंतु उनका एक विलक्षण ही रूप मिलता है, जिससे कितने एक संयुक्त व्यंजनों का पढ़ना अभी तक संशययुक्त ही है. इसके लेख भारतवर्ष में विशेष कर पंजाब से ही मिले हैं अन्यत्र बहुत कम. यह लिपि ईरानियों के राजत्वकाल के कितने एक चांदी के मोटे और भद्दे सिक्कों, मौर्यवंशी राजा अशोक के शहबाज़गढ़ी और मानसेरा के चटानों पर खुदे हुए लेखों, एवं शक, क्षत्रप, पार्थिअन और कुशनवंशी राजाओं के समय के बौद्ध लेखों और बाकट्रियन ग्रीक, शक, छत्रप, पार्थिअन, कुशन, औदुंबर आदि राजवंशों के कितने एक सिक्कों पर या भोजपत्रों पर लिखे हुए प्राकृत पुस्तकों में मिलती है. इस लिपि के शिलाओं आदि पर खुदे हुए लेखों की, जो अब तक मिले हैं, संख्या बहुत कम१ है. ई. स. की तीसरी शताब्दी के आस पास तक इस लिपि का कुछ न कुछ प्रचार पंजाब की तरफ़ बना रहा जिसके बाद यह इस देश से सदा के लिये उठ गई और इसका स्थान ब्राह्मी ने ले लिया (विशेष वृत्तान्त के लिये देखो, ऊपर पृ. ३१-३७).

### [c24.7](https://indike.org/pramana/ins.epigraphy.ojha-1894.c24.7)

१ खरोष्ठी लिपि के लेखों के लिये देखो ऊपर पृष्ठ ३२, टिप्पण ७-६, और पृष्ठ ३३, टिप्पण १-२.

### [c24.8](https://indike.org/pramana/ins.epigraphy.ojha-1894.c24.8)

लिपिपत्र ६५ वां.

### [c24.9](https://indike.org/pramana/ins.epigraphy.ojha-1894.c24.9)

यह लिपिपत्र मौर्यवंशी राजा अशोक के शहबाज़गढ़ी और मानसेरा के लेखों२ से तय्यार किया गया है. उक्त लेखों से दिये हुए अक्षरों में सब स्वर ‘अ’ के साथ स्वरों की मात्रा लगा कर ही बनाये हैं और कितने एक अक्षरों की बाईं ओर झुकी हुई खड़ी लकीर के नीचे के अंत को मोड़ कर कुछ ऊपर की ओर बढ़ाया है \[देखो, ‘अ’ (तीसरा), ‘ख’ (दूसरा), ‘ग’ (दूसरा), ‘च’ (तीसरा), ‘ढ’ (दूसरा), ‘न’ (चौथा), ‘प’ (दूसरा), ‘फ’ (दूसरा), ‘ब’ (तीसरा), ‘र’ (तीसरा), ‘व’ (दूसरा), और ‘श’ (दूसरा)\]. ‘ज’ (दूसरे) की खड़ी लकीर के नीचे एक आड़ी लकीर और जोड़ी है. ‘म’ (चौथे) की बाईं ओर अपूर्ण वृत्त और ‘म’ (पांचवें) के नीचे के भाग में तिरछी लकीर अधिक लगाई है. ‘र’ (दूसरे) की तिरछी खड़ी लकीर के नीचे के अंत से दाहिनी ओर एक आड़ी लकीर३ और लगाई है. यह लकीर संयुक्ताक्षर में दूसरे आनेवाले ‘र’ का चिह्न है परंतु उक्त लेखों में कहीं कहीं यह लकीर बिना आवश्यकता के भी लगी हुई मिलती है और वर्डक से मिले हुए पीतल के पात्र पर के लेख में तो इसकी भरमार पाई जाती है जो उक्त लेखों के लेखकों का शुद्ध लिखना न जानना प्रकट करती है४. इन लेखों में ‘इ’ की मात्रा एक खड़ी या तिरछी

### [c24.10](https://indike.org/pramana/ins.epigraphy.ojha-1894.c24.10)

२ पं. इं; जि. १, पृ. १६ के पास का सेट. ज. ए; ई. स. १८६० में छपे हुए प्रसिद्ध फ्रेंच विद्वान् सेनार्ट के ‘नोट्स डी’ एपिग्राफे इंडियन्ने’ (संख्या १) नामक लेख के अंत के मानसेरा के लेखों के २ सेट; और ‘डाइरेक्टर जनरल ऑफ़ आर्किऑलॉजी इन इंडिया’ के भेजे हुए अशोक के शहबाज़गढ़ी के लेखों के फ़ोटो से.

### [c24.11](https://indike.org/pramana/ins.epigraphy.ojha-1894.c24.11)

३ पं. इं; जि. २, पृ. १६ के पास के सेट की पंक्ति १ में ‘देवनं प्रियो प्रियद्रशि रज’ में ‘रय’ के ‘र’ के नीचे ‘र’ की सूचक जो आड़ी लकीर लगी है वह बिलकुल स्पष्ट है. यहां ‘र’ के साथ दूसरा ‘र’ जुड़ ही नहीं सकता. ऐसी दशा में इस लकीर को या तो ‘र’ का अंश ही या निरर्थक मानना पड़ता है. अशोक के उक्त लेखों में ऐसी ही ‘र’ सूचक निरर्थक लकीरें अन्यत्र जहां ‘र’ की संभावना नहीं है वहां भी लगी हुई मिलती है (जैसे कि उक्त पहिली पंक्ति में ‘सवप्रषंडनि’ में ‘प’ के साथ, जहां ‘पषंड’ (पाषंड) शब्द में ‘र’ का सर्वथा अभाव है, आदि).

### [c24.12](https://indike.org/pramana/ins.epigraphy.ojha-1894.c24.12)

४ अब तक राजपूताना के कई महाजन लोग, जिनको अक्षरों का ही ज्ञान होता है और जो संयुक्ताक्षर तथा स्वरों की मात्राओं का शुद्ध लिखना नहीं जानते, अपनी लिखावट में ऐसी अशुद्धियां करने के अतिरिक्त स्वरों की मात्राएं या तो बिलकुल नहीं लगाते अथवा बिना किसी विचार के उनका प्रयोग करते हैं अर्थात् जहां मात्रा की आवश्यकता नहीं होती वहां कोई भी मात्रा लगा देते हैं और जहां मात्रा की अपेक्षा रहती है वहां उसे या तो छोड़ जाते हैं या अशुद्ध मात्रा लगा देते हैं. ऐसी लिखावटों के अक्षरों को राजपूतानावाले 'केवळां अक्षर' (केवल अक्षर संकेत) कहते हैं और पुरानी महाजनी लिखावटें विशेष कर ऐसी ही मिलती हैं. ऐसी लिखावटों से ही 'काकाजी अजमेर गया' (ककज अजमर गय) के स्थान में 'काकाजी आज मर गया' पढ़े जाने की कथा प्रसिद्ध है.

### [c24.13](https://indike.org/pramana/ins.epigraphy.ojha-1894.c24.13)

लकीर है जो अक्षर के ऊपर के भाग या मध्य को काटती हुई लगती है (देखो, इ, कि, गि, चि, जि, ठि, णि, ति, मि, शि और सि). 'उ' की मात्रा सीधी आड़ी या घुमावदार लकीर है जो अक्षर के नीचे के अंत (या कभी कुछ ऊंचे) से बाईं ओर जुड़ती है (देखो, उ, गु, चु, तु, धु, नु, यु, बु और हु). 'ए' की मात्रा एक तिरछी या खड़ी लकीर है जो बहुधा अक्षर के ऊपर के भाग के साथ और कभी कभी मध्य में ऊपर की तरफ़ जुड़ती है (देखो, ए, जे, ते, ने, दे, ये और षे). 'ओ' की मात्रा एक तिरछी रेखा है जो बहुधा अक्षर के मध्य से बाईं ओर को झुकती हुई लगती है (देखो, ओ, चो, नो, मो और सो, परंतु 'यो' में उसका झुकाव दाहिनी ओर है). अनुस्वार का चिह्न एक आड़ी सीधी या वक्र रेखा है जो बहुधा अक्षर के अंत भाग से सटी रहती है (देखो, अं, थं, रं, वं और षं) परंतु कभी कभी अक्षर की खड़ी लकीर के अंत से कुछ ऊपर उक्त खड़ी लकीर को काटती हुई भी लगती है (देखो, ञं, नं और हं). 'मं' (प्रथम) के साथ का अनुस्वार का चिह्न 'म' से विलग नीचे को लगा है, 'मं' (दूसरे) में दाहिनी ओर भिन्न रूप में जुड़ा है और 'यं' के साथ उसके दो विभाग करके 'य' की नीचे को झुकी हुई दोनों तिरछी रेखाओं के अंतों में एक एक जोड़ा है. इन लेखों में रेफ कहीं नहीं है. रेफ को या तो संयुक्ताक्षर का दूसरा अक्षर बनाया है (जैसे कि 'सर्व' को 'सव्र') या उसको पूर्व के अक्षर के नीचे 'र' के रूप से जोड़ा है ('प्रियदर्शी' को 'प्रियद्रशि', 'धर्म' को 'ध्रम' आदि). संयुक्ताक्षर में दूसरे 'र' के लिये एक आड़ी, तिरछी या कुछ गोलाईदार लकीर है जो व्यंजन के नीचे के अंत के साथ दाहिनी ओर जुड़ती है, परंतु कहीं कहीं 'र' का योग न होने पर भी ऐसी लकीर अधिक जुड़ी हुई मिलती१ है जिससे यह संदेह रह जाता है कि कहां यह अनावश्यक है और कहां ठीक है ('प्रियद्रशि पढ़ें या 'पियदशि'; 'सव्रप्रषंडनि' या 'सवपषंडनि' आदि). संयुक्ताक्षरों में कहीं कहीं भिन्न वर्षों के रूप स्पष्ट नहीं हैं (देखो, न्त्रि).

### [c24.14](https://indike.org/pramana/ins.epigraphy.ojha-1894.c24.14)

१ देखो, ऊपर पृष्ठ ६८ टिप्पण ३.

### [c24.15](https://indike.org/pramana/ins.epigraphy.ojha-1894.c24.15)

देवनं प्रियो प्रियद्रशि रथ सव्रप(प)षंडनि गृहठनि  
च पुजेति दनेन विविधये च पुजये नो चु त-  
थ दन व पुज व देवनं प्रियो मञति यथ कि-  
ति सलवढि सिय सव्रप्र(प)षंडनं सलवढि तु

### [c24.16](https://indike.org/pramana/ins.epigraphy.ojha-1894.c24.16)

लिपिपत्र ६६ वां.

### [c24.17](https://indike.org/pramana/ins.epigraphy.ojha-1894.c24.17)

यह लिपिपत्र ग्रीक (यूनानी), शक, पार्थिअन और कुशनवंशी राजाओं के सिक्कों३ से तय्यार किया गया है. ग्रीकों के सिक्कों से लिये हुए अक्षरों में कहीं कहीं 'त', 'द' और 'न' में स्पष्ट

### [c24.18](https://indike.org/pramana/ins.epigraphy.ojha-1894.c24.18)

२ ये मूल पंक्तियां अशोक के शाहबाज़गढ़ी के लेख से हैं (एं. इं; जि. १ पृष्ठ १६ के पास के सेट से).

### [c24.19](https://indike.org/pramana/ins.epigraphy.ojha-1894.c24.19)

३ ग्रीकों (यूनानियों) के सिक्के—गा; कँ. कॉ. ग्री. सी. किं. बा. ई; सेट ४-१५. सि; कँ. कॉ. इं. स्यु; प्लेट १-६. व्हा; कँ. कॉ. पं. स्यु; प्लेट १-६. शक, पार्थिअन और कुशनवंशियों के सिक्के—गा; कँ. कॉ. ग्री. सी. किं. बा. ई; प्लेट १६-२४. सि; कँ. का. इं. स्यु; प्लेट ८-६. व्हा; कँ. कॉ. पं. स्यु; प्लेट १०-१७.

### [c24.20](https://indike.org/pramana/ins.epigraphy.ojha-1894.c24.20)

अंतर नहीं है (देखो, ‘त’ का चौथा रूप, ‘द’ का दूसरा रूप और ‘न’ का तीसरा रूप). कहीं कहीं ‘म’ के नीचे आड़ी लकीर या बिंदी और ‘ह’ के नीचे भी बिंदी लगी मिलती है. ‘र्श्व’ के साथ के रेफ को अक्षर के नीचे लगाया है परंतु उसको ग्रंथि का सा रूप देकर संयुक्ताक्षर में आनेवाले दूसरे ‘र’ से भिन्न बतलाने का यत्न पाया जाता है और शक, पार्थिअन आदि के सिक्कों में यह भेद अधिक स्पष्ट किया हुआं मिलता है (देखो ‘र्व’). शक, पार्थिअन आदि के सिक्कों से जो मुख्य मुख्य अक्षर ही लिये गये हैं उनमें कई अक्षरों की लकीरों के प्रारंभ या अंत में ग्रंथियां लगाई हैं वे, संभव है कि, अक्षरों में सुंदरता लाने के लिये ही हों. ‘फ’ की ऊपर की दाहिनी ओर की लकीर नीचे की ओर नहीं किंतु ऊपर की तरफ़ बढ़ाई है.

### [c24.21](https://indike.org/pramana/ins.epigraphy.ojha-1894.c24.21)

लिपिपत्र ६६वें की मूल पंक्तियों१ का नागरी अक्षरांतर—

### [c24.22](https://indike.org/pramana/ins.epigraphy.ojha-1894.c24.22)

१ ये मूल पंक्तियां ग्रीक आदि राजाओं के सिक्कों पर के लेखों से हैं.

### [c24.23](https://indike.org/pramana/ins.epigraphy.ojha-1894.c24.23)

महरजस ध्रमिकस हेलियिक्रेयस. महरजस ध्रमिकस जयधरस  
अर्खेबियस. महरजस चतरस मेनद्रस. महरजस अपडिहतस  
फिलसिनस. महरजस चतरस अयंतस हिपुस्त्रतस. महरजस  
चतरस हेरमग्रस. रजतितजस महतस मोअस. महरजस रजरजस  
महतस अयसं. महरजस रअरजस महतस अयिलिषस.

### [c24.24](https://indike.org/pramana/ins.epigraphy.ojha-1894.c24.24)

लिपिपत्र ६७ वां.

### [c24.25](https://indike.org/pramana/ins.epigraphy.ojha-1894.c24.25)

यह लिपिपत्र क्षत्रप राजुल के समय के मथुरा से मिले हुए सिंहाकृतिवाले स्तंभसिरे के लेखों२, तक्षशिला से मिले हुए क्षत्रप पतिक के ताम्रलेख३ और वहीं से मिले हुए एक पत्थर के पात्रपर के लेख४ से तय्यार किया गया है. इस लिपिपत्र के अक्षरों में ‘उ’ की मात्रा का रूप ग्रंथि बनाया है और ‘न’ तथा ‘ण’ में बहुधा स्पष्ट अंतर नहीं पाया जाता. मथुरा के लेखों में कहीं कहीं ‘त’, ‘न’ तथा ‘र’ में भी स्पष्ट अंतर नहीं है.

### [c24.26](https://indike.org/pramana/ins.epigraphy.ojha-1894.c24.26)

२ \*एं. इं.\*; जि. ६, पृष्ठ १३६ और १४६ के बीच के प्लेटों से.

### [c24.27](https://indike.org/pramana/ins.epigraphy.ojha-1894.c24.27)

३ \*एं. इं.\*; जि. ४, पृष्ठ ५६ के पास के प्लेट से. इस ताम्रलेख में अक्षर रेखारूप में नहीं खुदे हैं किंतु बिंदियों से बनाये हैं. राजपूताने में ई. स. की १४ वीं शताब्दी के बाद के कुछ ताम्रपत्र ऐसे ही बिंदियों से खुदे हुए भी देखने में आये जिनमें से सब से पिछला २० वर्ष पहिले का है. कई तांबे और पीतल के बरतनों पर उनके मालिकों के नाम इसी तरह बिंदियों से खुदे हुए भी देखने आते हैं. ताम्रपत्रादि बहुधा सुनार या लुहार खोदते हैं. उनमें जो अच्छे कारीगर होते हैं वे तो जैसे अक्षर स्याही से लिखे होते हैं वैसे ही खोद लेते हैं परंतु जो अच्छे कारीगर नहीं होते या ग्रामीण होते हैं वे ही बहुधा स्याही से लिखे हुए अक्षरों पर बिंदियां बना देते हैं. यह त्रुटि खोदनेवाले की कारीगरी की ही है.

### [c24.28](https://indike.org/pramana/ins.epigraphy.ojha-1894.c24.28)

४ \*एं. इं.\*; जि. ८, पृष्ठ २४६ के पास के प्लेट से.

### [c24.29](https://indike.org/pramana/ins.epigraphy.ojha-1894.c24.29)

लिपिपत्र ६७वें की मूल पंक्तियों का नागरी अक्षरांतर—

### [c24.30](https://indike.org/pramana/ins.epigraphy.ojha-1894.c24.30)

सिहिलेन५ सिहरक्षितेन च भ्रातरेहि तखशिलए अयं थुवो प्र-  
तिष्ठवितो सवबुधन पुयए६ \*तखशिलये नगरे उत-  
रेण प्रचु देशो क्षेम नम अच\* ७ये पतिको अप्रतिठवित

### [c24.31](https://indike.org/pramana/ins.epigraphy.ojha-1894.c24.31)

५ ‘सिहिलेन’ से लगाकर ‘पुयए’ तक के लेख में तीन बार ‘ण’ या ‘न’ आया है जिसको दोनों ही तरह पढ़ सकते हैं, क्योंकि उस समय के आसपास के खरोष्ठी लिपि के कितने एक लेखों में ‘न’ और ‘ण’ में स्पष्ट भेद नहीं पाया जाता.

### [c24.32](https://indike.org/pramana/ins.epigraphy.ojha-1894.c24.32)

६ यहां तक का लेख तक्षशिला के पत्थर के पात्र से है.

### [c24.33](https://indike.org/pramana/ins.epigraphy.ojha-1894.c24.33)

७ यहां से लगाकर अंत तक का लेख तक्षशिला से मिले हुए ताम्रलेख से लिया है.

### [c24.34](https://indike.org/pramana/ins.epigraphy.ojha-1894.c24.34)

लिपिपत्र ६८ वां.

### [c24.35](https://indike.org/pramana/ins.epigraphy.ojha-1894.c24.35)

यह लिपिपत्र पार्थिअनवंशी राजा गंडोफरस के समय के तख्त-इ-बाही के शिलालेख१, कुशनवंशी राजा कनिष्क के समय के सुएविहार (बहावलपुर राज्य में) के ताम्रलेख२, शाहजी की ढेरी (कनिष्क विहार) के स्तूप से मिले हुए कांसे के पात्र पर के राजा कनिष्क के समय के तीन लेखों४ और भेडा के शिला लेख४ से तय्यार किया गया है. सुएविहार के ताम्रलेख में ‘ष्य’ और ‘स्य’५ के नीचे का ग्रंथिदार अंश ‘य’ का सूचक है.

### [c24.36](https://indike.org/pramana/ins.epigraphy.ojha-1894.c24.36)

५ पंडित भगवानलाल इंद्रजी ने इनको ‘ष्प’ और ‘स्स’ पढ़ा है (इं. एँ; जि. ११, पृ. १२८) परंतु इनको ‘ष्य’ और ‘स्य’ पढ़ना ही ठीक होगा. यह वृत्तांत लिखते समय मेरे पास एक गुप्तलिपि के प्राकृत लेख की छाप आई जिसमें ‘छन्दसेटिस्य’ स्पष्ट है. संस्कृतमिश्रित प्राकृत लेखों में ‘स्स’ के स्थान में ‘स्य’ विभक्ति-प्रत्यय का होना कोई आश्चर्य की बात नहीं है.

### [c24.37](https://indike.org/pramana/ins.epigraphy.ojha-1894.c24.37)

लिपिपत्र ६८वें की मूल पंक्तियों६ का नागरी अक्षरांतर—

### [c24.38](https://indike.org/pramana/ins.epigraphy.ojha-1894.c24.38)

महरजस्य रजतिरजस्य देवपुत्रस्य कणिष्कस्य संवत्सरे एकदशे  
सं १० १७ दइसिकस्य मसस्य दिवसे अठविशे दि २० ४ ४८ उत्र दिवसे भिक्षुस्य नगदतस्य संखके(?)टिस्य अच्चयंदमचतशिष्यस्य  
अच्चयभवप्रशिष्यस्य यठिं अरोपथतो इह दमने विहरखमिनि

### [c24.39](https://indike.org/pramana/ins.epigraphy.ojha-1894.c24.39)

४ ज. ए; ई. स. १८६०, भाग १, पृ. १३६ और प्लेट.

### [c24.40](https://indike.org/pramana/ins.epigraphy.ojha-1894.c24.40)

७ १० १=१०+१=११.

### [c24.41](https://indike.org/pramana/ins.epigraphy.ojha-1894.c24.41)

८ २० ४ ४ =२०+४+४=२८.

### [c24.42](https://indike.org/pramana/ins.epigraphy.ojha-1894.c24.42)

लिपिपत्र ६६ वां.

### [c24.43](https://indike.org/pramana/ins.epigraphy.ojha-1894.c24.43)

६ ये मूल पंक्तियां सुएविहार के ताम्रलेख से हैं.

### [c24.44](https://indike.org/pramana/ins.epigraphy.ojha-1894.c24.44)

यह लिपिपत्र वर्डक से मिले हुए पीतल के पात्र पर खुदे हुए कुशनवंशी राजा हुविष्क के समय के लेख९, कुशनवंशी वाझेष्प के पुत्र कनिष्क के समय के आरा के लेख१० और पाजा११ तथा कलदरा१२ के शिलालेखों से तय्यार किया गया है. वर्डक के पात्रपर का लेख बिंदियों से खुदा है और उसमें कई जगह अक्षरों के नीचे के भाग से दाहिनी ओर ‘र’ सूचक आड़ी लकीर निरर्थक लगी है, जैसे कि भगवद१३ (भगवद्=भगवत्), अग्रभग (अग्रभग=अग्रभाग), नतिग्र ( नतिग=ज्ञांतिक ), भवग्र ( भंवग=भावक ), संभतिग्रन ( संभतिगन ) आदि में. इस लेख में कितने एक अक्षर ऐसे हैं जिनका एक से अधिक तरह पढ़ा जाना संभव है. उनपर एक से अधिक अक्षर लगाये हैं. 'मु' में 'म' का रूप खड़ी लकीर सा बन गया है. कहीं कहीं 'त' और 'र', तथा 'श' और 'श' में स्पष्ट अंतर नहीं है और 'न' तथा 'ण' में भेद नहीं है चाहे सो पढ़ लो.

### [c24.45](https://indike.org/pramana/ins.epigraphy.ojha-1894.c24.45)

१ ज. ए; ई. स. १८६०, भाग १, पृ. ११६ और प्लेट (देखो, ऊपर पृ. ३२, टिप्पण ६).

### [c24.46](https://indike.org/pramana/ins.epigraphy.ojha-1894.c24.46)

२ इं. एँ; जि. १०, पृ. ३२५ के पास के प्लेट से. ३. आ. स. रि; ई. स. १९०६-१०, प्लेट ५३. ये लेख भी बिंदियों से खुदे हैं.

### [c24.47](https://indike.org/pramana/ins.epigraphy.ojha-1894.c24.47)

९ एँ. इं; जि. ११, पृ. २१० और २११ के बीच के प्लेटों से.

### [c24.48](https://indike.org/pramana/ins.epigraphy.ojha-1894.c24.48)

१० इं. एँ; जि. ३७, पृ. ५८ के पास का प्लेट, लेख दूसरा.

### [c24.49](https://indike.org/pramana/ins.epigraphy.ojha-1894.c24.49)

११ इं. एँ; जि. ३७, पृ. ६४ के पास का प्लेट, लेख दूसरा.

### [c24.50](https://indike.org/pramana/ins.epigraphy.ojha-1894.c24.50)

१२ इं. एँ; जि. ३७, पृ. ६६ के पास का प्लेट, लेख पहिला.

### [c24.51](https://indike.org/pramana/ins.epigraphy.ojha-1894.c24.51)

१३ भारतवर्ष की किसी प्राचीन प्राकृत भाषा में ‘भगवत्’ का ‘भगवद’ और ‘अग्रभाग’ का ‘अग्रभग’ रूप नहीं होता. ऐसी दशा में जैसे अशोक के खरोष्ठी लेखों में ‘त्य’ (देखो, ऊपर पृ. ६६) के ‘त’ के नीचे ऐसी ही लकीर लगी है वहां ‘रँ’ किसी तरह पढ़ा नहीं जा सकता वैसे ही ‘अग्रवद’ और ‘अग्रभग’ आदि पढ़ना अशुद्ध ही है. अशोक के लेखों में (देखो, लिपिपत्र ६५) जैसे ‘ज’ (दूसरे), और ‘म’ (चौथे), तथा ग्रीकों के सिक्कों में (लिपिपत्र ६६) ‘ज’ (पांचवें, छठे और सातवें), त (दूसरे, तीसरे और चौथे), ‘न’ (पहिले व दूसरे), ‘म’ (पहिले) और ‘स’ (पहिले) के नीचे दोनों तरफ निकली हुई आड़ी लकीरें बिना किसी आशय के लगी मिलती हैं वैसे ही इस लेख में इस लकीर का होना संभव है; जो कलम को उठा कर दोनों तरफ निकली हुई न बना कर चलती कलम से दाहिनी ओर ही बना दी जान पड़ती है. इसलिये इस रेखा को पूरे ‘ग’ का अंश ही मानना चाहिये. ऐसे ही ‘भि’ के साथ ऐसी लकीर कहीं कहीं निरर्थक लगी है जहां उसको या तो ‘भि’ का अंश ही मानना चाहिये अथवा उसको ‘भिम’ पढ़ना चाहिये. जहां ‘र’ की संभावना हो वहीं ‘भ्रि’ पढ़ना चाहिये.

### [c24.52](https://indike.org/pramana/ins.epigraphy.ojha-1894.c24.52)

लिपिपत्र ६६वें की मूल पंक्तियों१ का नागरी अक्षरांतर—

### [c24.53](https://indike.org/pramana/ins.epigraphy.ojha-1894.c24.53)

इमेन कुशलमुलेन महरजरजतिरजहोवेष्कस्य अग्रभग़ए९ भवतु  
मददपिदर मे पुयए भवतु भृदर मे हघृनमरेग़स्य पुयए  
भवतु शोच मे भुय नतिग़मित्रसंभतिग़न पुयए भवतु महि-  
श च वग़मरेग़स्य अग्रभग़पर्डियश भवतु सर्वसत्वन

### [c24.54](https://indike.org/pramana/ins.epigraphy.ojha-1894.c24.54)

लिपिपत्र ७० वां.

### [c24.55](https://indike.org/pramana/ins.epigraphy.ojha-1894.c24.55)

यह लिपिपत्र तक्षशिला से मिले हुए रौप्यपत्र के लेख३, फ़तहजंग४, कनिहारा५ और पथियार६ के शिलालेखों तथा चारसड्डा से मिले हुए तीन लेखों से, जिनमें से दो मिट्टी के पात्रों पर स्याही से लिखे हुए७ हैं और तीसरा एक मूर्ति के नीचे७ खुदा है, तय्यार किया गया है. तक्षशिला के रौप्यपत्र पर का लेख बिंदियों से खुदा है.

### [c24.56](https://indike.org/pramana/ins.epigraphy.ojha-1894.c24.56)

३ ज. रॉ. ए. सो; ई. स. १८६५, पृ. १६२ के पास के प्लेट से.

### [c24.57](https://indike.org/pramana/ins.epigraphy.ojha-1894.c24.57)

५ ऐं. इं; जि. ७ पृ. ११८ के पास के प्लेट से.

### [c24.58](https://indike.org/pramana/ins.epigraphy.ojha-1894.c24.58)

६ आ. स. रि; ई. स. १६०२-३, पृ. १८३, लेख A और C.

### [c24.59](https://indike.org/pramana/ins.epigraphy.ojha-1894.c24.59)

लिपिपत्र ७०वें की मूल पंक्तियों८ का नागरी अक्षरांतर—

### [c24.60](https://indike.org/pramana/ins.epigraphy.ojha-1894.c24.60)

७ आ. स. रि; ई. स. १६०३-४, प्लेट ६७, मूर्ति प्रथम के नीचे.

### [c24.61](https://indike.org/pramana/ins.epigraphy.ojha-1894.c24.61)

८ ये मूल पंक्तियां तक्षशिला से मिले हुए रौप्यपत्र के लेख से हैं.

### [c24.62](https://indike.org/pramana/ins.epigraphy.ojha-1894.c24.62)

स १०० २० १० ४ २९ अयस अपडस मसस दिवसे १० ४ ११० इश दिवसे  
प्रदिस्तवित भगवतो धातुओ उर...केन लोतफ़िक्रिअपुचन बहलिएन नोअ-  
चए नगरे वस्तवेन तेन इमे प्रदिस्तवित भगवतो धातुओ धमर-  
इए तक्षशिए \[ख\]ए तणुवए बोधिसत्वगहमि महरजस रजतिरजस

### [c24.63](https://indike.org/pramana/ins.epigraphy.ojha-1894.c24.63)

१ ये मूल पंक्तियां वर्डक के पात्र के लेख से हैं.

### [c24.64](https://indike.org/pramana/ins.epigraphy.ojha-1894.c24.64)

२ इन मूल पंक्तियों में जिन जिन अक्षरों के नीचे 'र' की सूचक आड़ी लकीर निरर्थक लगी है उसके स्थान में हमने 'र' नहीं पढ़ा परंतु जिन अक्षरों के नीचे वह लगी है उनके नीचे...ऐसा चिह्न लगा दिया है.

### [c24.65](https://indike.org/pramana/ins.epigraphy.ojha-1894.c24.65)

४ ज. प; ई. स. १८६० भाग १, पृ. १३० और प्लेट.

### [c24.66](https://indike.org/pramana/ins.epigraphy.ojha-1894.c24.66)

९ अर्थात् १३६.

### [c24.67](https://indike.org/pramana/ins.epigraphy.ojha-1894.c24.67)

१० अर्थात् १५.

## Linked texts (8)

- [Kuḍopāli plates of Rāṇaka Puñja of the time of Mahābhavagupta year 13](https://indike.org/pramana/inp.epigraphy.east.somavamsin.kudopali-plates-of-ranaka-punja-of-the) — Sanskrit
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Source: [https://indike.org/pramana/ins.epigraphy.ojha-1894.c24](https://indike.org/pramana/ins.epigraphy.ojha-1894.c24) · Pramāṇa
