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# भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c26: २०—खरोष्ठी लिपि के अंक

भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c26

- **Language:** Hindi

### २०—खरोष्ठी लिपि के अंक

### [c26.1](https://indike.org/pramana/ins.epigraphy.ojha-1894.c26.1)

( लिपिपत्र ७६ के उत्तरार्द्ध का द्वितीय खंड ).

### [c26.2](https://indike.org/pramana/ins.epigraphy.ojha-1894.c26.2)

खरोष्ठी लिपि के अंक उक्त लिपि की नांई विदेशी हैं. अरबी और फ़ारसी की नांई खरोष्ठी लिपि दाहिनी ओर से बाईं ओर लिखी जाती है परंतु उसके अंक अरबी और फ़ारसीके अंकों की नांई बाईं ओर से दाहिनी ओर नहीं लिखे जाते किंतु दाहिनी ओर से बाईं ओर लिखे जाते हैं जिसका कारण यही है कि वे अंक अरबी और फ़ारसी के अंकों की नांई भारतीय अंकों से नहीं निकले किंतु सेमिटिक् फ़िनिशियन ( या उनसे निकले हुए अरमइक् ) अंकों से निकले हुए प्रतीत होते हैं. ई. स. पूर्व की तीसरी शताब्दी से भारतवर्ष में इन अंकों का कुछ पता लगता है. अशोक के शहबाज़गढ़ी के लेख की पहिली धर्माज्ञा में १ और २ के लिये क्रमशः एक ( । ) और दो ( ॥ ) खड़ी लकीरें, तीसरी में ५ के लिये पांच ( ।।।।। ) और १३ वीं में ४ के लिये चार ( ।।।। ) खड़ी लकीरें मिलती हैं. ऐसे ही अशोक के मान्सेरा के लेख की पहिली धर्माज्ञा में १ और २ के लिये क्रमशः एक ( । ) और दो ( ॥ ), और तीसरी में पांच के लिये पांच ( ।।।।। ) खड़ी लकीरें खुदी हैं. इससे पाया जाता है कि उस समय तक तो ६ तक के लिये इन अंकों का वही क्रम रहा हो जो फ़िनिशियन् में मिलता है. अशोक के पीछे शक, पार्थियन् और कुशनवंशियों के समय के खरोष्ठी लेखों१ में ये अंक विशेष रूप से मिलते हैं. उनमें १, २, ३, ४, १०, २० और १०० के लिये पृथक् पृथक् चिह्न हैं ( देखो, लिपिपत्र ७६ में खरोष्ठी अंक ). इन्हीं ७ चिह्नों से ३६६ तक के अंक लिखे जाते थे.

### [c26.3](https://indike.org/pramana/ins.epigraphy.ojha-1894.c26.3)

इन अंकों में १ से ६ तक के लिये यह क्रम था कि ५ के लिये ४ के अंक की बाईं ओर १; ६ के लिये ४ और २; ७ के लिये ४ और ३; ८ के लिये दो बार ४; और ९ के लिये ४, ४ और १ लिखे जाते थे.

### [c26.4](https://indike.org/pramana/ins.epigraphy.ojha-1894.c26.4)

११ से १६ तक के लिये १० की बाईं ओर उपर्युक्त क्रम से १ से ६ तक के अंक लिखे जाते थे. २० से २६ के लिये २० की बाईं ओर १ से ६ तक के और ३० के लिये २० और १० लिखे जाते थे.

### [c26.5](https://indike.org/pramana/ins.epigraphy.ojha-1894.c26.5)

३१ से ९६ तक के अंक २०, १० और १ से ६ तक के अंकों को मिलाने से बनते थे, जैसे कि ७४ के लिये २०, २०, २०, १० और ४; और ६६ के लिये २०, २०, २०, २०, १०, ४, ४ और १.

### [c26.6](https://indike.org/pramana/ins.epigraphy.ojha-1894.c26.6)

१०० के लिये उक्त चिह्न के पूर्व १ का अंक रक्खा जाता था. २०० के लिये १०० के पूर्व २ का और ३०० के लिये ३ का अंक लिखा जाता था. ४०० के लिये १०० के पूर्व ४ का चिह्न लिखा जाता था या चार खड़ी लकीरें बनाई जाती थीं इसका कुछ पता नहीं चलता क्योंकि ३७४ के आगे का कोई अंक अब तक नहीं मिला.

### [c26.7](https://indike.org/pramana/ins.epigraphy.ojha-1894.c26.7)

अशोक के पीछे के उपर्युक्त ७ चिह्नों में से १, २ और ३ के लिये क्रमशः १, २ और ३ खड़ी लकीरें हैं जो फ़िनिशियन् क्रम से ही हैं. ४ के अंक का चिह्न × है जो ई. स. पूर्व के सेमिटिक लिपि के किसी लेख में नहीं मिलता. संभव है कि ब्राह्मी के ४ के अंक ( + ) को ही टेढ़ा लिखने से यह चिह्न बना हो. १० का चिह्न फ़िनिशियन् के १० के खड़े चिह्न को खड़ा लिखने से बना हो ऐसा प्रतीत होता है ( देखो, ऊपर पृ. ११३ में दिया हुआ नक्शा ). उसी ( फ़िनिशियन् ) चिह्न से पल्माइरावालों का एवं तीमा के लेख का उक्त अंक का चिह्न बना है. २० का चिह्न फ़िनिशियन् अंकों में मिलने वाले २० के अंक के ४ चिह्नों में से तीसरा है.

### [c26.8](https://indike.org/pramana/ins.epigraphy.ojha-1894.c26.8)

१ इन संवत् वाले लेखों के लिये देखो, ऊपर पृ. ३२, टिप्पण ७, ६; और पृ. ३३, टिप्पण १.

### [c26.9](https://indike.org/pramana/ins.epigraphy.ojha-1894.c26.9)

१०० का चिह्न फिनिशियन् अंकों के १०० के चिह्न के ४ रूपों में से चौथे से मिलता हुआ है, केवल उसके पूर्व एक की खड़ी लकीर अधिक लगी है. ऐसी दशा में इन चिह्नों में से ४ के चिह्न के सिवाय सब का फिनिशियन् से निकला हुआ होना अनुमान होता है.

### [c26.10](https://indike.org/pramana/ins.epigraphy.ojha-1894.c26.10)

लिपिपत्र ७६ के उत्तरार्द्ध का द्वितीय खंड.

### [c26.11](https://indike.org/pramana/ins.epigraphy.ojha-1894.c26.11)

इस खंड में ५ खड़ी पंक्तियां हैं जिनमें से पहिली और चौथी में वर्तमान नागरी अंक हैं और दूसरी, तीसरी तथा पांचवीं में उन्हीं के सूचक खरोष्ठी अंक हैं. दूसरी पंक्ति में अशोक के शहबा-ज़गढ़ी और मानसेरा के लेखों१ से और तीसरी तथा पांचवीं में शक, पार्थियन् और कुशनवंशियों के समय के संवत्वाले खरोष्ठी लेखों२ से अंक दिये गये हैं.

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