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भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c28.s4: कनड़ी लिपि की उत्पत्ति

भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c28.s4

Language
Hindi

कनड़ी लिपि की उत्पत्ति

c28.s4.1

**अ**—दू. ४५; ती. ४७; चौ. ४६; पां. ५० (चेब्रोलू का लेख).

c28.s4.2

**इ**—दू. ४० (कर्कराज का दानपत्र); ती. ४५ (पुलुकेशिन का दानपत्र); चौ. ४५. (चेंडलूर का दानपत्र).

c28.s4.3

**ई**—प. ३६ (मंदसौर का लेख); दू. पहिले से बना; ती. ४७; चौ. ५० (अनंौंडा का लेख).

c28.s4.4

**ए**—दू. ६ (वासिष्ठीपुत्र के लेख); ती. १५; चौ. ४५ (चेंडलूर का दानपत्र); पां. ४८ (राजा अम्म का दानपत्र).

c28.s4.5

**ओ**—दू. ६ (वासिष्ठीपुत्र के लेख); ती. ५०.

c28.s4.6

**क**—दू. ६ (वासिष्ठीपुत्र के लेख); ती. ४४ (देवगिरि का दानपत्र); चौ. ४७; पां. ५० (चेब्रोलू का लेख).

c28.s4.7

**ख**—दू. ६ (वासिष्ठीपुत्र के लेख); ती. १३; चौ. ४७

c28.s4.8

**ग**—दू. ६ (वासिष्ठीपुत्र के लेख); ती. ४३ (उरुवुपल्लि का दानपत्र).

c28.s4.9

**घ**—दू. ६ (वासिष्ठीपुत्र के लेख); ती. ४४ (देवगिरि का दानपत्र); चौ. ४५ (चेंडलूर का दानपत्र); पां. ५० (अनंौंडा का लेख).

c28.s4.10

**ङ**—दू. ४४ (काकुत्स्थवर्मन् के दानपत्र के ‘उङ्घो’ में); ती. दूसरे से बना.

c28.s4.11

**च**—दू. ६ (वासिष्ठीपुत्र के लेख), ती. ४६; चौ. ४८; पां. ५० (चेब्रोलू का लेख).

c28.s4.12

**छ**—दू. ८; ती. ४०; चौ. ५० (चेब्रोलू का लेख).

c28.s4.13

**ज**—दू. ४३; ती. ४७; चौ. ४८ (राजा भीम का दानपत्र).

c28.s4.14

**झ**—दू. ६ (वासिष्ठीपुत्र के लेख); ती. दूसरे से बना; चौ. तीसरे से बना; पां. ५०.

c28.s4.15

ञ—दू. ७; ती. ४४ (‘ज्ञा’ में ); चौ. ४८ (‘ज्ञा’ में).
ट—दू. ४५ (बादामी का लेख); ती. दूसरे से बना; चौ. ४८; पां. ५१ (दोनेपुंडी का दानपत्र).
ठ—दू. ५१. ड—प. २ (खालसी); दू. ७; ती. ४४ (मृगेशवर्मन् का दानपत्र); चौ. ५०.
ढ—दू. ती. ४७; चौ. ५०.
ण—दू. १२; ती. ४५; चौ. ४८; पां. ४६.
त—दू. ६; ती. ४७; चौ. ४८.
थ—दू. ४४ (काकुस्थवर्मन् का दानपत्र); ती. ४७.
द—प. २ (जौगड़); दू. ७; ती. ४३ (पिकिर का दानपत्र); चौ. ४८; पां. ५०.
ध—दू. ६ (गौतमीपुत्र शातकर्णी के लेख); ती. १३; चौ. ४६; पां. ५०.
न—दू. ४३ (उरुवुपल्लि का दानपत्र); ती. ४५ (चेंडलुर का दानपत्र); चौ. ५०.
प—दू. ६ (वासिष्ठीपुत्र के लेख); ती. ४५; चौ. ५०; पां. ५१ (राजा गणदेव का दानपत्र).
फ—दू. ८; ती. ४३; चौ. ४७; पां. ५०.
ब—दू. ४३ (विष्णुगोपवर्मन् का दानपत्र); ती. ४३ (सिंहवर्मन् का दानपत्र); चौ. ४७.
भ—दू. ४४ (मृगेशवर्मन् का दानपत्र); ती. ४८; चौ. ४६; पां. ५०.
म—दू. ६; ती. ४४ (मृगेशवर्मन् का दानपत्र); चौ. ४६; पां. ५०.
य—दू. ७; ती. ४३; चौ. ४५; पां. ४८. र—दू. ७; ती. ४३; चौ. ४७; पां. ४८.
ल—दू. ८; ती. ४४ (मृगेशवर्मन् का दानपत्र); चौ. ४८. व—दू. ६; ती. १३; चौ ४६; पां. ५०.
श—प. २ (खालसी); दू. ७; ती. ४४ (मृगेशवर्मन् का दानपत्र); चौ ४५; पां. ५०.
ष—प. ३ (घोसुंडी के ‘र्ष’ में); दू. ४४; ती. ४५; चौ. ५०; पां. ५१.
स—दू. ४७; ती. ४८. ह—दू. ७; ती. ४३; चौ. ५०; पां. ५१.
ळ—प. ७; दू. ४७; ती. ५०; चौ. ५१ (वनपल्ली का दानपत्र).

c28.s4.16

वर्तमान कन्नड़ी लिपि का ‘उ’ प्राचीन ‘उ’ से नहीं बना किंतु ‘अ’ के साथ ‘उ’ की मात्रा जोड़ने से बना है. उसी ‘उ’ से ‘ऊ’ बना है. ‘ऋ’ का कोई प्राचीन रूप नहीं मिलता. संभव है कि उष्णी-षविजयधारणी के अंत की वर्णमाला के ‘ऋ’ जैसे ही अक्षर में विकार हो कर वह बना हो. ‘ए’ और ‘ओ’ उनके प्राचीन रूपों से ही बने हैं. ‘ऐ’ लिपिपत्र ३८ के ‘ऐ’ से, और ‘औ’ लिपिपत्र ४३ और ५० में मिलनेवाले ‘औ’ से बना है१.

c28.s4.17

१ वर्तमान तेलुगु लिपि कन्नड़ी से बहुत मिलती हुई है. जिन अक्षरों में विशेष अंतर है वे ड, ॠ, क, त, श और ह हैं. इनमें से ‘उ’ उसके प्राचीन रूप से बना है (विकासक्रम के लिये देखो, क्रमशः लिपिपत्र ४४, ४७ और ५० में मिलनेवाले उक्त अक्षर के रूप). ‘क’ कन्नड़ी की उत्पत्ति में दिये हुए उक्त अक्षर के पांचवें रूप की आड़ी लकीर और नीचे के वृत्त को चलती कलम से कुछ अंतर के साथ लिखने से बना है. ‘त’ के बाईं ओर के अंत में ग्रंथि और लग दी है. ‘श’ और ‘ह’ भी कन्नड़ी की उत्पत्ति में दिये हुए उक्त अक्षरों के उपांत्य रूपों के विकार मात्र हैं.

c28.s4.18

लिपिपत्र ८४ वां.

c28.s4.19

इस लिपिपत्र में ग्रंथ और तामिळ लिपियों की उत्पत्ति दी गई है.

Cites (1)