भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c30.s15: लोहा
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c30.s15
- Language
- Hindi
लोहा
c30.s15.1
लोहे पर भी लेख खोदे जाने के कुछ उदाहरण मिल आते हैं. देहली (मिहरोली) के कुतुब मीनार के पास के लोह के स्तंभ पर राजा चंद्र का लेख खुदा है जो ई. स. की ५ वीं शताब्दी का है. आबू पर अचलेश्वर के मंदिर में खड़े हुए लोहे के विशाल त्रिशूल पर वि. सं. १४६८ फाल्गुन सुदि १५ का लेख खुदा हुआ है. चित्तौड़ आदि कई स्थानों में लोहे की तोपों पर भी लेख खुदे हुए मिलते हैं. सोने, चांदी, तांबे और सीसे के सिक्कों के ठप्पे लोहे के ही बनते थे और उनपर अक्षर उलटे खोदे जाते थे.
c30.s15.2
१ त्रिषती (मद्रास इहाते में) में तांबे के पत्नों पर खुदे हुए तेलुगु पुस्तक मिले हैं (बी; सा. इं. पे; पृ. ८६). हुएन्त्संग के लेख से पाया जाता है कि 'राजा कनिष्क ने प्रसिद्ध विद्वान् पार्श्व की प्रेरणा से कश्मीर में बौद्धसंघ एकत्रित किया जिसने सूत्रपिटक पर 'उपदेशशास्त्र', विनयपिटक पर 'विनयविभाषाशास्त्र' और अभिधर्मपिटक पर 'अभिधर्मविभाषाशास्त्र' नामक लाख लाख श्लोकों की टीकाएं तैयार कीं. कनिष्क ने इन तीनों टीकाओं को ताम्रफलकों पर खुदवाया और उनको पत्थर की पेटियों में रख कर उनपर स्तूप बनवाया' (बी; बु. रे. वे. व; जि. १, पृ. १५५. हुएन्त्संग की भारतीय यात्रा पर थॉमस वॉटर्स का पुस्तक, जि. १, पृ. २७१). ऐसी भी प्रसिद्धि है कि सायण के वेदभाष्य भी तांबे के पत्त्रों पर खुदवाये गये थे (मॅक्समूलर संपादित ऋग्वेद, जि. १, पृ. XVII).