भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c30.s22: कांची ( रुल )
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c30.s22
- Language
- Hindi
कांची ( रुल )
c30.s22.1
इस समय स्याही की लकीरें खींचने के लिये गोल रुल का प्रचार हो गया है परंतु पहिले उसके लिये लकड़ी की गज़ ( कंबा ) जैसी चपटी पट्टी काम में आती थी जिसके ऊपर और नीचे का एक तरफ़ का किनारा बाहर निकला हुआ रहता था. उसके सहारे लकीरें खींची जाती थीं. ऐसी पट्टी को राजपूताने के लेखक ‘कांची’ ( कंबा ) कहते हैं. वह रुल की अपेक्षा अच्छी होती है क्यों कि रुल पर जब स्याही लग जाती है तब यदि उसे पोंछ न लिया जावे तो घूमता हुआ रुल नीचे के कागज़ को बिगाड़ देता है परंतु कांची का वह अंश जिसके साथ कलम सटी रहती है बाहर निकला हुआ होने से कागज़ को स्पर्श ही नहीं करता जिससे उसपर लगी हुई स्याही का दाग़ कागज़ पर कभी नहीं लगता. पुस्तकलेखक तथा ज्योतिषी लोग लकीरें खींचने के लिये पुरानी शैली से अब तक कांची काम में लाते हैं.