भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c30.s7: चमड़ा
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c30.s7
- Language
- Hindi
चमड़ा
c30.s7.1
यूरोप तथा अरब आदि एशिया के देशों में प्राचीन काल में लेखनसामग्री की सुलभता न होने से वहां क लोग जानवरों के चमड़ों को साफ़ कर उनपर भी लिखते थे परंतु भारतवर्ष में ताड़पत्र, भोजपत्र आदि प्राकृतिक लेखनसामग्री की प्रचुरता तथा सुलभता एवं जैनों में चर्ममात्र, तथा वैदिक काल के पीछे के ब्राह्मणों के मृगचर्म के अतिरिक्त और चमड़ा, अपवित्र माना जाने के कारण लिखने में उसका उपयोग शायद ही होता हो. तो भी कुछ उदाहरण ऐसे मिल आते हैं जिनसे पाया जाता है कि चमड़ा भी लिखने के काम में कुछ कुछ आता होगा. बौद्ध ग्रंथों में चमड़ा लेखनसामग्री में गिनाया गया है३. सुबंधु ने अपनी 'वासवदत्ता' में अंधकारयुक्त आकाश में रहे हुए तारों को स्याही से काले किये हुए चमड़े पर चंद्रमा रूपी खड़िया के टुकड़े से बनाये हुए शून्यबिंदुओं (बिंदियों) की उपमा दी है४. जेसलमेर के 'बृहत् ज्ञानकोष' नामक जैन पुस्तकभंडार में बिना लिखे हुए एक चर्मपत्र का हस्तलिखित पुस्तकों के साथ मिलना डॉ. बूलर बतलाता है५.
c30.s7.2
३ कत्त्यायन की भूमिका, पृ. २७. बू; इं. पे; पृ. ६५.
c30.s7.3
४ विप्रवं गणयतो विधातुः शशिकठिनीखण्डेन तमोमषीश्यामेऽजिन इव नभसि संसारस्यातिशून्यत्वाच्छून्यबिन्दव इव (वासवदत्ता; हॉल का संस्करण, पृ. १८२).
c30.s7.4
५ बू; इं. पे; पृ. ६५.