भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c31.s6: ६—सेल्यकिडि संवत्
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c31.s6
- Language
- Hindi
६—सेल्यकिडि संवत्
c31.s6.1
ई. स. पूर्व ३२३ में यूनान के बादशाह सिकंदर (अलेक्ज़ैंडर) का देहांत होने पर उसके सेनापति राज्य के लिये आपस में लड़ते रहे. अंत में तीन राज्य मकदूनिया (मसिडोनिया, ग्रीस में), मिसर और सीरिया (बाबीलन्) कायम हुए. सीरिया का स्वामी सेल्युकस् निकाटोर बना जिसके अधीन बाक्ट्रिया आदि एशिया के पूर्वी देश भी रहे. सेल्युकस् के राज्य पाने के समय अर्थात् ता. १ अक्टोबर ई. स. पूर्व ३१२ से उसका संवत् (सन्) चला जो बाक्ट्रिया में भी प्रचलित हुआ. हिंदुस्तान के काबुल तथा पंजाब आदि हिस्सों पर बाक्ट्रिया के ग्रीकों (यूनानियों) का आधिपत्य होने के बाद उक्त संवत् का प्रचार भारतवर्ष के उन हिस्सों में कुछ कुछ हुआ हो यह संभव है. यद्यपि अब तक कोई ऐसा लेख नहीं मिला कि जिसमें इस संवत् का लिखा जाना निश्चयात्मक माना जा सके तो भी इस संवत् के साथ लिखे जानेवाले मसीडोनियन् (यूनानी) महीने२ शक तथा कुशन वंशियों के समय के कितने एक खरोष्ठी लेखों में मिल आते हैं. जिन लेखों में ये विदेशी महीने मिले हैं वे विदेशियों के खुदवाये हुए हैं. उनमें दिये हुए वर्ष किस संवत् के हैं इसका अब तक ठीक निर्णय नहीं हुआ तो भी संभव है कि जो लोग विदेशी मसीडोनियन् (यूनानी) महीने लिखते थे वे संवत् भी विदेशी ही लिखते होंगे चाहे वह सेल्युकिडि (शताब्दियों के अंकसहित), पार्थियन्३ या कोई अन्य (शक) संवत् हो.
c31.s6.2
२ मसीडोनियन् महीनों के नाम क्रमशः हाइपर्बेरेटिअस् (Hyperberetæus), डिअस् (Dius), ऍपेल्लिअस् (Apellæus), ॲडिनिअस् (Audynæus), पेरिटिअस् (Peritius), डिस्टुस् (Dystrus), ज़ैंथिकस् (Xanthicus), आर्टेमिसिअस् (Artemisius), डेसिअस् (Dæsius), पनेमस् (Panemus), लोअस् (Lous) और गॉर्पिण्अस् (Gorpiæus) हैं. इनमें से पहिला हाइपर्बेरेटिअस् अंग्रेज़ी ऑक्टोबर के और अंतिम गॉर्पिण्अस् सप्टेंबर के स्थानापन्न है. अब तक इन मसीडोनियन् महीनों में से ४ महीने—ऍपेल्लिअस् (क; ई. इं; पृ. ४१), आर्टेमिसिअस् (हुविष्क के समय के सं. ५१ के वर्डक से मिले हुए पात्र पर के लेख में; पँ. इं; जि. ११, पृ. २१०), डेसिअस् (दशिसिक, कनिष्क के समय के सं. ११ के सुएविहार के ताम्रलेख में; इं. ऐं; जि. १०, पृ. ३२६; जि. ११, पृ. १२८) और पनेमस् (क्षत्रप पतिक के तक्षशिला से मिले हुए सं. ७८ के ताम्रलेख में; पँ. इं; जि. ४, पृ. ५५)—लेखों में मिले हैं.
c31.s6.3
३ पार्थियन् संवत् का प्रारंभ ई. स. पूर्व २४७ के मध्य के आस पास होना माना जाता है (क; ई. इं; पृ. ४६).