Pracin Bharatiya Veshabhusha c11.s1: कपास धुनने, कातने और बुनने की क्रिया
Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c11.s1
- Language
- Hindi
कपास धुनने, कातने और बुनने की क्रिया
c11.s1.1
इस युग में सूती कपड़े का बहुत चलन हो गया था। अच्छी कपास पैदा की जाती थी और कपास के खेत (कपासवाट) का उल्लेख मिलता है१। कपास की मृदुता (कर्पास-पिलु) के लोग कायल थे। दिव्यावदान में एक जगह२ उपगुप्त के शरीर की कोमलता की उपमा कर्पास से दी गयी है। कपास बाजार से खरीद कर धुन ली जाती थी (तं परिकर्मयित्वा, और उससे पतला एकसां सूत कात लिया जाता था३। बुनकर (कुविंद), कपड़े बीनते समय चीर छोड़कर (अविचीरविचीरकं) तथा अपने सिर उठाकर और अपने हाथ पैरों का संचालन करते हुए बुनना आरंभ करते थे । पास में बैठी बुनकर की स्त्री माड़ी (दिव्यसुधा) देकर ताना तानने का काम आरंभ कर देती थी (तसरिकां कर्तुमारब्धा)४। दो हजार वर्षों के बाद भी आज हम एक बुनकर के घर यही दृश्य देख सकते हैं। कार्पासिकों और बुनकरों (तंत्रवायका) का अपनी श्रेणियां होती थीं (महावस्तु, आ० ३, पृ० ११३)
c11.s1.2
१ दिव्यावदान, पृष्ठ २१२, सतर २१
c11.s1.3
२ वही, पृ० ३८८, सतरें १४-१५ तथा पृ० २१०, १४
c11.s1.4
३ वही, पृ० २७६, स० ६, ११
c11.s1.5
४ वही, पृ० ८३, स० २१-२५
Cites (2)
- Mahāvastu — Sanskrit
- Divyāvadāna — Sanskrit