Pramāṇa · Search · About · API

Pracin Bharatiya Veshabhusha c11.s10: साहित्य में भारतीय वेश-भूषा के उल्लेख

Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c11.s10

Language
Hindi

साहित्य में भारतीय वेश-भूषा के उल्लेख

c11.s10.1

उत्तर भारत की वेश-भूषा—इस युग के साहित्य में भारतीय पहरावे का कम उल्लेख हुआ है। साधारणतः लोग धोती और दुपट्टा पहनते थे। काशी के बने धोती, दुपट्टे सारे भारत में प्रसिद्ध थे५९। धोती दुपट्टे की जोड़ी (यमली) की कीमत कभी कभी एक लाख कार्षापण६० तक पहुंच जाती थी। राजे महाराजे कुंदी किए हुए चौड़े किनारे वाले नये वस्त्र पहनते थे। (आहतानि वासांसि नवानि दीर्घ दशादि) ये वस्त्र उनके शरीर को पूर्ण रूप से ढंक लेते थे६१। यहां चौड़े किनारे वाले कपड़ों से शायद धोती और दुपट्टे से मतलब हो। पूरे शरीर ढंकने वाले वस्त्रों से शायद कंचुक से मतलब हो। बुनकर६२ और किसान६३ सत्री धोती (शण शाटी) पहनते थे। छोटी धोती को प्रावरण पोत्री (गुजराती, पोत्यूं६४) कहते थे। राजे पगड़ी भी (प्रवर मौलि पट्ट) पहनते थे६५। राजा के सिवाय मंत्री कंचुकी सेठ और पुरोहित भी पगड़ियां पहनते थे६६।

c11.s10.2

५९ दिव्यावदान, पृ० २६, पंक्ति ६

c11.s10.3

६० वही, पृ० २३६, पंक्ति ६-११

c11.s10.4

६१ वही, पृ० ३६८, पंक्ति २७-२८

c11.s10.5

६२ वही, पृ० ८३, पं० २१-२५

c11.s10.6

६३ वही, पृ० ४६३, पं० ८

c11.s10.7

६४ वही, पृ० २५६, पं० २६

c11.s10.8

६५ वही, पृ० ४२०, पं० ५-७

c11.s10.9

६६ भारतीय नाट्यशास्त्र, २३।१२६

c11.s10.10

राजे कभी कभी सिले कपड़े जो शायद कंचुक रहे हों (चोडक-संघात-प्रत्यवरेण-वाससं) पहनते थे६७। राजमहल के अंगरक्षक और पहरुवे काषाय कंचुक पहनते थे६८। योद्धा भी कंचुक पहनते थे६९ और उनकी छाती और बांह जिरह बस्तर से ढंके रहते थे। (मणिवर्म पंचांगोपेतम्७०)। सुंदर रंगों से कपड़े रंगने की कला (वस्त्रराग७१) और सिलाई की कला७२ सीखना इस युग में शिक्षा का एक आवश्यक अंग माना जाता था।

c11.s10.11

६७ दिव्यावदान, पृ० ४१५, पं० ५-७

c11.s10.12

६८ भारतीय नाट्यशास्त्र, २३।१२६

c11.s10.13

६९ ललितविस्तर, पृ० ४७, पं० ७

c11.s10.14

७० दिव्यावदान, पृ० ५४६, पं० १४

c11.s10.15

७१ ललित विस्तर, पृ० १७०, पं० १

c11.s10.16

७२ वही, पृ० १८६, पं० ७

Cites (1)