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Pracin Bharatiya Veshabhusha c11.s6: क्षौम, शाण, पांडुदुकूल, हर्यणी, अपरांतक, फलक, फुट्टक और पुष्पपट्ट

Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c11.s6

Language
Hindi

क्षौम, शाण, पांडुदुकूल, हर्यणी, अपरांतक, फलक, फुट्टक और पुष्पपट्ट

c11.s6.1

क्षौम—क्षौम अथवा तीसी के छाल के रेशों से बने कपड़ों का काफी व्यवहार होता था ।३०

c11.s6.2

३० दिव्यावदान पृ० ३१६, पं० २३-२७ ; पृ० ५७७, पं० २१-२२

c11.s6.3

शण—अठ्ठारह गज लंबे और बारह गज चार अंगुल चौड़े सन के बने कपड़े का उल्लेख है ।३१ एक दूसरी जगह सन की साड़ी (शण शाटिका) बिने जाने का उल्लेख है । ऐसा पता चलता है सन की बनी धोती (शण शाटिका) गरीब किसान पहनते थे ।३३

c11.s6.4

३१ वही, पृ० ३४६, पं० ३-५

c11.s6.5

३३ वही, पृ० १६४, पं० ३

c11.s6.6

हिरि वस्त्र—सुनहले कपड़े को हर्यणी३४ अथवा हिरि वस्त्र३५ कहते थे । लगता है कि इन शब्दों से आधुनिक किमखाब की तरह किसी वस्त्र की ओर संकेत है । पर इसका ठीक ठीक पता नहीं चलता कि आया यह कपड़ा सादा होता था या नक्काशीदार । सुनहले कलाबत्तू से बिनी गई और रत्नों से जटिल (रत्न-सुवर्ण-प्रावरकाः) कीमती चादरें भी होती थीं । ३६

c11.s6.7

३४ वही, पृ० ३१६

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३५ ललितविस्तर, पृ० १५८, सं० १८

c11.s6.9

३६ दिव्यावदान, पृ० ३१६

c11.s6.10

पांडुदुकूल—दुकूल के रेशों से बना सफेद कपड़ा३७ । इस युग के साहित्य में दुकूल का ठीक ठीक परिचय नहीं मिलता । जैन अंगों की टीकाओं में गौड़ अथवा बंगाल की रूई को दुकूल कहा गया है पर यह व्याख्या बारहवीं शताब्दी की होने से अविश्वसनीय है । दुकूल शायद दुकूल वृक्ष की छाल के रेशों से बना कपड़ा था ।

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३७ ललितविस्तर, पृ० ३३३

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काशिक वस्त्र—बनारस में बने कपड़ों के लिए काशिक वस्त्र३८, काशी३९ तथा काशिकांसु४० इत्यादि शब्दों का प्रयोग हुआ है। बहुधा काशिक वस्त्र से लोग रेशमी कपड़े

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३२ वही, पृ० ८३, पं० २१-२५

c11.s6.14

३८ दिव्यावदान, पृ० ३६१, पं० ६

c11.s6.15

३९ वही, पृ० ३८८, पं० १७

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४० वही, पृ० ३१६, पं० २३-२७

c11.s6.19

का अनुमान करते हैं क्योंकि आज दिन भी बनारस रेशमी कपड़े बिनने का मुख्य केन्द्र है । लेकिन इस युग के साहित्य में काशी के बने वस्त्रों का रेशमी होने का कहीं उल्लेख नहीं है। बहुत संभव है कि ये वस्त्र सूती रहे हों क्योंकि प्राचीन काल में बनारस के आसपास बहुत अच्छी कपास पैदा होती थी और यहां की कत्तिनें बहुत महीन सूत कातती थीं। भैषज्यगुरु-सूत्र४१ में कहा गया है कि काशिक वस्त्र बहुत महीन होते थे (सूक्ष्माणि जालानि च संहिनानि)। काशिक वस्त्र से बहुत अच्छे पहनने के कपड़े बनने का भी उल्लेख है४२ ।

c11.s6.20

४१ —गिलगिट टेक्स्ट्स, भा० १, पृ० १२५-१२६

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४२ —ललितविस्तर, पृ० २६२, पं० ६

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फलक—लगता है यह कपड़ा किसी फल के रेशे से बनता था४३।

c11.s6.23

४३ —वही, पृ० १५८, पं० १८

c11.s6.24

अपरांतक—शायद कोंकण में बना कपड़ा। यह पता नहीं चलता कि कपड़ा सूती होता था या रेशमी४४।

c11.s6.25

४४ —दिव्यावदान, पृ० ३१६, पं० २३-२७

c11.s6.26

फुट्टक—ठीक ठीक तो नहीं कहा जा सकता पर ऐसा अनुमान होता है कि शायद यह शब्द छींट अथवा चूंदरी के लिए आया है । इस कपड़े की काफी मांग थी । सोपारा में ऐसी दूकानें (फुट्टक वस्त्रााकारि) थीं जहां केवल यही कपड़ा बिकता था४५ ।

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४५ —वही, पृ० २४, पं० ७

c11.s6.28

पुष्पपट्ट—फूलदार कपड़ा । यह ठीक पता नहीं चलता कि फूल बिने हुए, छपे हुए अथवा कसीदा किए होते थे४६ । सम्भव है जामदानी से तात्पर्य हो ।

c11.s6.29

४६ —ललितविस्तर, पृ० १४१, पं० २०; पृ० ३६८, पं० १४