Pracin Bharatiya Veshabhusha c13.s15: विवाह में कपड़े देने की प्रथा
Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c13.s15
- Language
- Hindi
विवाह में कपड़े देने की प्रथा
c13.s15.1
शान-शौकत और लेन-देन की प्रथा इस देश में विवाह की एक खास बात है । इस अवसर पर बराती और घराती दोनों दिखाव बनाव में एक दूसरे से होड़ लगाते हैं। इस प्रथा की प्राचीनता हमें हर्षचरित से लगता है। हर्ष की बहन राज्यश्री के विवाह के समय राज महल में अच्छे से अच्छे कपड़े दहेज में देने के लिए सजाये गए थे । क्षौम, सूती कपड़े (बादर), दुकूल, लालातंतूज, नेत्र और अंशुक इन कपड़ों में मुख्य थे ।१०६ यह ठीक पता नहीं लगता कि नेत्र क्या था । कावेल के अनुसार यह कलाबत्तू और रेशम से बिना एक तरह का वस्त्र होता था । अमरकोश१०७ के टीकाकार क्षीरस्वामी के मत से नेत्र एक वृक्ष विशेष की छाल के रेशे से बनता था । १४ वीं सदी तक बंगाल में नेत्र अथवा नेत एक मजबूत रेशमी कपड़े को कहते थे । नेत की पाचड़ी पहनी और बिछाई जाती थी१०८ । श्री कावेल ने लालातंतुज का अर्थ स्पाइडर्स सिल्क अर्थात् बहुत महीन रेशमी कपड़ा किया है । इस संबंध में हम निशीथ चूर्णि की तिरीटपट्ट की व्याख्या की ओर ध्यान दिला देना चाहते हैं। यह तिरीटपट्ट कीड़ों के लार से बना माना गया है । ये कीड़े मलय वृक्ष के पत्तों पर अपनी लार इकट्ठा करते थे और उसके ऊपरी भाग से तिरीटपट्ट बनता था । जो भी हो पता ऐसा लगता है कि लालातंतुज किसी बहुत पतले रेशमी पारदर्शी कपड़े का नाम था ।
c13.s15.2
१०७ अ० को०, वही, पृ० ३१३
Cites (2)
- Harṣacarita — Bāṇabhaṭṭa, Sanskrit
- Nāmaliṅgānuśāsana (Amarakośa) — Classical Tibetan