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Pracin Bharatiya Veshabhusha c13.s20: गुप्तयुग में स्त्रियों के वस्त्र पहनने के ढंग

Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c13.s20

Language
Hindi

गुप्तयुग में स्त्रियों के वस्त्र पहनने के ढंग

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गुप्तयुग के साहित्य में विशेषतः कालिदास के नाटकों और बाण भट्ट की आख्यायिकाओं से तत्कालीन वेशभूषा पर काफी प्रकाश पड़ता है । स्त्रियां साड़ी और चादर के सिवाय वैकक्ष्य भी पहिनती थीं। सावित्री के पहिरावे का वर्णन करते हुए बाण भट्ट कहते हैं कि उनके अंग पर एक शाल (गात्रिका) था, जिसकी गट्ठी स्तनों के बीच बंधी थी,११५ और उसका वैकक्ष्य बाएं कंधे से होता हुआ दाहिने हाथ के नीचे से जाता हुआ यज्ञोपवीत की तरह एक योगपट्ट (योग साधना के समय शरीर को बांधने वाली एक पट्टी) से बना था । स्त्रियां कभी कभी कंचुक भी पहनती थीं। मालती का पहिरावा बतलाते हुए बाण कहते हैं कि वह सांप के केंचुल से भी हलका और पैर के अंगूठों तक लहराता हुआ (प्रपदीन) धुले हुए सफेद नेत्र का बना

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११५ स्तनमध्य-गात्रिका-ग्रन्थि; योगपट्टेन विरचित वैकक्ष्य, हर्षचरित, पृ० ६,

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हुआ कंचुक पहने थी११६। उस कंचुक के नीचे रंग बिरंगे चूनरों से सुसज्जित केसरिया चंडात्तक था । यहाँ पुलकबंध से गुजरात और राजपूताने की बांधणी अथवा चूनरी से मतलब है । बाण के अनुसार थानेश्वर की स्त्रियां चोली पहनती थीं११७।

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११६ —तिरोहिततनुतला, कृत बहुसूरंग-पाटलं, पुलकबंध-चित्रं-चण्डात्तकभन्तःस्फुटम्, हर्षचरित, पृ० २६१, धौत-धवल-नेत्र-निर्मितेन निर्मोक-लघुतरेण प्रपदीनेन कंचुकेन

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११७ —हर्षचरित, पृ० ८३

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स्त्रियां कभी कभी सुंदर नक्काशीदार कपड़े पहनती थीं । बाण भट्ट ने एक जगह एक देवी को एक मलमल की चादर पहने दिखलाया है जिसमें सैकड़ों तरह के तरह तरह के पुष्प और चिड़ियों के नकशे बने थे और जो मंद वायु के धीमें झोंकों से तरंगित हो रही थी११८।

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११८ —बहुविध-कुसुम-शकुनिशत-क्षोभितात्तपवन-चलितस्तनुतरंगादतिस्वच्छादंशुकात्, हर्षचरित, पृ०६६

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