Pracin Bharatiya Veshabhusha c13.s39: रेशमी कपड़ों की अनुमति
Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c13.s39
- Language
- Hindi
रेशमी कपड़ों की अनुमति
c13.s39.1
ऐसा प्रतीत होता है कि संपूर्ण भारतवर्ष में बौद्ध भिक्षु बढ़िया घटिया दोनों तरह के
c13.s39.2
रेशमी वस्त्र पहन सकते थे और इस संबंध में किसी प्रतिषेधात्मक आज्ञा को इत्सिंग ठीक नहीं समझते थे । उनकी राय में यह बात हास्यास्पद थी कि कठिनता से मिलने वाला क्षोम तो विहित था पर आसानी से मिलने वाला रेशमी वस्त्र अविहित । इत्सिंग उस मत की आलोचना करता है जिसके अनुसार रेशमी वस्त्र इसलिए नहीं पहिनना चाहिए क्योंकि वह जीवों को मार कर बनता था । इत्सिंग इस तर्क की हंसी करता हुआ कहता है कि जीव हिंसा का यह सिद्धान्त अगर अपनी चरम सीमा पर पहुंचा दिया जाय तो भिक्षुओं को प्रायः सब चीजें छोड़ देनी होंगी२२१। रेशमी वस्त्रों के प्रति इत्सिंग का यह प्रेम शायद इसलिए है कि वह उस देश का वासी था जहां रेशम तो बहुत होता था पर क्षोम कठिनाई से मिलता था । इस तर्क से इत्सिंग के वैज्ञानिक विचार का भी पता चलता है ।
c13.s39.3
२२१ वही, पृ० ५५
c13.s39.4
बौद्ध निकाय के चारों भेद के अनंतर उनके मानने वाले भिक्षुओं के निवसन पहनने के ढंग के अंतरों से मिलता है । मूल सर्वास्तिवादी भिक्षु अपने निवसन के छोर कमरबंद के बाहर निकाल देते थे । महासांघिक भिक्षु निवसन का दाहिना छोर बायीं ओर ले जाकर कमरबंद में कस कर खोंस लेते थे । स्थविर निकायवादी और सम्मित निकायवादी भिक्षु अपने निवसन महासांघिक भिक्षुओं की तरह पहनते थे, सिवाय इसके कि पहले दोनों अपने निवसनोँ के छोर बाहर छोड़ देते थे और महासांघिक उनको कस कर कमर में खोंस लेते थे । इन चारों निकाय के भिक्षुओं के कमरबंद भी भिन्न भिन्न तरह के होते थे२२३ ।
c13.s39.5
२२३ वही, पृ० ६६-६७
Cites (2)
- Mūlasarvāstivāda-vinaya — Sanskrit
- Mahāsāṃghika-vinaya — Classical Chinese