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Pracin Bharatiya Veshabhusha c13.s6: जैन साहित्य में वस्त्रों के भेद

Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c13.s6

Language
Hindi

जैन साहित्य में वस्त्रों के भेद

c13.s6.1

जैसा हम पहले कह आये हैं जैन साहित्य में वस्त्रों की अनेक तालिकाएं आती हैं। इन तालिकाओं में बहुत से वस्त्रों के नाम आते हैं जिनके आधार पर हम इस युग के वस्त्र की निम्नलिखित तालिका तैयार कर सकते हैं—

c13.s6.2

१—जंगिय—जंगिय ऊनी कपड़े को कहते थे टीका में इसे जंगमोष्ट्राणूर्णा निष्पन्नं कहा गया है इससे पता लगता है कि यह वस्त्र ऊंट के बाल से बनता था१४।

c13.s6.3

२—भंगिय—भंगेला। अभी भी यह वस्त्र थोड़ा बहुत अलमोड़े में बनता है और इसका व्यवहार बहुत साधारण लोग करते हैं१५।

c13.s6.4

३—पोत्तग—ताड़ के पत्रों से बने कपड़े१६।

c13.s6.5

४—खोमिय—अलसी की छाल के रेशों से बना कपड़ा १७। निशीथ चूर्णि१८ में

c13.s6.6

१३ आचारांग सूत्र, २, ५, १, ३६४; ३६६; आचारांग सूत्र, १७०; निशीथ चूर्णि (लियो एडीशन,) भा० ७, पृ० ४६७

c13.s6.7

१४-१७ आचारांग, २, ५, १, १

c13.s6.8

१८ निशीथ, भा० ७, पृ० ४६७

c13.s6.9

क्षोम की व्याख्या है—पोण्डमया खोम्मा अण्णे भणंति रुक्खेहितो निग्गच्छन्ति तहा वडेहितो पादगा साहा। इस व्याख्या के अनुसार क्षौम रूई अथवा वट शाखाओं की छाल के रेशे से बनता था। टीका में जो दुविधा देख पड़ती है उससे पता चलता है कि ७वीं सदी में क्षोम का बनना कम हो गया था।

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५—तूलकड—सेंमल के सूत से बने वस्त्र।

c13.s6.11

ये पाँचों तरह के कपड़े कीमती नहीं होते थे और इसलिए जैन साधु इनका व्यवहार कर सकते थे।

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