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Pracin Bharatiya Veshabhusha c14.s26: विदूषकों की वेश-भूषा

Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c14.s26

Language
Hindi

विदूषकों की वेश-भूषा

c14.s26.1

प्राचीन भारत में, जैसा कि संस्कृत नाटकों से पता लगता है, विदूषक राजाओं को अपनी बातों और कामों से हंसाने के लिए उनके साथ रहा करते थे । १ नं० की लेण के एक भित्ति चित्र में चेट्टी१०४ से स्नेह प्रदर्शित करता हुआ विदूषक पूरे बांह का कंचुक और पटका, जिसके दोनों सिरे जुटे हैं, पहरे हैं। २ नं० की लेण के एक भित्ति चित्र में विदूषक धोती और दुपट्टा पहरे है१०५ । उसी लेण के एक दूसरे भित्ति-चित्र में सांवले रंग का विदूषक सितारों से सजा एक लंबा कंचुक, जो कमर पर एक पेटी से बंधा है, पहने है । उसका अधोवस्त्र धोती अथवा पाजामा हो सकता है । उसके पैरों में धारीदार बूट हैं (आ० ३६३)१०६ । एक दूसरी जगह विदूषक कंचुक और पीठ और कंधों को ढॉकता हुआ दुपट्टा पहने है। ये दोनों उसकी तोंद को पूरी तरह से ढंकने में असमर्थ हैं१०७ । कभी कभी विदूषक गाते बजाते अथवा एक दूसरे से लपट झपट करते दिखलाये गये हैं। १ नं० की लेण के एक भित्ति-चित्र में१०८ (आ० ३६४) दो विदूषक दिखलाये गये हैं । बायीं ओर वाला विदूषक फूलों से सजी एक गोल टोपी और धोती पहरे है । अपने साथी के गले में एक दुपट्टा डाल कर खींच रहा है । दूसरा विदूषक जो खींचा जा रहा है चरकी टोपी और धोती पहरे हैं । डा० अग्रवाल१०६ एक विचारात्मक प्रबंध में बतलाते हैं कि बाणभट्ट के युग में बहुधा उत्सवों पर लोग वृद्ध प्रतिहारियों के गले में रेशमी दुपट्टे डाल कर और उन्हें आगे खींच कर विनोद करते थे । मथुरा से मिली हुई गुप्तयुग की एक मिट्टी की तख्ती में उपरोक्त दृश्य दिखलाया गया है। इसमें एक स्त्री विदूषक के गले में दुपट्टा डाल कर उसे घसीट रही है११० । डा० अग्रवाल नागानंद नाम के सातवीं शताब्दी के एक नाटक से एक उद्धरण देते हैं, जिसमें एक चेट भागते हुए विदूषक के गले में दुपट्टा डाल कर खींचते हुए दिखलाया गया है । इस तरह के कौतुक का स्त्रोत डा० अग्रवाल के मत से पालि साहित्य के चेलुक्खेप से है जो खुशी के अवसरों पर वस्त्र हिला कर आनंद प्रकट करने की क्रिया का नाम है । ऐसे अवसरों पर कंधों से दुपट्टे उतार कर लोग उन्हें हिलाते थे । भरहुत के अर्ध चित्रों में भी एक जगह चेलुक्खेप का अंकन हुआ है ।

c14.s26.2

१०४ वही, प्ले० ४०, ५०

c14.s26.3

१०५ याजदानी, अजंटा, भा० २, प्ले० ११ बी०

c14.s26.4

१०६ वही, प्ले० २४, पृ० २२

c14.s26.5

१०७ वही, प्ले० ३५, पृ० २५

c14.s26.6

१०८ प्रिंस ऑफ वेल्स म्युजियम की प्रतिकृति से

c14.s26.7

१०६ डा० वासुदेवशरण अग्रवाल, ए पैलेस सीन ऑन ए टेराकोटा प्लाक फ्रॉम मथुरा, जे० आई० एस० ओ० ए०, १९४२, पृ० ६९-७४

c14.s26.8

११० वही, पृ० ७३

c14.s26.9

गले में दुपट्टा डाल कर कौतुक करने की रीति का अंकन मथुरा की कुषाण कालीन

c14.s26.17

मूर्तियों में भी हुआ है । मथुरा म्यूजियम में एक स्तंभ पर उत्कीर्ण नंद और सुंदरी की कथा में एक स्त्री विदूषक के गले में दुपट्टा डाल कर खींचती दिखलायी गयी है ।

c14.s26.18

१ नं० की लेण के एक दूसरे चित्र में धोती और कंचुक पहने विदूषक वीणा बजा रहा है । एक फूलों से सजी गोल टोपी पहरे चेट्टी मजीरा बजा रही है (आ० ३६५) ।

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