Pramāṇa · Search · About · API

Pracin Bharatiya Veshabhusha c14.s6: वेश-भूषा पर विदेशी प्रभाव

Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c14.s6

Language
Hindi

वेश-भूषा पर विदेशी प्रभाव

c14.s6.1

गुप्त-साम्राज्य के स्थापित होने के सैकड़ों वर्ष पहले तक उत्तर पश्चिमी भारत हिन्द-यूनानियों, शकों और कुषाणों के आधीन रहा । देशी और विदेशी संस्कृतियों के पारस्परिक संबंध और आदान-प्रदान से दोनों संस्कृतियां एक दूसरे का दृष्टिकोण समझ गयीं । मध्य एशिया का विशाल सांस्कृतिक क्षेत्र शकों और कुषाणों ने खोल कर भारतीय और चीनी

c14.s6.2

संस्कृतियों का संपर्क स्थापित किया। गुप्त युग में भारतीय संस्कृति का बृहत्तर भारत में प्रसार होने से यह देश एशिया की बहुत सी जातियों का तीर्थ क्षेत्र बन गया। अजंटा के भित्ति-चित्रों में अपने जातीय पहरावों से अलंकृत, भारतीय, अफगान, तथा मध्य एशिया वासी बुद्ध की पूजा करते दिखलाये गये हैं। यात्रियों की इस रंग बिरंगी भीड़ से और अपने जातीय पहरावे पहरे हुए व्यापारियों के वस्त्रों से इस देश की वेश-भूषा पर प्रभाव पड़ना कुछ असंभव न था। बाणभट्ट की आख्यायिकाओं से भी इस बात का पता चलता है कि सातवीं शताब्दी में यहाँ कुछ सिले विदेशी वस्त्रों का व्यवहार होता था। इसका कारण भारतीय संस्कृति का ईरानी, अफगानी और चीनी संस्कृतियों से व्यापारिक और धार्मिक संबंध था। इसी संबंध की वजह से हम अजंटा के भित्ति चित्रों में भारतीय पहरावों के सिवाय पड़ोसी देशों के पहरावों का भी अध्ययन कर सकते हैं ।

Linked texts (2)