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Pracin Bharatiya Veshabhusha c6.s14: कसीदे का काम

Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c6.s14

Language
Hindi

कसीदे का काम

c6.s14.1

पेशस्६९ शब्द का व्यवहार कारचोबी के काम वाले वस्त्रों के लिए हुआ है। इसमें कढ़े हुए अलंकार काफी फेरदार और कलात्मक होते थे७०। नृतु को पेशांसि पहने बतलाने से७१ शायद कारचोबी पेशवाज से तात्पर्य हो। कसीदा काढ़ना या उससे पेशांसि अथवा पेशवाज बनाना स्त्रियों का काम था। यजुर्वेद में पुरुषमेध में बलि देने जाने वालों में पेशकारी का नाम आया है७२। ऐतरेय ब्राह्मण७३ में निविदों को ऋचाओं का कसीदा अथवा पेशस् कहा गया है। यहाँ जो उपमा दी गई है उससे कसीदे के बारे में कुछ प्रकाश पड़ता है। इस तरह का काम (पेशस्) ताने के ऊपरी भाग (प्रवयण) तथा मध्य और निचले भागों (अवप्रञ्जन) में किया जाता था। पेशस् के इस विवरण से पता चलता है कि अलंकार कुछ बुने भी जाते थे और कुछ काढ़े भी। अगर हमारा यह अनुमान ठीक है तो कौटिल्य में वर्णित खचित नामक दुशाले जो सूचीवान कर्म से बनाये जाते थे और जिन्हें कश्मीर वाले अब भी तीलीकार और अम्लीकार का संयोग बताते हैं, और पेशस् एक थे। बृहदारण्यक उपनिषद्७४ के एक उल्लेख से पता चलता है कि पेशकारी एक अलंकार को काढ़ कर जब दूसरा काढ़ती थी तो वह पहले अलंकार से भी अधिक सुन्दर उतरता था।

c6.s14.2

६९ ऋ० वे०, ४।३६।७

c6.s14.3

७० ऋ० वे०, २।३।६

c6.s14.4

७१ ऋ० वे०, १।६२।४-५

c6.s14.5

७२ वाजसनेयी सं०, ३०।६

c6.s14.6

७३ ऐतरेय ब्रा०, ३।१०

c6.s14.7

७४ बृ० उ० ४।४।४ तद्यथा पेशकारी पेशसो मात्रामुपादायान्यतरं कल्याणतरं रूपं तनुत ।

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