Pracin Bharatiya Veshabhusha c6.s20: वैदिक साहित्य में सिले कपड़े
Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c6.s20
- Language
- Hindi
वैदिक साहित्य में सिले कपड़े
c6.s20.1
इन बेसिले कपड़ों के अतिरिक्त वैदिक साहित्य में सिले कपड़ों के भी उल्लेख हैं। अत्क९० शब्द का व्यवहार पहनने के कपड़े के अर्थ में ऋग्वेद में आया है, और इसका यही अर्थ रोथ, लुडविग्, ग्रासमान और त्तिमर ने ग्रहण किया है। अत्क केवल पुरुष पहनते थे और यह लंबा९१, पूरा शरीर ढकने वाला९२, चपक कर बैठने वाला९३, चमकीला९४, सुन्दर९५ कारचोबी किया हुआ अथवा सोने के तार से बुना हुआ९६ एक वस्त्र था। उपरोक्त विवरण से अनुमान किया जा सकता है कि अचकन या कुरते के आकार का यह कोई वस्त्र था। वैदिक युग के बाद साहित्य में फिर इसका उल्लेख नहीं आता। द्रापि चपक कर बैठने वाला९७, कारचोबी किया हुआ९८ कोटनुआ९९ कपड़ा था, जिसे पुरुष१०० और स्त्री१०१ दोनों पहनते थे।
c6.s20.2
९० ऋ० वे०, १।६५।७; ४।१८।५
c6.s20.3
९१ ऋ० वे०, २।३५।१४
c6.s20.4
९२ ऋ० वे०, ५।७४।५
c6.s20.5
९३ ऋ० वे०, ६।२६।३
c6.s20.6
९४ ऋ० वे०, ६।२६।३
c6.s20.7
९५ ऋ० वे०, ६।१०७।१३
c6.s20.8
९६ ऋ० वे०, १।१२२।२; ५।५५।६
c6.s20.9
९७ ऋ० वे०, १।१६६।१०
c6.s20.10
९८ ऋ० वे०, १।२५।१३
c6.s20.11
९९ अ० वे०, १३।३।१
c6.s20.12
१०० ऋ० वे०, ६।१००।६
c6.s20.13
१०१ अ० वे०, ५।७।१०
Cites (2)
- Ṛgvedasaṃhitā — Sanskrit
- Atharvavedasaṃhitā — Atharvan & Aṅgiras, Sanskrit