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Pracin Bharatiya Veshabhusha c6.s24: यज्ञवस्त्रों में देवताओं का निवास

Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c6.s24

Language
Hindi

यज्ञवस्त्रों में देवताओं का निवास

c6.s24.1

शतपथ के एक मंत्र से पता चलता है१२० कि यज्ञ के कपड़ों के भिन्न भिन्न भागों पर अलग अलग देवताओं के अधिकार होने का लोगों को विश्वास था। इस उल्लेख में कपड़े की बुनाई के बहुत से शब्द प्रसंगवश आ गये हैं। मंत्र के अनुसार बाने के देवता अग्नि हैं (अग्नेः पर्यासो), ताने का वायु (वायोः अनुक्षादो)। नीवि के पितृ, प्रघात के नाग, सूत (तन्तवः) के विश्वेदेवा, तथा आरोक (अलंकार) के अधिकारी नक्षत्र हैं। सब देवताओं के अधिकार होने से ही वस्त्र यजमान के योग्य होता है। तैत्तिरीय संहिता१२१ के एक मंत्र के अनुसार कपड़े के झालरदार किनारे (तूषाधानं) पर अग्नि का अधिकार होता था, वायु का वातपान पर तथा ताने (प्राचीनतान) और बाने (ओतु) पर क्रमशः आदित्यों और विश्वेदेवा के अधिकार होते थे। ऊपर के उद्धरणों से पता चलता है कि यज्ञ कार्य में आये हुए वस्त्रों की पवित्रता का विशेष ध्यान रखना पड़ता था। वस्त्र के भिन्न भिन्न भागों में देवताओं के वास से शायद यह तात्पर्य हो कि इनसे पूत होने पर वस्त्रों पर न तो जादू टोने चल सकते थे और न उनमें भूतप्रेतों का ही प्रवेश हो सकता था।

c6.s24.2

१२० श० ब्रा०, ३।२।२।१८

c6.s24.3

१२१ तै० सं०, ४।१।१