Pracin Bharatiya Veshabhusha c6.s3: खालों के वस्त्र
Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c6.s3
- Language
- Hindi
खालों के वस्त्र
c6.s3.1
जानवरों की खालों का भी वस्त्ररूप में व्यवहार होता था। देवता, मुनि, व्रात्य और देश के आदि निवासी खालों से बने कपड़े पहनते थे। इस संबंध में शतपथ ब्राह्मण११ में एक कहानी दी हुई है जिससे पता चलता है कि वैदिक सभ्यता के आरंभिक युग में आर्य गोचर्म पहना करते थे। कहानी यह है कि मनुष्य एक समय गोचर्म से आच्छादित होता था। गाय की उपादेयता का देवताओं को ज्ञान था और इसीलिए मनुष्य के शरीर से गोचर्म उन्होंने खलिया कर पुनः गायों को वापस कर दिया। खाल के बिना मनुष्य को बराबर चोटें लगा करती थीं। इसलिए उनका खोया हुआ आवरण पुनः वापस देने केलिए देवताओं ने वस्त्रों की सृष्टि की। इस कहानी से यह निष्कर्ष निकलता है कि सभ्यता के आरंभिक युग में आर्य गोचर्म पहना करते थे। इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है। जिस समय सभ्यता शिकारी अथवा पशुपालक अवस्था में थी उस समय मनुष्य पशुओं के चमड़ों से अपने बदन ढांका करते थे। प्राचीन सुमेर में भी लोग सारगान के काल तक बकरे की खाल की बनी तहमत पहना करते थे। ऐसा लगता है कि जब आर्यों की सभ्यता उन्नति के मार्ग पर आगे बढ़ी तो उन्हें गाय की आर्थिक उपयोगिता का ज्ञान हुआ और चमड़े के लिए व्यर्थ गो-हत्या का निषेध करके वे और तरह तरह के वस्त्र पहनने लगे।
c6.s3.2
११ शतपथ ब्रा०, ३।१।१३-१६