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Pracin Bharatiya Veshabhusha c6.s4: कृष्णाजिन

Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c6.s4

Language
Hindi

कृष्णाजिन

c6.s4.1

शतपथ ब्राह्मण की१२ एक दूसरी कहानी से पता लगता है कि कृष्णाजिन बहुत ही पवित्र माना जाता था। कहानी यह है कि यज्ञ की आहुति एक समय मृग का रूप धारण

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१२ शतपथ ब्रा०, १।१।४।१

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कर के देवताओं से बचने के लिए भाग गयी। देवताओं को जब इसका पता लगा तो उन्होंने उसे पकड़ कर उसकी खाल उतार लिया । उसी दिन से कृष्णाजिन पर दीक्षा दी जाने लगी और यज्ञ की आहुति के लिए धान्य भी उस पर घोटा जाने लगा। यज्ञादिक कार्यों में मृगचर्म का व्यवहार विहित है। इसी बात को साबित करने के लिए ऊपर की कहानी गढ़ी गयी है। कहानी हमारी उस पूर्वकालीन संस्कृति की ओर भी इशारा करती है जब धार्मिक कार्यों में मृगचर्मों का प्रयोग बेधड़क होता था । आज दिन भी धार्मिक कार्यों में मृगचर्म पवित्र माना जाता है।

c6.s4.4

मरुत् हिरन की खालें पहनते थे१३ । हिरन की खालें पहन कर और उन्हीं के चमड़े की बनी ढालें लेकर देवगण शत्रुओं में भय उत्पन्न करते थे१४ । मुनिगण भूरे और कमाए हुए चमड़े (पिशङ्गमला) पहनते थे१५ । ब्रात्यों के अधिनायक और उनके साथी दोहरे (द्विसंहितानि) चमड़े पहनते थे जिसमें एक काला (कृष्ण) और दूसरा सफेद (वलक्ष) होता था१६ । जंगली जातियां नाच के समय कृत्ति और दूर्श पहनती थीं१७, और अजिन भी व्यवहार में लाती थीं१८। यज्ञ के समय कृष्ण मृगचर्म पहना जाता था१९ । बकरे की खाल (अजर्षभ्यस्य अजिन) पहनी जाती थी२० । समूर के व्यापार का भी उल्लेख है२१ ।

c6.s4.5

१३ ऋ० वे०, १।१६६।१०

c6.s4.6

१४ अ० वे०, ५।२१।७

c6.s4.7

१५ अ० वे०, १०।१३६।२

c6.s4.8

१६ पञ्चविंश ब्रा०, १७।१-१५

c6.s4.9

१७ अ० वे०, ८।६।११

c6.s4.10

१८ अ० वे०, ४।७।६

c6.s4.11

१९ अ० वे०, ५।२१।७; ६।२१।८५

c6.s4.12

२० शत० ब्रा०, ३।६।१।१२; ५।२।२।२४

c6.s4.13

२१ वाजसनेयी सं०, ३०।१५; तैत्तिरीय ब्रा०, ३।२।१३।१

c6.s4.14

कुछ और तरह के भी कपड़े व्यवहार में लाये जाते थे पर उनका कोई विवरण न प्राप्त होने से उनकी पहचान में काफी कठिनाई पैदा होती है और न ठीक ठीक से यह कहा जा सकता है कि वे वनस्पतियों के किन किन रेशों से बनते थे ।

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