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Pracin Bharatiya Veshabhusha c6.s9: तार्प्य

Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c6.s9

Language
Hindi

तार्प्य

c6.s9.1

तार्प्य का उल्लेख अथर्ववेद तथा और कई जगह आया है३३ । कृष्ण यजुर्वेद३४ के अनुसार यज्ञ के अवसर पर यजमान को स्वयं तार्प्य पहनना पड़ता था। राजसूय यज्ञ३५ के अवसर पर राजा तार्प्य वस्त्र जिस पर यज्ञ के उपादानों के रूप कढ़े या टंके होते थे पहनता था। सायण और कात्यायन ने तार्प्य के बहुत से अर्थ दिये हैं। यथा क्षौम, घी में डूबा वस्त्र, तृप नाम की घास से बना हुआ, अथवा तीन बार घृत में डुबोया हुआ वस्त्र इत्यादि । तार्प्य की इन सब व्याख्याओं से यह पता चलता है कि टीकाकारों को इस शब्द के अर्थ के बारे में दुविधा थी। कुछ ऐसा भी मालूम पड़ता है कि शतपथकार को भी इस शब्द के ठीक अर्थ के बारे में शक था। गोल्डस्टुकर के मत से सहमत होते हुए एगंलिग का कहना है कि तार्प्य किसी तरह का अधोवस्त्र था३६। डा० सरकार तार्प्य को बिहार के टसर से, जो एक तरह का मोटा रेशमी कपड़ा होता है, तुलना करते हैं३७। डा० सरकार इस पहचान पर कैसे पहुंचे यह कहना कठिन है। सत्य तो यह है कि तार्प्य का ठीक ठीक अर्थ अभी हमें विदित नहीं है।

c6.s9.2

३३ अ० वे०, १८।४।३१; तै० सं०, २।४।११।६; मै० सं०, ४।४।३

c6.s9.3

३४ तै० ब्रा०, १।३।७।१

c6.s9.4

३५ श० ब्रा०, ५।३।५।२०, सर्वाणि यज्ञरूपाणि निस्यूतानि ।

c6.s9.5

३६ एगलिंग, शतपथ ब्रा०, भा० ३, पृ० ८८, फु० नो० १

c6.s9.6

३७ डा० सरकार, वही, पृ० ६, फु० नो० ५