Pracin Bharatiya Veshabhusha c7.s1: महाजानपद युग में सभ्यता का विकास
Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c7.s1
- Language
- Hindi
महाजानपद युग में सभ्यता का विकास
c7.s1.1
इस युग की सभ्यता का अध्ययन करने से यह पता चलता है कि इस युग में वैदिक युग से भारतीय सभ्यता आगे बढ़ चुकी थी। ग्राम्य सभ्यता से निकलकर भारतीय सभ्यता अब नगरों में केंद्रित होने लगी थी और इसके फलस्वरूप राजगृह, साकेत, वाराणसी, वैशाली और पुष्कलावती ऐसे बड़े बड़े नगर सभ्यता के केन्द्र बन गये थे। परिखा और प्राकारों से परिवेष्टित नगर शत्रुओं के लिए दुर्गम थे। उनकी करीनेदार सड़कें, सजी दुकानें तथा कला कौशल के कारखानें भारतीय सभ्यता के प्रतीक थे। विचार स्वतंत्रता इस युग की खास देन थी जिसके फलस्वरूप प्राचीन वैदिक धर्म की नींव हिल गयी। इस युग में बहुत सी धातुएं जैसे रांगा, सीसा, चांदी, लोहे और तांबे का खूब व्यवहार होने लगा था। राज प्रासाद और रईसों के एक या कई मंजिलों वाले प्रशस्त गृह ईंट और लकड़ी के बनने लगे
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थे। कपास, क्षौम, रेशम, और ऊनी कपड़ों का खूब चलन था। कपड़ों पर कसीदे का काम भी होता था। तरह तरह के बरतन और सज्जा के सामान जैसे कुरसियां, सिंहासन, सेज, शीशे इत्यादि लोग व्यवहार में लाते थे। लोग सोने चांदी के गहने पहनते थे और बहुत से रत्नों का उन्हें पता था।