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Pracin Bharatiya Veshabhusha c7.s17: धोती पहनने के तरीके

Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c7.s17

Language
Hindi

धोती पहनने के तरीके

c7.s17.1

इस युग में भारतीयों का पहिरावा सादा तो अवश्य होता था लेकिन उसे वे बड़े आकर्षक ढंग से पहनते थे । धोती वे निम्नलिखित तरीक़ों से पहिनते थे१०७ —

c7.s17.2

१०७ चुल्लवग्ग, ५।२९।४

c7.s17.3

हस्तिशौंडिक—अट्ठकथा के अनुसार धोती की चुन्नट वैसी ही होती थी जैसी कि चोल देश की स्त्रियों की साड़ी में । लगता ऐसा है कि धोती का एक सिरा चुन कर कमर में खोंस लिया जाता था और लटकती हुई चूनन का आकार कुछ हाथी के सूंड की तरह भासित होता था ।

c7.s17.4

मत्स्यवालक—धोती में लंबान और चौड़ान के किनारे मछली की पूंछ के आकार में सज्जित किये जाते थे ।

c7.s17.5

चतुष्कर्णक—इस प्रकार के वस्त्र विशेष में चार कोने होते थे । शायद यह दुपट्टे ऐसा कोई वस्त्र रहा हो। भरहुत में चौकोने दुपट्टे पहने (आ० २१) मनुष्य दिखलाये गये हैं । अथवा यह चाकदार जामा ऐसा कोई सिला हुआ वस्त्र था या धोती के चार छोर इसमें दिखलाई देते थे ।

c7.s17.6

तालवृन्तक—इसमें वस्त्र या धोती का चुन्नटदार छोर ताल के पंखे के आकार का होता था । पंखे के आकार के शिरोवस्त्र बहुधा अर्धचित्रों में आते हैं ।

c7.s17.7

शतवल्लिक—इस प्रकार की धोती में बहुत सी चूननें और सिलवेंट पड़ती थी ।

c7.s17.8

धोती या साड़ी पहनने में लांग पीछे बांध ली जाती थी, लेकिन भिक्षुओं के लिए लांग बांधना अविहित था ।