Pracin Bharatiya Veshabhusha c7.s4: क्षौम
Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c7.s4
- Language
- Hindi
क्षौम
c7.s4.1
दूसरे अध्याय में हम देख चुके हैं कि पिछले वैदिक काल में अतसी की छाल के रेशे से बने हुये कपड़े का व्यवहार होता था। पाणिनि ने रेशेदार पौधों में उमा१९ यानी अतसी के पौधे का भी वर्णन किया है। उमा धान्य विशेष है या नहीं इस प्रश्न को लेकर वार्तिककार कात्यायन और महाभाष्यकार पतञ्जलि के मतों में भेद है। कात्यायन उमा और भंगा को धान्य नहीं मानते और पतञ्जलि उन्हें धान्य मानते हैं। बौद्ध और जैन ग्रंथों के आधार पर तो कात्यायन की राय ठीक मालूम पड़ती है क्योंकि इनमें भंगा और उमा का व्यवहार अन्न विशेष के लिए नहीं वरन् रेशों के लिये किया गया है जिनसे कपड़े बनते थे। रामायण में क्षौम के बहुत से उल्लेख आये हैं राम की माता क्षौम (क्षौमवाससा)२० पहनती थीं, एक विमल क्षौम पहने ब्राह्मण का वर्णन है२१ और राम के नगर दर्शन के अवसर पर क्षौम और पट्ट के पांवड़े सड़कों पर बिछाए जाने का उल्लेख है२२। जातकों में क्षौम का उल्लेख आया है२३ और महावग्ग में२४ बुद्ध ने भिक्षुओं को क्षौम के चीवर बनाने की आज्ञा दी है। जैनों के आचारांग सूत्र में२५ जैन साधुओं को क्षौम पहनने की आज्ञा दी गयी है। आचारांग सूत्र में२६ कीमती वस्त्रों की तालिका में भी क्षौम आया है जिसे टीकाकार शीलांक ने सामान्य सूत का बना कपड़ा कहा है। यह अर्थ ठीक नहीं है क्योंकि क्षौम का व्यवहार कहीं भी कपास से बने कपड़े के लिए नहीं हुआ है। संभव यह है कि मोटे सूत के क्षौम साधारण रूप से जैन साधु व्यवहार कर सकते थे लेकिन बहुत बारीक सूत के कीमती क्षौम का व्यवहार उनके लिए वर्जित था।
c7.s4.2
१९ अष्टाध्यायी, ५।२।४; डा० वासुदेवशरण, यू० पी०, हि० सो० ज० (जुलाई १६४०), पृ० १०५
c7.s4.3
२० रामायण, २।६।२८
c7.s4.4
२१ रामायण, २।८।७
c7.s4.5
२२ रामायण, २।१६।९
c7.s4.6
२३ जातक, भा० ६, पृ० ४७
c7.s4.7
२४ महावग्ग, ८।१।३६
c7.s4.8
२५ आचारांग सू० १।७।२।१; २।५।१।१
c7.s4.9
२६ आचारांग सू० २।५।१।४; निशीथ चूर्णि, भा० ७, पृ० ४६७ में क्षौम का अर्थ रूई का कपड़ा (पोंण्डमया) अथवा वृक्ष विशेष की छाल से बना वस्त्र दिया है।
Cites (5)
- Jātakatthavaṇṇanā — Pāli
- Mahāvagga — Pāli
- Aṣṭādhyāyī — Pāṇini, Sanskrit
- Āyāraṃga — Sudharman, Ardhamāgadhī Prakrit
- Vālmīkirāmāyaṇa — Vālmīki, Sanskrit