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Pracin Bharatiya Veshabhusha c8.s15: वंग, कलिंग, ताम्रलिप्ति और पुंड्र

Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c8.s15

Language
Hindi

वंग, कलिंग, ताम्रलिप्ति और पुंड्र

c8.s15.1

दुकूल८४—शायद रोमन लेखकों का बाइसस ही दुकूल था८५।

c8.s15.2

८४ —महाभारत, २।४८।१७

c8.s15.3

८५ —वार्मिगटन, कामर्स बिटवीन इंडिया एंड रोमन एंपायर, पृ० २१२

c8.s15.4

कौशिक८६—ऐसा पता चलता है कि बहुत प्राचीन काल में भी बंगाल में रेशम पैदा होने लग गया था। रामायण८७ (कश्मीरी पाठ) में कोशकार देश का उल्लेख है। टीकाकार

c8.s15.5

८६ —महाभारत, २।४८।१७

c8.s15.6

८७ —सिल्वं लेवी, जून लि असिआतीक, जनवरी-फरवरी, १६१८, पृ० २१२

c8.s15.7

राम के मत से इस देश का नाम इसलिए पड़ा कि वहां रेशम के कोश काफी तादाद में पैदा होते थे। किष्किंधाकांड के बंगाली पाठ के अनुसार कोशकार देश लौहित्य नदी (ब्रह्मपुत्र) के बाद पड़ता है और इसलिए इस बात की पूरी संभावना है कि कोशकार देश कहीं पूर्वी बंगाल या आसाम में था।

c8.s15.8

पत्रोर्ण८८—कोश में इस शब्द का अर्थ रेशमी या सूती कपड़ा दिया हुआ है। अगर पत्रोर्ण का अर्थ सूती कपड़ा ठीक है तो पेरिप्लस का यह कथन ठीक है कि पहली सदी में गंजेटिक नाम की सब से अच्छी मलमल ढाका के आसपास बनती थी८९। पर इसमें शक है कि पत्रोर्ण सूती कपड़ा था।

c8.s15.9

८८ वही,

c8.s15.10

८९ शोफ, वही, पृ० ४६

c8.s15.11

कलिंग देश के नाग बुनकर अपने बढ़िया कपड़ों के लिए प्रसिद्ध थे। उनकी ख्याति इतनी बढ़ी हुई थी कि तामिल में कलिंग शब्द कपड़े का पर्यायवाची बन गया९०।

c8.s15.12

९० कनकसभाई, दि तामिल्स एट्टीन हंड्रेड इयर्स एगो, पृ० ४५

c8.s15.13

प्रावर९१—इस शब्द का प्रयोग दुपट्टे अथवा चादर के अर्थ में होता था। सांची के एक लेख९२ से ऐसा पता चलता है कि दुपट्टे बेचने वालों का (पारिवारिक) अपना स्वतंत्र व्यवसाय होता था।

c8.s15.14

९१ महाभारत, २।४८।१७

c8.s15.15

९२ मार्शल, सांची, १, पृ० ३१३

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