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Pracin Bharatiya Veshabhusha c9.s4: शुंगयुग के सिले वस्त्र

Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c9.s4

Language
Hindi

शुंगयुग के सिले वस्त्र

c9.s4.1

यह तो निश्चित है कि शुंगयुग में सिले कपड़े पहने जाते थे, लेकिन सिले कपड़े इस युग के अर्ध चित्रों में कम दिखलाये गये हैं। इसका यह कारण भी हो सकता है कि सिले कपड़ों से अंग ढक देने से उसकी गठन खूबी से नहीं दिखलायी जा सकती थी। भरहुत के अर्ध चित्रों में कोटनुमा वस्त्र दो जगह दिखलाया गया है। एक जगह वटवृक्ष की पूजा करते हुए राजा का अनुचर कोट पहने दिखाया गया है३८। कोट का छोर गुलाई लिये है और उसका गला, बांहें, मोरियां और किनारे किसी फीते से अलंकृत हैं। कोट के साथ अनुचर धोती और साफा भी पहने है। एक द्वारपाल जिसकी तुलना डा० बरुआ उत्तरापथ के देवता पिहिर से करते हैं३९ (आ० ४६) आधी जंघा तक पहुंचता एक पूरी बांह का कोट पहने हैं। कोट में दो जगह बंद लगे हैं। गले के बंद में एकहरी सकरमुद्धी और पेट के बंद पर दोहरी सकरमुद्धी लगी है। इसका बाल ललाट पर एक चौड़ी पट्टी से बंधा है। धोती से पटका नीचे लटक रहा है। पैरों में पूरे बूट हैं। बायीं ओर परतले से एक कटार लटक रही है। कम से कम पोशाक से तो यह द्वारपाल गंधार का निवासी लगता है।

c9.s4.2

३८ बरुआ, भरहुत, २, प्ले० २०

c9.s4.3

३९ वही, प्ले० ६२, ७१

c9.s4.4

कुछ शुंग कालीन मिट्टी के खिलौनों से यह भी पता चलता है कि उस युग में कोट जैसे कपड़े पहनने की चलन किसी न किसी रूप में थी। भीटा से मिली एक मिट्टी की मनुष्य मूर्ति (आ० ४७)४० चुगे की तरह पूरे बांह का एक कोट पहरे है जो सामने से खुला है और जिसमें बांधने के लिए सकरमुद्धी लगी है।

c9.s4.5

४० ए० एस० आर०, १६११-१२, पृ० १-७४, प्ले० २३, १६

c9.s4.6

शुंग युग में कंचुक पहनने की भी प्रथा थी। सांची के स्तूप नं० २ पर एक सिंह से लड़ते हुए सिपाही की आकृति है। यह सिपाही आधे बांह का घुटनों तक लटकता कंचुक पहने है जो कमरबंद से बंधा है। इसके सिर पर फुलनेदार टोपी और पैरों में बूट हैं (आ० ४८)४१। इसी स्तूप के आलंबनवाह पर एक मनुष्य चूननदार कंचुक पहने दिखाया गया है४२।

c9.s4.7

४१ कुमारस्वामी, वही, प्ले० १४, ५१

c9.s4.8

४२ मार्शल, सांची, भा० ३, प्ले० ७८, १३ बी

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