Viyahapannatti 12.1.530
Viyāhapannatti: Hindi translation (Dīparatnasāgara, 2019) 12.1.530
- Language
- Hindi
12.1.530
उस काल और उस समय में श्रावस्ती नगरी थी। कोष्ठक उद्यान था, उस श्रावस्ती नगरी में शंख आदि बहुत – से श्रमणोपासक रहते थे। (वे) आढ्य यावत् अपरिभूत थे; तथा जीव, अजीव आदि तत्त्वों के ज्ञाता थे, यावत् विचरते थे। उस ‘शंख’ श्रमणोपासक की भार्या ‘उत्पला’ थी। उसके हाथ – पैर अत्यन्त कोमल थे, यावत् वह रूपवती एवं श्रमणोपासिका थी, जीव – अजीव आदि तत्त्वों की जानने वाली यावत् विचरती थी। उसी श्रावस्ती नगरीमें पुष्कली नामका श्रमणोपासक रहता था। वह भी आढ्य यावत् जीव – अजीवादि तत्त्वों का ज्ञाता था यावत् विचरता था।
उस काल और उस समय में महावीर स्वामी श्रावस्ती पधारे। परीषद् वन्दन के लिए गई, यावत् पर्युपासना करने लगी। तत्पश्चात् वे श्रमणोपासक भी, आलभिका नगरी के श्रमणोपासक के समान उनके वन्दन एवं धर्म – कथाश्रवण आदि के लिए गए यावत् पर्युपासना करने लगे। श्रमण भगवान महावीर ने उन श्रमणोपासकों को और महती महापरीषद् की धर्मकथा कही। यावत् परीषद् वापिस चली गई। वे श्रमणोपासक भगवान महावीर के पास धर्मोपदेश सूनकर और अवधारण करके हर्षित और सन्तुष्ट हुए। उन्होंने श्रमण भगवान महावीर को वन्दन – नमस्कार किया, प्रश्न पूछे, तथा उनका अर्थ ग्रहण किया। फिर उन्होंने खड़े होकर श्रमण भगवान महावीर को वन्दन – नमस्कार किया और कोष्ठक उद्यान से नीकलकर श्रावस्ती नगरी की ओर जाने का विचार किया।
Translations (2)
- Viyāhapannatti: Gujarati translation (Dīparatnasāgara, 2020) — Gujarati
- English (machine translation) — English, machine translation
Commentaries (1)
- Viyāhapannatti: ṭīkānusārī vivecana — Muni Dīparatnasāgara 2000, Gujarati
Linked texts (1)
- Viyāhapannatti — Sudharman, Ardhamāgadhī Prakrit