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भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c18: १२—मध्यदेशी लिपि

भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c18

Language
Hindi

१२—मध्यदेशी लिपि

c18.1

ई. स. की पांचवीं से नवीं शताब्दी के आस पास तक (लिपिपत्र ४१-४२).

c18.2

१ ये मूल पंक्तियां रणग्रह के दानपत्र से हैं.

c18.3

२ ज. बंब. ए. सो; जि. १६, पृ. २ और ३ के बीच के सेटों से.

c18.4

४ ये मूल पंक्तियां गुजरात के राष्ट्रकूट राजा कर्कराज के दानपत्र से हैं.

c18.5

मध्यदेशी लिपि का प्रचार मध्यप्रदेश, बुंदेलखंड, हैदराबाद राज्य के उत्तरी विभाग तथा मईसोर राज्य के कुछ हिस्सों में ई. स. की पांचवीं से नवीं शताब्दी के आस पास तक रहा. यह लिपि गुप्तों५, वाकाटकवंशियों६, शरभपुर के राजाओं७, महाकोशल के कितने एक सोम(गुप्त)वंशी

c18.6

५ फ्ली; गु. इं; लेख २-३. इन्हीं लेखों की लिपि पर से वाकाटकों आदि के दानपत्रों की लिपि निकली हो.

c18.7

६ ऐं. इं; जि. ३, पृ. २६०-६२. जि. ६, पृ. २७०-७१. इं. ऐं; जि. १२, पृ. २४२-५. फ्ली; गु. इं; लेखसंख्या ५३-६. आ. स. वे. इं; जि. ४, सेट ५६, लेखसंख्या ४, सेट ५७ लेखसंख्या ३.

c18.8

७ ऐं. इं; जि. ६, पृ. ३२३-४. फ्ली; गु. इं; लेख संख्या ४०-४१.

c18.9

राजाओं१ तथा कुछ कदंबों२ के दानपत्रों या शिलालेखों में मिलती है. इस लिपि के दानपत्र अधिक और विस्तृत रूप में मिलते हैं, शिलालेख कम और बहुधा छोटे छोटे. इसके अक्षर लंबाई में अधिक और चौड़ाई में कम होते हैं, उनके सिर चौकूंटे या संदूक की आकृति के बहुधा भीतर से खाली, परंतु कभी कभी भरे हुए भी, मिलते हैं और अक्षरों की आकृति बहुधा समकोणवाली होती है (देखो, ऊपर पृ. ४३). इससे इस लिपि के अक्षर साधारण पाठक को विलक्षण प्रतीत होते हैं परंतु इन दो बातों को छोड़ कर देखा जावे तो इस लिपि में और पश्चिमी लिपि में बहुत कुछ समता है. इस लिपि पर भी पश्चिमी लिपि की नांई उत्तरी शैली का प्रभाव पड़ा है.

c18.10

लिपिपत्र ४१ वां..

c18.11

यह लिपिपत्र वाकाटकवंशी राजा प्रवरसेन(दूसरे) के दूदिया३ सिवनी४ और चम्मक५ के दानपत्रों से तय्यार किया गया है. दूदिया तथा सिवनी के दानपत्रों के अक्षरों के सिर चौकूंटे और भीतर से खाली हैं तथा अधिकतर अक्षर समकोणवाले हैं, परंतु चम्मक के दानपत्र के अक्षरों के चौकूंटे सिर भीतर से भरे हुए हैं और समकोणवाले अक्षरों की संख्या कम है. दूदिया के दानपत्र से उद्धृत किये हुए अक्षरों के अंत में जो ‘इ’, ‘ऊ’ और ‘औ’ अक्षर दिये हैं वे उक्त दानपत्र से नहीं हैं. ‘ऊ’ अजंटा की गुफा के लेखसंख्या ३ की पंक्ति १७ से६ और ‘औ’ महासुदेवराज के रायपुर के दानपत्र की १० वीं पंक्ति७ से लिया है. उक्त तीनों दानपत्रों में कोई प्रचलित संवत् नहीं दिया परंतु यह निश्चित है कि प्रवरसेन(दूसरा) गुप्तवंशी राजा चंद्रगुप्त दूसरे (देवगुप्त) की पुत्री प्रभावतीगुप्ता का पुत्र था और चंद्रगुप्त दूसरे के समय के लेख गुप्त संवत् ८२ से ६३ (ई. स. ४०१-१२) तक के मिले हैं. ऐसी दशा में प्रवरसेन (दूसरे) का ई. स. की पांचवीं शताब्दी के प्रारंभ के आस पास विद्यमान होना निश्चित है.

c18.12

३ ऐं. इं; जि. ३, पृ. २६० और २६१ के बीच के सेट.

c18.13

५ फ्ली; गु. इं; सेट ३४.

c18.14

६ आ. स. वे. इं; जि. ४, प्लेट ५७.

c18.15

७ फ्ली; गु इं; प्लेट २७.

c18.16

लिपिपत्र ४१वें की मूल पंक्तियों८ का नागरी अक्षरांतर—

c18.17

८ ये मूल पंक्तियां प्रवरसेन (दूसरे) के दूदिया के दानपत्र से हैं.

c18.18

दृष्टम् प्रवरपुरात् अग्निष्टोम(मा)प्तोर्यामोक्थ्यषोडश्यतिरा(रा)त्रवाज-
पेयाबृहस्पतिसवसाद्यस्कचतुरश्वमेधयाजिनः विष्णोर्वृद्धसगो-
त्रस्य सम्राटः(जो) वाकाटकानामम्महाराजश्रोप्रवरसेनस्य सूनोः
सूनोः अत्यन्तस्वामिमहाभैरवभक्तस्य अंसभारसन्निवेशितशि···लि-

c18.19

लिपिपत्र ४२ वां.

c18.20

२ इं. ऐं; जि. २१, पृ. ६३. रा; ऐं. क; जि. ७, पृ. २०० के पास का सेट.

c18.21

४ फ्ली; गु इं; सेट ३५ वां.

c18.22

यह लिपिपत्र बालाघाट से मिले हुए वाकाटकवंशी राजा पृथिवीसेन(दूसरे) के९, खरिअर से मिले हुए राजा महासुदेव१० के और राजीम से मिले हुए राजा तीवरदेव के११ दानपत्रों से तय्यार किया गया है. तीवरदेव के दानपत्र में ‘इ’ की दो बिंदियों के ऊपर की आड़ी लकीर में विलक्षण मोड़ डाला है.

c18.23

१ ऐं. इं; जि. ७, पृ. १०४-६. जि. ६, पृ. १७२-३. फ्ली; गु. इं; लेखसंख्या ८१.

c18.24

९ ऐं. इं; जि. ६, पृ. २७० और २७१ के बीच के प्लेटों से.

c18.25

१० ऐं. इं; जि. पृ. १७२ और १७३ के बीच के प्लेटों से.

c18.26

११ फ्ली; गु. इं; प्लेट ४५ से.

c18.27

खरिअर और राजीम के दानपत्रों का समय अनुमान से लगाया है क्योंकि उनका निश्चित समय स्थिर करने के लिये अब तक ठीक साधन उपलब्ध नहीं हुए.

c18.28

लिपिपत्र ४२ वें की मूल पंक्तियों१ का नागरी अक्षरांतर—

c18.29

स्वस्ति शरभपुराद्विक्रमोपनतसामन्तमकुटचूडामणिप्रभाप्रसे-
काम्बुधौतपादयुगलो रिपुविलासिनीसीमन्तोद्धरणहेतुर्व्वसुवसु-
धागोप्रद परंभागवतो मातापिच(तृ)पादानुध्यातश्री महासुदेवराजः
क्षितिमण्डलाहारौयनवन्नकएतत्प्रावेश्यशाम्बिलकयो प्रतिवासिकुटु-
म्बिनस्समाज्ञापयति ॥ विदितमस्तु वो यथास्माभिरेतद्वामद्व-
यं तृ(त्रि)दशपतिसदनसुखप्रतिष्ठाकरो(रं) यावद्रविशशिताराकिरणप्र-