भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c18.11
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c18.11
- Language
- Hindi
c18.11
यह लिपिपत्र वाकाटकवंशी राजा प्रवरसेन(दूसरे) के दूदिया३ सिवनी४ और चम्मक५ के दानपत्रों से तय्यार किया गया है. दूदिया तथा सिवनी के दानपत्रों के अक्षरों के सिर चौकूंटे और भीतर से खाली हैं तथा अधिकतर अक्षर समकोणवाले हैं, परंतु चम्मक के दानपत्र के अक्षरों के चौकूंटे सिर भीतर से भरे हुए हैं और समकोणवाले अक्षरों की संख्या कम है. दूदिया के दानपत्र से उद्धृत किये हुए अक्षरों के अंत में जो ‘इ’, ‘ऊ’ और ‘औ’ अक्षर दिये हैं वे उक्त दानपत्र से नहीं हैं. ‘ऊ’ अजंटा की गुफा के लेखसंख्या ३ की पंक्ति १७ से६ और ‘औ’ महासुदेवराज के रायपुर के दानपत्र की १० वीं पंक्ति७ से लिया है. उक्त तीनों दानपत्रों में कोई प्रचलित संवत् नहीं दिया परंतु यह निश्चित है कि प्रवरसेन(दूसरा) गुप्तवंशी राजा चंद्रगुप्त दूसरे (देवगुप्त) की पुत्री प्रभावतीगुप्ता का पुत्र था और चंद्रगुप्त दूसरे के समय के लेख गुप्त संवत् ८२ से ६३ (ई. स. ४०१-१२) तक के मिले हैं. ऐसी दशा में प्रवरसेन (दूसरे) का ई. स. की पांचवीं शताब्दी के प्रारंभ के आस पास विद्यमान होना निश्चित है.