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भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c24.13

भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c24.13

Language
Hindi

c24.13

लकीर है जो अक्षर के ऊपर के भाग या मध्य को काटती हुई लगती है (देखो, इ, कि, गि, चि, जि, ठि, णि, ति, मि, शि और सि). 'उ' की मात्रा सीधी आड़ी या घुमावदार लकीर है जो अक्षर के नीचे के अंत (या कभी कुछ ऊंचे) से बाईं ओर जुड़ती है (देखो, उ, गु, चु, तु, धु, नु, यु, बु और हु). 'ए' की मात्रा एक तिरछी या खड़ी लकीर है जो बहुधा अक्षर के ऊपर के भाग के साथ और कभी कभी मध्य में ऊपर की तरफ़ जुड़ती है (देखो, ए, जे, ते, ने, दे, ये और षे). 'ओ' की मात्रा एक तिरछी रेखा है जो बहुधा अक्षर के मध्य से बाईं ओर को झुकती हुई लगती है (देखो, ओ, चो, नो, मो और सो, परंतु 'यो' में उसका झुकाव दाहिनी ओर है). अनुस्वार का चिह्न एक आड़ी सीधी या वक्र रेखा है जो बहुधा अक्षर के अंत भाग से सटी रहती है (देखो, अं, थं, रं, वं और षं) परंतु कभी कभी अक्षर की खड़ी लकीर के अंत से कुछ ऊपर उक्त खड़ी लकीर को काटती हुई भी लगती है (देखो, ञं, नं और हं). 'मं' (प्रथम) के साथ का अनुस्वार का चिह्न 'म' से विलग नीचे को लगा है, 'मं' (दूसरे) में दाहिनी ओर भिन्न रूप में जुड़ा है और 'यं' के साथ उसके दो विभाग करके 'य' की नीचे को झुकी हुई दोनों तिरछी रेखाओं के अंतों में एक एक जोड़ा है. इन लेखों में रेफ कहीं नहीं है. रेफ को या तो संयुक्ताक्षर का दूसरा अक्षर बनाया है (जैसे कि 'सर्व' को 'सव्र') या उसको पूर्व के अक्षर के नीचे 'र' के रूप से जोड़ा है ('प्रियदर्शी' को 'प्रियद्रशि', 'धर्म' को 'ध्रम' आदि). संयुक्ताक्षर में दूसरे 'र' के लिये एक आड़ी, तिरछी या कुछ गोलाईदार लकीर है जो व्यंजन के नीचे के अंत के साथ दाहिनी ओर जुड़ती है, परंतु कहीं कहीं 'र' का योग न होने पर भी ऐसी लकीर अधिक जुड़ी हुई मिलती१ है जिससे यह संदेह रह जाता है कि कहां यह अनावश्यक है और कहां ठीक है ('प्रियद्रशि पढ़ें या 'पियदशि'; 'सव्रप्रषंडनि' या 'सवपषंडनि' आदि). संयुक्ताक्षरों में कहीं कहीं भिन्न वर्षों के रूप स्पष्ट नहीं हैं (देखो, न्त्रि).