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भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c24.51

भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c24.51

Language
Hindi

c24.51

१३ भारतवर्ष की किसी प्राचीन प्राकृत भाषा में ‘भगवत्’ का ‘भगवद’ और ‘अग्रभाग’ का ‘अग्रभग’ रूप नहीं होता. ऐसी दशा में जैसे अशोक के खरोष्ठी लेखों में ‘त्य’ (देखो, ऊपर पृ. ६६) के ‘त’ के नीचे ऐसी ही लकीर लगी है वहां ‘रँ’ किसी तरह पढ़ा नहीं जा सकता वैसे ही ‘अग्रवद’ और ‘अग्रभग’ आदि पढ़ना अशुद्ध ही है. अशोक के लेखों में (देखो, लिपिपत्र ६५) जैसे ‘ज’ (दूसरे), और ‘म’ (चौथे), तथा ग्रीकों के सिक्कों में (लिपिपत्र ६६) ‘ज’ (पांचवें, छठे और सातवें), त (दूसरे, तीसरे और चौथे), ‘न’ (पहिले व दूसरे), ‘म’ (पहिले) और ‘स’ (पहिले) के नीचे दोनों तरफ निकली हुई आड़ी लकीरें बिना किसी आशय के लगी मिलती हैं वैसे ही इस लेख में इस लकीर का होना संभव है; जो कलम को उठा कर दोनों तरफ निकली हुई न बना कर चलती कलम से दाहिनी ओर ही बना दी जान पड़ती है. इसलिये इस रेखा को पूरे ‘ग’ का अंश ही मानना चाहिये. ऐसे ही ‘भि’ के साथ ऐसी लकीर कहीं कहीं निरर्थक लगी है जहां उसको या तो ‘भि’ का अंश ही मानना चाहिये अथवा उसको ‘भिम’ पढ़ना चाहिये. जहां ‘र’ की संभावना हो वहीं ‘भ्रि’ पढ़ना चाहिये.

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