भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c24.6
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c24.6
- Language
- Hindi
c24.6
नये अक्षरों तथा ह्रस्व स्वरों की मात्राओं की योजना कर मामूली पढ़े हुए लोगों के लिये; जिनको शुद्धा-शुद्ध की विशेष आवश्यकता नहीं रहती थी, काम चलाऊ लिपि बना दी (देखो, ऊपर पृ. ३५-३६). यह लिपि फ़ारसी की नांई दाहिनी ओर से बाईं ओर लिखी जाती है और आ, ई, ऊ, ऋ, ऐ और औ स्वर तथा उनकी मात्राओं का इसमें सर्वथा अभाव है. संयुक्त व्यंजन भी बहुत कम मिलते हैं, जिनमें भी कितने एक में तो उनके घटक व्यंजनों के अलग अलग रूप स्पष्ट नहीं होते किंतु उनका एक विलक्षण ही रूप मिलता है, जिससे कितने एक संयुक्त व्यंजनों का पढ़ना अभी तक संशययुक्त ही है. इसके लेख भारतवर्ष में विशेष कर पंजाब से ही मिले हैं अन्यत्र बहुत कम. यह लिपि ईरानियों के राजत्वकाल के कितने एक चांदी के मोटे और भद्दे सिक्कों, मौर्यवंशी राजा अशोक के शहबाज़गढ़ी और मानसेरा के चटानों पर खुदे हुए लेखों, एवं शक, क्षत्रप, पार्थिअन और कुशनवंशी राजाओं के समय के बौद्ध लेखों और बाकट्रियन ग्रीक, शक, छत्रप, पार्थिअन, कुशन, औदुंबर आदि राजवंशों के कितने एक सिक्कों पर या भोजपत्रों पर लिखे हुए प्राकृत पुस्तकों में मिलती है. इस लिपि के शिलाओं आदि पर खुदे हुए लेखों की, जो अब तक मिले हैं, संख्या बहुत कम१ है. ई. स. की तीसरी शताब्दी के आस पास तक इस लिपि का कुछ न कुछ प्रचार पंजाब की तरफ़ बना रहा जिसके बाद यह इस देश से सदा के लिये उठ गई और इसका स्थान ब्राह्मी ने ले लिया (विशेष वृत्तान्त के लिये देखो, ऊपर पृ. ३१-३७).