भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c25.s4: अक्षरों से अंक बतलाने की भारतीय शैली
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c25.s4
- Language
- Hindi
अक्षरों से अंक बतलाने की भारतीय शैली
c25.s4.1
ज्योतिष आदि के श्लोकबद्ध ग्रंथों में प्रत्येक अंक के लिये एक एक शब्द लिखने से विस्तार बढ़ जाता था जिसको संक्षेप करने के लिये अक्षरों से अंक प्रकट करने की रीतियां निकाली गईं. उपलब्ध ज्योतिष के ग्रंथों में पहिले पहिल इस शैली से दिये हुए अंक आर्यभट (प्रथम) के ‘आर्यभटीय’ (आर्यसिद्धांत) में मिलते हैं जिसकी रचना ई. स. ४९९१३ में हुई थी. उक्त पुस्तक में अक्षरों से अंक नीचे लिखे अनुसार बतलाये हैं१४—
c25.s4.2
१ चतुष्टोमेन कृतेन जयनां (श. ब्रा; १३. ३. २. १).
c25.s4.3
३ दक्षिणा गायत्रीसम्पन्ना ब्राह्मणस्य ॥ २१ ॥ इस पर टीका—गायत्रीसम्पन्ना गायत्र्यक्षरसमानसंख्याचतुर्विंशतिर्गवो दक्षिणा ॥ जग-त्या राज्ञः ॥ २२ ॥ इस पर टीका—जगत्या सम्पन्ना राज्ञः सङ्ख्यये प्रकृतदक्षिणाः। जगत्यक्षरसमानसंख्या अष्टाचत्वारिंशद्गावो भवन्ति। (का. श्रौ. सू; वेबर का संस्करण; पृ. १०१५).
c25.s4.4
४ गायत्रीसंपन्ना दक्षिणा ब्राह्मणो दद्यात् जगतीसंपन्ना राजा (ला. श्रौ. सू; प्रपाठक ६, कंडिका ४, सूत्र ३१). इस पर टीका—गायत्रीसंपन्नाचतुर्विंशतिः। ...। जगतीसंपन्ना अष्टाचत्वारिंशत्।
c25.s4.5
९ देखो, ऊपर पृ. ११७ टि. ‡.
c25.s4.6
१३ सु; ग. त; पृ. २.
c25.s4.7
१४ वर्गाक्षराणि वर्गेऽवर्गेऽवर्गाक्षराणि कात् ङमौ यः। खद्विनवके स्वरा नव वर्गेऽवग्रे नवान्त्यवर्गे वा॥ (आर्यभटीय, आर्या १).
c25.s4.8
क् = १. ख् = २. ग् = ३. घ् = ४. ङ् = ५. च् = ६. छ् = ७. ज् = ८. झ् = ९. ञ् = १०. ट् = ११. ठ् = १२. ड् = १३. ढ् = १४. ण् = १५. त् = १६. थ् = १७. द् = १८. ध् = १९. न् = २०. प् = २१. फ् = २२. ब् = २३. भ् = २४. म् = २५. य् = ३०. र् = ४०. ल् = ५०. व् = ६०. श् = ७०. ष् = ८०. स् = ९०. ह् = १००. अ = १. इ = १००. उ = १००००. ऋ = १००००००. ऌ = १००००००००. ए = १००००००००००. ऐ = १००००००००००००. ओ = १००००००००००००००. औ = १००००००००००००००००.
c25.s4.9
४ आर्यभट प्रथम ने 'यगवरिवभगणाः ख्युघृ शशिनश्चयगियिङुशुछ्लृ कु ङिशिबुण्लृष्वप्राक.' इस आधी आर्या से महायुग में होनेवाले सूर्य (४३२००००) और चंद्र (५७७५३३३६) के भगण तथा भूभ्रम (१५८२२३७५००) की संख्या दशगुणोत्तर संख्या के क्रम से बतलाई है जिसका ब्यौरा नीचे अनुसार है— 'ख्युघृ'. ख्यु = ३२०००० घृ = ४०००००० —————— 'चयगियिङुशुछ्लृ'. च = ६ य = ३० गि = ३०० यि = ३००० ङु = ५०००० शु = ७००००० छ्लृ* = ५७०००००० —————— ङिशिबुण्लृष्वृ. ङि = ५०० शि = ७००० बु = २३०००० ण्लृ† = १५०००००००० ष्वृ = ८२०००००० ——————
c25.s4.10
इस शैली में स्वरों में ह्रस्व दीर्घ का भेद नहीं है. व्यंजन के साथ जहां स्वर मिला हुआ होता है वहां व्यंजनसूचक अंक को स्वरसूचक अंक से गुणना१ होता है और संयुक्त व्यंजन के साथ जहां स्वर मिला होता है वहां उक्त संयुक्त व्यंजन के प्रत्येक घटक व्यंजन के साथ वही स्वर माना जाता है जिससे प्रत्येक व्यंजन सूचक अंक को उक्त स्वर के सूचक अंक से गुण कर गुणनफल जोड़ना पड़ता है२. इस शैली में कभी कभी एक ही संख्या भिन्न अक्षरों से भी प्रकट होती है३. ज्योतिष के आचार्यों के लिये आर्यभट की यह शैली बहुत ही संक्षिप्त अर्थात् थोड़े शब्दों में अधिक अंक प्रकट करनेवाली थी परंतु किसी पिछले लेखक ने इसको अपनाया नहीं और न यह शैली प्राचीन शिलालेखों तथा दानपत्रों में मिलती है, जिसका कारण इसके शब्दों का कर्णकटु होना हो अथवा आर्यभट के भूभ्रमणवादी होने से आस्तिक हिंदुओं ने उसका बहिष्कार किया हो.
c25.s4.11
२ 'ख्यु' (ख् + घृ) = ख् × ऋ + घ् × ऋ = २ × १०००००० + ८० × १०००००० = २०००००० + ८००००००० = ८२००००००. 'ख्यु' (ख् + यु) = ख् × उ + य् × उ = २ × १०००० + ३० × १०००० = २०००० + ३००००० = ३२०००००.
c25.s4.12
३ 'ङ्म' = ङ् × अ + म × अ = ५ × १ + २५ × १ = ५ + २५ = ३०; यही अंक (३०) 'य' से भी सूचित होता है (ङ्मौ यः; आ. १.). कि = क् × इ = १ × १०० = १००; यही अंक 'ह' से भी प्रकट होता है.
c25.s4.13
आर्यभट (दूसरे) ने, जो लल्ल और ब्रह्मगुप्त के पीछे परंतु भास्कराचार्य से पूर्व अर्थात् ई. स. की ११ वीं शताब्दी के आसपास हुआ, अपने 'आर्यसिद्धांत' में १ से ९ तक के अंक और शून्य ० के लिये नीचे लिखे अक्षर माने हैं५.—
c25.s4.14
१ 'ङि' = ङ् × इ = ५ × १०० = ५००. 'बु' = ब् × उ = २३ × १०००० = २३००००; 'एल्' = ण् × ऌ = १५ × १०००००००० = १५००००००००.
c25.s4.15
५ रूपात्कटपयपूर्वा वर्णा वर्णक्रमाद्भवेन्त्यङ्काः। नवो शून्यं प्रथमार्थे ञञौ वर्गे तृतीयार्थे (आर्यसिद्धांत, अधिकार १।२)
* 'छ्लृ' में 'लृ' स्वर नहीं है किंतु 'ऋ' है (छ् × ऋ + ल् × ऋ). † 'एल्' में 'लृ' स्वर है (ण् × लृ).
c25.s4.16
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | ० |
| क् | ख् | ग् | घ् | ङ् | च् | छ् | ज् | झ् | ञ् |
| ट् | ठ् | ड् | ढ् | ण् | त् | थ् | द् | ध् | न् |
| प् | फ् | ब् | भ् | म् | | | | | |
| य् | र् | ल् | व् | श् | ष् | स् | ह् | [ ळ् ]' | |
c25.s4.17
३ कनकणैः(१०१५) मरणै ( ७२५ )विभजेद्रणं ( आ. सि; १ । ४० ). स्फुटभुजक्किक्का(११) क न(१० )घन खैनै(२० )रभिसै(२४४०) हृते बिंबे ( आ. सि; ५ । ५ ).
c25.s4.18
इस क्रम में केवल व्यंजनों से ही अंक सूचित होते हैं, स्वर निरर्थक या शून्यसूचक समझे जाते हैं२ और संयुक्त व्यंजन के घटक व्यंजनों में से प्रत्येक से एक एक अंक प्रकट होता है . संस्कृत लेखकों की शब्दों से अंक प्रकट करने की सामान्य परिपाटी यह है कि पहिले शब्द से इकाई, दूसरे से दहाई, तीसरे से सैंकड़ा आदि अंक सूचित किये जाते हैं ( अंकानामां वामतो गतिः ), परंतु आर्यभट ने अपने इस क्रम में उक्त परिपाटी के विरुद्ध अंक बतलाये हैं अर्थात् अंतिम अक्षर से इकाई, उपांत्य से दहाई इत्यादि. इस क्रम में १ का अंक क, ट, प, या य अक्षर से प्रकट होता है जिससे इसको ‘कटपयादि’ क्रम कहते हैं.
c25.s4.19
१ आर्यसिद्धांत में ‘ळ’ नहीं है, परंतु दक्षिण में इस शैली के अंकों में उसका प्रयोग होता ( ई. ऍ. जि. ४, पृ. २०७ ) है इस लिये यहां दिया गया है.
c25.s4.20
२ सप्तधीणां कपधन्ना झ्लिक्षा ( १५९८८९२ )मदयनिसनधा ( ५८१०९८ )यनाखस्य ( आ. सि. २ । ६ ).
c25.s4.21
कभी कभी शिलालेखों४, दानपत्रों५, तथा पुस्तकों६ के संवत् लिखने में अंक ‘कटपयादि’ क्रम से दिये हुए मिलते हैं परंतु उनकी और आर्यभट (दूसरे) की उपर्युक्त शैली में इतना अंतर है कि उनमें ‘अंकानां वामतो गतिः’ के अनुसार पहिले अक्षर से इकाई, दूसरे से दहाई आदि के अंक बतलाये जाते हैं और संयुक्त व्यंजनों में केवल अंतिम व्यंजन७ अंक सूचक होता है न कि प्रत्येक व्यंजन
c25.s4.22
४ राघवाय(१४४२ ) गणिते शकवर्षे... ॥ राघवाय १४४२ अचरसंज्ञ . शकाब्दे ( ऍ. इं; जि. ६, पृ. १२१ ). श्रीमत्कोलंघवर्षे भवति( ६४४ ) गुणमणि श्रेणिरादित्यवर्मा वलीपालो ( इं. ऍ; जि. २, पृ. ३६० ). राकालोके(११२२) शकाब्दे सुरपतिसचिचे खिंचयाते ( इं. ऍ; जि. २, पृ ३६१ ).
c25.s4.23
५ शक्त्यालोके (१२१५) शकाब्दे परिसमाप्म[ति] शुभे श्रीमुखापा[ढ]मासे ( ऍ. इं; जि. ३, पृ. २२६ ). तत्वलोके(११७४) शकस्याब्दे क्रोधिसंवत्सरे शुभे ( ऍ. इं; जि. ३, पृ. ३८ ).
c25.s4.24
६ खगोन्त्यानन्दसप्ताप्ते (१५६५१३२)ति कल्यहर्गणे सति । सर्वानुक्रमणीतन्निर्माता वेदार्थदीपिका ॥ लक्षाणि पञ्चदश वै पञ्चषष्टिसहस्रकं । सप्तात्रिंशच्छतं चेति दिनवाक्यार्थ ईरितः ॥ ( इं. ऍ; जि. २१, पृ. ५० ). इन दो श्लोकों में षड्गुरुशिष्य ने अपनी ‘वेदार्थदीपिका’ नामक ‘सर्वानुक्रमणी’ की टीका की रचना कलियुग के १५६५१३२ दिन व्यतीत होने पर करना बतलाया है. इस गणना के अनुसार उक्त टीका की रचना कलियुग संवत् ४२८५ = शक सं. ११०६ = वि. सं. १२४१ ( तारीख २४ मार्च, ई. स. ११८४ ) में होना पाया जाता है.
c25.s4.25
७ इसी पत्र के टिप्पण ८ में ‘शक्त्यालोके’ के ‘क्त्या’ में ‘य्’ के लिये १ का अंक लिया गया है और ‘क्’ तथा ‘त्’ को छोड़ दिया है. ऐसे ही उसी टिप्पण में ‘तत्वलोके’ के ‘त्व’ के ‘व्’ के लिये ४ का अंक लिया है, ‘त्’ के लिये कुछ नहीं. ऐसे ही टिप्पण ६ में ‘न्त्या’ और ‘न्ते’ में ‘य्’ और ‘त्’ के लिये क्रमशः १ और ५ के अंक लिये हैं बाकी के अक्षरों को छोड़ दिया है.
c25.s4.26
ऊपर वर्णन की हुई अक्षरों से अंक सूचित करने की शैलियों के अतिरिक्त दक्षिण में मलबार और तेलुगु प्रदेश में पुस्तकों के पत्रांक लिखने में एक और भी शैली प्रचलित थी जिसमें ‘क’ से ‘ळ’ तक के अक्षरों से क्रमशः १ से ३४ तक के अंक, फिर ‘बारखड़ी’ (द्वादशाक्षरी) के क्रम से ‘का’ से ‘ळा’ तक ‘आ’ की मात्रासहित व्यंजनों से क्रमशः ३५ से ६८ तक, जिसके बाद ‘कि’ से ‘ळि’ तक के ‘इ’ की मात्रासहित व्यंजनों से ६६ से १०२ तक के और उनके पीछे के अंक ‘ई’, ‘उ’ आदि स्वरसहित व्यंजनों से प्रकट किये जाते थे१. यह शैली शिलालेख और ताम्रपत्रादि में नहीं मिलती.
c25.s4.27
अक्षरों से अंक प्रकट करने की रीति आर्यभट (प्रथम) ने ही प्रचलित की हो ऐसा नहीं है क्योंकि उससे बहुत पूर्व भी उसके प्रचार का कुछ कुछ पता लगता है. पाणिनि के सूत्र १. ३. ११ पर के कात्यायन के वार्तिक और कैयट के दिये हुए उसके उदाहरण से पाया जाता है कि पाणिनि की अष्टाध्यायी में अधिकार ‘स्वरित’ नामक वर्णात्मक चिह्नों से बतलाये गये थे और वे वर्ण पाणिनि के शिवसूत्रों के वर्णक्रम के अनुसार क्रमशः सूत्रों की संख्या प्रकट करते थे अर्थात् अ=१; इ=२; उ=३ आदि२.
c25.s4.28
लिपिपत्र ७१ वां.
c25.s4.29
इस लिपिपत्र में दो खंड हैं, जिनमें से पहिले में अशोक के लेखों३, नानाघाट के लेख४, कुशन- वंशियों के समय के मथुरा आदि के लेखों५, क्षत्रप और आंध्रवंशियों के समय के नासिक आदि के लेखों६, क्षत्रपों के सिक्कों७, तथा जग्गयपेट के लेखों एवं शिवस्कंदवर्मन् और जयवर्मन् के दानपत्रों से८ १ से ६ तक मिलनेवाले प्राचीन शैली के अंक उद्धृत किये हैं. दूसरे खंड में गुप्तों तथा उन- के समकालीन परिव्राजक और उच्छकल्प के महाराजाओं आदि के लेख व दानपत्रों९, वाकाटक१०, पल्लव तथा शालंकायन वंशियों११ एवं वलभी के राजाओं१२ के दानपत्रों, तथा नेपाल के शिलालेखों१३ से वे ही अंक उद्धृत किये गये हैं.
c25.s4.30
१ ब; सा. इं; पे; पृ. ८०. बर्मा के कुछ हस्तलिखित पुस्तकों के पत्रांकों में ‘क’ से ‘कः’ तक से १ से १२ तक, ‘ख’ से ‘खः’ तक से १३ से २४, ‘ग’ से ‘गः’ तक से २५ से ३६ इत्यादि बारखड़ी के क्रम से अंक बतलाये हैं. सीलोन (लंका) के पुस्तकों के ऐसे ही पत्रांकों में ऋ, ॠ, ऌ और ॡ स्वरसहित व्यंजनों से भी अंक बतलाये हुए मिलते हैं जिससे उनमें ‘क’ से ‘कः’ तक से क्रमशः १ से १६, ‘ख’ से ‘खः’ तक से १७ से ३२ आदि अंक बतलाये जाते हैं और जब सब व्यंजन समाप्त हो जाते हैं तब फिर ‘२ क’, ‘२ का’ आदि से आगे के अंक सूचित किये जाते हैं (बू; इं. पे; पृ. ८७).
c25.s4.31
२ देखो, ऊपर पृ. ७, टिप्पण ५; और वे; इं. लि; पृ. २२२.
c25.s4.32
३ ऎ. इं; जि. २, पृ. ४६० के पास का सेट. इं. ऎ. जि. २२, पृ. २६८ के पास का सेट. लिपिपत्र ७१ से ७६ तक में जो अंक दिये गये हैं वे बहुधा भिन्न भिन्न पुस्तकों में छपी हुई लेखादि की प्रतिकृतियों से लिये गये हैं इस लिये आगे उक्त लिपि- पत्रों के टिप्पणों में हम बहुधा पत्रांक देंगे, जिससे पाठक उसके पास या उनके बीच के सेट समझ लेवें.
c25.s4.33
४ आ. स. वे. इं; जि. ५, सेट ५१.
c25.s4.34
५ ऎ. इं; जि. १, पृ. ३८८-९३; जि. २, पृ. २००-२०६; ३६८; जि. १०, पृ. १०७. इं. ऎ; जि. ३७, पृ. ६६.
c25.s4.35
६ आ. स. वे. इं; जि. ४, प्लेट ५२-५५. ऎ. इं; जि. ८, पृ. ६०-६० (प्लेट १-८).
c25.s4.36
७ बांसवाड़ा राज्य (राजपूताना) के सिरवाणिया गांव से मिले हुए पश्चिमी क्षत्रपों के २४०० सिक्कों, राजपूताना म्यूज़िअम (अजमेर) में रक्खे हुए १०० से अधिक सिक्कों से; तथा रा; कें. कॉ. आ. क्ष; प्लेट ६-१७.
c25.s4.37
८ आ. स. स. इं; जि. १, प्लेट ६२-३. ऎ. इं; जि. १, पृ. ६; जि. ६, पृ. ८४-८; ३१६-६.
c25.s4.38
९ फ्ली; गु. इं; प्लेट १-४, ६, १२, १५, १६, ३६, ३८, ३६, ४१. ऎ इं; जि. ६, पृ. ३४४.
c25.s4.39
१० फ्ली; गु. इं; प्लेट २६, ३४.
c25.s4.40
११ ऎ. इं; जि. ८, पृ. १४५; जि. ६, पृ. ५६. इं. ऎ; जि. ५, पृ. ५०-५२; १४४-५६, १७६-७७.
c25.s4.41
१२ ऎ. इं; जि. ३, पृ. ३२१; जि. ८, पृ. १६३; जि. ११, पृ. ८३, १०६-१६, १७६. फ्ली; गु. इं; प्लेट २४-२५. इं. ऎ; जि. ५, पृ. २०७-८; जि. ६, पृ. १४-६; जि. ७, पृ. ६६-७८. आ. स. रि; इं. स. १८०२-३, पृ. २३५, ज. बंब. ब. सो; जि. ११, पृ. ३६३.
c25.s4.42
१३ इं. ऎ; जि. ६, पृ. १६४-७८.
c25.s4.43
लिपिपत्र ७२ वां.
c25.s4.44
इस लिपिपत्र में दो खंड हैं जिनमें से पहिले में कलिंग के गंगावंशियों के दानपत्रों१, प्रतिहारवंशियों के शिलालेख व दानपत्रों२, भिन्न भिन्न लेख और दानपत्रों३, मि. बावर के प्राप्त किये हुए हस्तलिखित पुस्तकों४, नेपाल के बौद्ध ग्रंथों५ तथा जैन पुस्तकों६ से १ से ६ तक के प्राचीन शैली के अंक उद्धृत किये गये हैं. दूसरे खंड में अशोक के लेखों७, नानाघाट के लेख८, कुशनवंशियों के समय के मथुरा आदि के लेखों९, क्षत्रपों और आंध्रवंशियों के समय के नासिके आदि के लेखों१०, क्षत्रपों के सिक्कों११ तथा जग्गयपेट के लेखों एवं पल्लव शिवस्कंदवर्मन् आदि के ताम्रपत्रों१२ से प्राचीन शैली के १० से ६० तक के अंक दिये गये हैं.
c25.s4.45
२ ऍ. इं; जि. ५, पृ. २०६. इं. पँ; जि. १५, पृ. ११२, १४०. आठ का अंक जोधपुर से मिले हुए प्रतिहार बाउक के वि. सं. ८९४ (ई. स. ८३७) के लेख से, जो राजपूताना म्यूज़िअम् (अजमेर) में रक्खा हुआ है, लिया गया है.
c25.s4.46
९ ऍ. इं; जि. १, पृ. ३८८-६३; जि. २, पृ. २००-२०८; जि. १०, पृ. १०७. आ. स. रि; ई. स. १६०८-६, प्लेट ५६.
c25.s4.47
११ देखो, ऊपर पृ. १२४, टिप्पण ७.
c25.s4.48
१२ आ. स. स. इं; जि. १ प्लेट ६२-६३. ऍ. इं; जि. ६, पृ. ८८, ३१६.
c25.s4.49
लिपिपत्र ७३ वां.
c25.s4.50
इस लिपिपत्र में दो खंड हैं जिनमें से पहिले में गुप्तों और उनके समकालीन राजाओं के लेखादि१३, वाकाटक आदि वंशियों१४ तथा वलभी के राजाओं१५ और शालंकायनवंशियों१६ के दानपत्रों, नेपाल के लेखों१७ तथा कलिंग के गंगावंशियों के दानपत्रों१८ से १० से ६० तक के प्राचीन शैली के अंक
c25.s4.51
१ ऍ. इं; जि. ३, पृ. १२६, १३३; जि. ४, पृ. १४५, १६७. इं. पँ; जि. १३, पृ. १२१, १२३.
c25.s4.52
३ २ का अंक ऍ. इं; जि. १०, पृ. ५१ से. ४ का ऍ. इं; जि. ५, पृ. ८ से. ५ और ६ के ऍ. इं; जि. ७, पृ. १५८ से. ८ का ऍ. इं; जि. ५, पृ. ८ से. ६ का पहिला रूप ऍ. इं; जि. ११, पृ. ३०४ से और दूसरा ज. बंब. ए. सो; जि. १६, पृ. १०८ से.
c25.s4.53
४ बावर मेनुस्क्रिप्ट्, भूमिका, पृ. २६, टेबल ४ था.
c25.s4.54
५ बू; इं. पे; प्लेट ६, पंक्ति २०-२३, २६. इं. पँ; जि. ६, पृ. ४४, पंक्ति ७, ६.
c25.s4.55
६ बू; इं. पे; प्लेट ६, पंक्ति २४-२५. इं. पँ; जि. ६, पृ. ४४, पंक्ति ८.
c25.s4.56
७ इं. पँ; जि. २२, पृ. २६८ (सहस्राम). ऍ. इं; जि. ३, पृ. १३८.
c25.s4.57
८ आ. स. वे. इं; जि. ५, प्लेट ५१.
c25.s4.58
१० देखो, ऊपर पृ. १२४, टिप्पण ६.
c25.s4.59
१३ फ्ली; गु. इं; प्लेट २-४, ६, १२, १५, १६, ३६, ३८, ४१. ऍ. इं; जि. ८,।पृ. २८७; जि. ६, पृ. ३४४; जि. १०, पृ. ५१.
c25.s4.60
१४ फ्ली. गु; इं; प्लेट २७, ३४.
c25.s4.61
१५ ऍ. इं; जि. ८, पृ. १६३; जि. ११, पृ. ८३, १११, ११३, १७६. इं. पँ; जि. ५, पृ. २०७, २०६; जि. ६, पृ. १५, १६; जि. ७, पृ. ६६, ७३, ७४, ७८; जि. ६, पृ. २३६; जि. १४, पृ. ३२८. फ्ली; गु. इं; प्लेट २४-२५. आ. स. रि; ई. स. १६०२-३, पृ. २३५. ज. बंब. ए. सो; जि. ११, पृ. ३६३. भा. इं; पृ. ५६.
c25.s4.62
१६ ऍ. इं; जि. ६, पृ. ५६.
c25.s4.63
१७ इं. पँ; जि. ६, पृ. १६४-७८.
c25.s4.64
१८ ऍ. इं; जि. ३, पृ. १२६, १३३; जि. ४, पृ. १६७. इं. पँ; जि. १३, पृ. १२१, १२३.
c25.s4.65
दिये गये हैं और दूसरे में प्रतिहारवंशियों के दानपत्रादि१, भिन्न भिन्न लेखों व दानपत्रों२, मि० बावर के पुस्तकों३, नेपाल के बौद्ध पुस्तकों४ तथा जैन पुस्तकों५ से वे ही अंक दिये गये हैं.
c25.s4.66
लिपिपत्र ७४ वां.
c25.s4.67
इस लिपिपत्र के दो खंड हैं जिनमें से पहिले में अशोक के लेखों६, नानाघाट के लेख७, नासिक के लेखों८, क्षत्रपों के सिक्कों९, गुप्तों तथा उनके समकालीन राजाओं के लेखादि१० तथा वलभी के राजाओं के दानपत्रों११ से १०० से ७०० तक के प्राचीन शैली के अंक दिये गये हैं और दूसरे में नेपाल के लेखों१२, कलिंग के गंगवंशियों१३ और प्रतिहारों१४ के दानपत्नों, भिन्न भिन्न लेखादि१५ एवं बौद्ध१६ और जैन१७ पुस्तकों से १०० से ९०० तक के अंक दिये हैं.
c25.s4.68
३ देखो, ऊपर पृ. १२५, टिप्पण ४.
c25.s4.69
६ ऍ. इंड्; जि. ३, पृ. १३८. इं. ऍ; जि. ६, पृ. १५६; जि. २२, पृ. २६८.
c25.s4.70
११ ऍ. इंड्; जि. ३, पृ. ३२१; जि. ११, पृ. ८३, १०७, १११, ११३. इं. ऍ; जि. ५, पृ. २०६; जि. ६, पृ. १६; जि. ७, पृ. ६७, ७८. आ. स. रि; इं. स. १९०२-३, पृ. २३५. ज. बंब. ए. सो; जि. ११, पृ. ३६३; जि. २०, पृ. १०६.
c25.s4.71
१२ इं. ऍ; जि. ६, पृ. १६४-७८.
c25.s4.72
१३ ऍ. इंड्; जि. ३, पृ. १३३. इं. ऍ; जि. १३, पृ. १२३.
c25.s4.73
१४ ऍ. इंड्; जि. ५, पृ. २०६. इं. ऍ; जि. १४, पृ. ११२, १४०.
c25.s4.74
१६ देखो, ऊपर पृ. १२५, टिप्पण ५.
c25.s4.75
१७ देखो, ऊपर पृ. १२५, टिप्पण ६.
c25.s4.76
लिपिपत्र ७५ वां.
c25.s4.77
इस लिपिपत्र के तीन खंड किये गये हैं जिनमें से दो पूर्वार्द्ध में हैं. उनमें से पहिले में नानाघाट के लेख१८, नासिक के लेखों१९ तथा वाकाटकों के दानपत्रों२० से १००० से ७०००० तक के प्राचीन शैली के अंक दिये गये हैं और दूसरे में भिन्न भिन्न शिलालेखों तथा दानपत्रों से १५ से २४४०० तक के मिलवां अंक दिये हैं.
c25.s4.78
१ एपै. इंड्; जि. ५, पृ. २०६. इं. ऍ; जि. १४, पृ. ११२, १४०; और राजपूताना म्युज़िअम् में रक्खे हुए कन्नौज के प्रतिहार राजा महेंद्रपाल (दूसरे) के समय के परताबगढ़ (राजपूताना) से मिले हुए वि. सं. १००३ (ई. स. ९४६) के लेख से.
c25.s4.79
२ १० का पहिला रूप ऍ. इंड्; जि. ६, पृ. २६६ से; दूसरा ऍ. इंड्; जि. ११, पृ. ३०४ से; तीसरा इं, ऍ; जि. ७, पृ. २४६ से. २० का पहिला रूप ऍ. इंड्; जि ४, पृ. २१० से; दूसरा ऍ. इंड्; जि. ८, पृ. २३१ से; तीसरा ऍ. इंड्; जि. १०, पृ. ५१ से. ४० का पहिला रूप ऍ. इंड्; जि. ६, पृ. २६६ से; दूसरा ऍ. इंड्; जि. ११, पृ. २२१ से. ५० का पहिला रूप ऍ. इंड्; जि. ११, पृ. १६ से; दूसरा ऍ. इंड्; जि. ५, पृ. ८ से. ६० ऍ. इंड्; जि. ६, पृ. २६६ से. ७० ज. बंब. ए. सो; जि. १६, पृ. १०८ से. ८० का पहिला रूप ऍ. इंड्; जि. ११, पृ. ३०४ से; दूसरा ऍ. इंड्; जि. ६, पृ. १३६ से. ६० का पहिला रूप ऍ. इंड्; जि. २, पृ. २१ से; दूसरा ऍ. इंड्; जि. ५, पृ. ४१ से; तीसरा ऍ. इंड्; जि. १०, पृ. ७४ से; चौथा इं. ऍ; जि. ७, पृ. २४६ से.
c25.s4.80
४ देखो, ऊपर पृ. १२५, टिप्पण ५.
c25.s4.81
५ देखो, ऊपर पृ. १२५, टिप्पण ६.
c25.s4.82
७ आ. स. वे. इंड्; जि. ५, प्लेट ४१.
c25.s4.83
८ आ. स. वे. इंड्; जि. ४, प्लेट ५३.
c25.s4.84
९ देखो, ऊपर पृ. १२४ टिप्पण ७.
c25.s4.85
१० फ्ली; गु; इं; प्लेट ६, १२, १४, १६, ३६, ३८, ३६, ६०, ६१. ऍ. इंड्; जि. ८, पृ. २८७; जि. ६, पृ. २४४.
c25.s4.86
१५ १०० का पहिला रूप ऍ. इंड्; जि. ११, पृ. २२१ से; दूसरा ऍ. इंड्; जि. ११, पृ. ३०४ से. ४०० ऍ. इंड्; जि. ८, पृ. २३१. ६०० ज. बंब. ए. सो; जि. १६, पृ. १०८. ७०० राजपूताना म्यूज़िअम् (अजमेर) में रक्खे हुए मेवाड़ के गुहिल राजा शीलादित्य के समय के सामोली गांव (मेवाड़ में) से मिले हुए वि. सं. ७०३ (ई. स. ६४६) के लेख से. ८०० ऍ. इंड्; जि. १२, पृ. २०३ से.
c25.s4.87
१८ आ. स. वे. इंड्; जि. ५, सेट ४१.
c25.s4.88
१९ आ. स. वे. इंड्; जि. ४, प्लेट ५२-५३.
c25.s4.89
२० फ्ली; गु; इंड्; प्लेट ५४.
c25.s4.90
उत्तरार्द्ध में किसी गुर्जर राजा१, राष्ट्रकूट (राठौड़) दंतिदुर्ग२ और शंकरगण३ के दानपत्रों, प्रतिहार नागभट४ और बाउक५ के लेखों, राष्ट्रकूट दंतिवर्मन् के दानपत्र६, प्रतिहार भोजदेव के दो लेखों७, प्रतिहार महीपाल के लेख८ तथा पुष्कर के लेख९ से नवीन शैली के १ से ९ तक के अंक, शून्यसहित, दिये हैं.
c25.s4.91
लिपिपत्र ७६ वां.
c25.s4.92
इस लिपिपत्र के पूर्वार्द्ध में चौलुक्य (सोलंकी) मूलराज१० और शिलारा अपराजित११ के दानपत्रों, परमार भोज के शिलाओं पर खुदे हुए 'कूर्म्मशतक१२', कलचुरि कर्ण१३ और चौलुक्य त्रिलोचनपाल१४ के दानपत्रों, कलचुरि जाजल्लदेव१५ के लेख, अजमेर से मिली हुई चौहानों के ऐतिहासिक काव्य की शिलाओं में से पहिली शिला१६, बख्शाली से मिले हुए हस्तलिखित अंकगणित के पुस्तक१७ एवं बौद्ध पुस्तकों१८ से नवीन शैली के शून्यसहित १ से ९ तक के अंक दिये गये हैं.
c25.s4.93
३ ऍ. इं; जि. ६, पृ. १६७.
c25.s4.94
४ ऍ. इं; जि. ६, पृ. २००.
c25.s4.95
५ राजपूताना म्यूज़िअम् (अजमेर) में रक्खे हुए प्रतिहार बाउक के वि. सं. ८६४ के लेख से.
c25.s4.96
६ ऍ. इं; जि. ६, पृ. २८१.
c25.s4.97
७ पहिले के अंक मेरे विद्वान् मित्र हरविलास सारड़ा से मिली हुई उक्त लेख की उत्तम छाप से और दूसरे के ऍ. इं; जि. १, पृ. १६० से.
c25.s4.98
८ इं. ऍ; जि. १६, पृ. १७४.
c25.s4.99
१० इं. ऍ; जि. ६, १८३.
c25.s4.100
११ ऍ. इं; जि. ३, पृ. २७४.
c25.s4.101
१२ ऍ. इं; जि. ८, पृ. २४८-६०.
c25.s4.102
१३ ऍ. इं; जि. २, पृ. ३०७.
c25.s4.103
१४ इं. ऍ; जि. १२, पृ. २०२.
c25.s4.104
१५ ऍ. इं; जि. १, पृ. ३४.
c25.s4.105
१६ राजपूताना म्यूज़िअम् (अजमेर) में रक्खी हुई शिला से.
c25.s4.106
१७ बू; इं. पे; प्लेट ६ (B), पंक्ति ६-१० (IX, X).
c25.s4.107
१८ बू; इं. पे; प्लेट ६ (B), पंक्ति ११-१२ (XI, XII.)
c25.s4.108
उत्तरार्द्ध के दो खंड किये गये हैं जिनमें से पहिले में शारदा लिपि के लेखों१९, बंगला लिपि के लेख व दानपत्रों२० और तेलुगुकनडी लिपि के लेखादि२१ से नवीन शैली के शून्यसहित १ से ९ तक के अंक दिये गये हैं. दूसरे खंड में खरोष्ठी लिपि के अंक दिये हैं जिनका विवेचन आगे किया जायगा.
c25.s4.109
१ ऍ. इं; जि. २, पृ. २०.
c25.s4.110
२ इं. ऍ; जि. ११, पृ. ११२.
c25.s4.111
९ राजपूताना म्यूज़िअम् (अजमेर) में रक्खे हुए वि. सं. ९८२ के पुष्कर से मिले हुए लेख से.
c25.s4.112
१९ फो; पॅ. ग्रं. स्टे; प्लेट १६, १७, २०, २३, २४, २५, २६, २८, २९, ३०, ३२, ३३, ४०.
c25.s4.113
२० ऍ. इं; जि. २, पृ. ३५२; जि. ५, पृ. १८२-४; जि. १२, पृ. ६, २८, २६, ४१. इं. ऍ; जि. १०, पृ. ३४२. ज. बंगा. ए. सो; ई. स. १८६६, भाग १, प्लेट १-२; १६१०, प्लेट ७.
c25.s4.114
२१ पहिली पंक्ति ऍ. इं; जि. ३, पृ. २७, ८८; जि. ४, पृ. ६२ (c), ९१४; जि. ५, पृ. १५१; जि. ६, पृ. २३६. इं. ऍ; जि. ६, पृ. १५८; जि. ११ पृ. १२; दूसरी पंक्ति ब; सा. इं. पे; प्लेट ३३ से.
Linked texts (21)
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