भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c26.2
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c26.2
- Language
- Hindi
c26.2
खरोष्ठी लिपि के अंक उक्त लिपि की नांई विदेशी हैं. अरबी और फ़ारसी की नांई खरोष्ठी लिपि दाहिनी ओर से बाईं ओर लिखी जाती है परंतु उसके अंक अरबी और फ़ारसीके अंकों की नांई बाईं ओर से दाहिनी ओर नहीं लिखे जाते किंतु दाहिनी ओर से बाईं ओर लिखे जाते हैं जिसका कारण यही है कि वे अंक अरबी और फ़ारसी के अंकों की नांई भारतीय अंकों से नहीं निकले किंतु सेमिटिक् फ़िनिशियन ( या उनसे निकले हुए अरमइक् ) अंकों से निकले हुए प्रतीत होते हैं. ई. स. पूर्व की तीसरी शताब्दी से भारतवर्ष में इन अंकों का कुछ पता लगता है. अशोक के शहबाज़गढ़ी के लेख की पहिली धर्माज्ञा में १ और २ के लिये क्रमशः एक ( । ) और दो ( ॥ ) खड़ी लकीरें, तीसरी में ५ के लिये पांच ( ।।।।। ) और १३ वीं में ४ के लिये चार ( ।।।। ) खड़ी लकीरें मिलती हैं. ऐसे ही अशोक के मान्सेरा के लेख की पहिली धर्माज्ञा में १ और २ के लिये क्रमशः एक ( । ) और दो ( ॥ ), और तीसरी में पांच के लिये पांच ( ।।।।। ) खड़ी लकीरें खुदी हैं. इससे पाया जाता है कि उस समय तक तो ६ तक के लिये इन अंकों का वही क्रम रहा हो जो फ़िनिशियन् में मिलता है. अशोक के पीछे शक, पार्थियन् और कुशनवंशियों के समय के खरोष्ठी लेखों१ में ये अंक विशेष रूप से मिलते हैं. उनमें १, २, ३, ४, १०, २० और १०० के लिये पृथक् पृथक् चिह्न हैं ( देखो, लिपिपत्र ७६ में खरोष्ठी अंक ). इन्हीं ७ चिह्नों से ३६६ तक के अंक लिखे जाते थे.