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भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c28.s1: नागरी लिपि की उत्पत्ति

भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c28.s1

Language
Hindi

नागरी लिपि की उत्पत्ति

c28.s1.1

नागरी आदि जितनी लिपियों की उत्पत्ति लिपिपत्र ८२ से ८४ में दी है उनमें पहिले वर्तमान लिपि का प्रत्येक अक्षर दे कर उसके बाद = चिह्न दिया है. उसके पीछे अशोक के समय से लगा कर वर्तमान रूप बनने तक के सब रूपांतर दिये हैं. प्रत्येक रूप अनेक लेखादि में मिलता है और प्रत्येक लेखादि का पता देने से विस्तार बहुत बढ़ जाता है अतएव केवल एक स्थल का पता दिया जायगा.

c28.s1.2

**अ**—इसका पहिला रूप अशोक के गिरनार के पास के चट्टान के लेख (लिपिपत्र १) से लिया गया है (बहुधा प्रत्येक लिपि के प्रत्येक अक्षर का पहिला रूप उसी लेख से लिया गया है इस लिये आगे पहिले रूप का विवेचन केवल वहीं किया जायगा जहां वह रूप किसी दूसरे स्थल से लिया गया है). दूसरा रूप मथुरा के लेखों (लिपिपत्र ६) से लिया है जिसमें ‘**अ**’ की बाईं ओर के नीचे के अंश में दो बार कोण बनाये हैं. तीसरा रूप कोटा के लेख (लिपि पत्र २१) से है जिसमें ‘**अ**’ की बाईं ओर के नीचे के अंश को अर्द्धवृत्त का सा रूप देकर मूल अक्षर से उसे विलग कर दिया है. चौथा रूप देवल के लेख (लिपिपत्र ३५) से और पांचवां चीरवा के लेख (लिपिपत्र २७) से लिया गया है. छठा रूप वर्तमान नागरी है. (लिपिपत्र ८२ से ८४ तक में प्रत्येक अक्षर की उत्पत्ति में अंतिम रूप वर्तमान अक्षर ही है इसलिये उसका भी आगे विवेचन न किया जायगा).

c28.s1.3

इस प्रकार प्रत्येक अक्षर की उत्पत्ति का विवेचन करने से विस्तार बढ़ जाता है इस लिये आगे ‘पहिला रूप’, ‘दूसरा रूप’ आदि के लिये केवल उनकी संख्या के पहिले अक्षर ‘**प**’, ‘**दू**’ आदि लिखे जायंगे और उनके आगे जिस लिपिपत्र या लेख से वह रूप लिया है उसका अंक या नाम मात्र दिया जायगा और जहां बहुत ही आवश्यकता होगी वहीं विवेचन किया जायगा. प्रत्येक रूप में क्या अंतर पड़ा यह उक्त रूपों को परस्पर मिला कर देखने से पाठकों को मालूम हो जायगा.

c28.s1.4

**आ**—‘**अ**’ का यह रूप दक्षिण में लिखा जाता है. इसके पहिले तीन रूप पूर्व के ‘**अ**’ के समान हैं; चौ. १८ (इसमें बाईं ओर का नीचे का अर्धवृत्त सा अंश मूल अक्षर से मिल गया है); पां. चौथे का रूपांतर ही है.

c28.s1.5

**इ**—दू. १७ (जयनाथ का दानपत्र—इसमें ऊपर की बिंदी के स्थान में सिर की आड़ी लकीर, और नीचे की दोनों बिंदियों को भीतर से खाली बनाया है); ती. २६; चौ. २७; पां. चौथे के समान.

c28.s1.6

उ—दू. ६; ती. में नीचे के अंत को अधिक मोड़ा है; चौ. १८.

c28.s1.7

ए—दू. १६ (उष्णीषविजयधारणी); ती. १६ (महानामन् का लेख); चौ. १७ (करंडांडा का लेख); पां. २५ (कूर्मशतक).

c28.s1.8

क—दू. कुशनवंशियों के लेखों से; ती. ८; चौ. १६; पां. २३.

c28.s1.9

ख—प. २ (खालसी); दू. ६; ती. २१ (दुर्गगण का लेख); चौ. २६ (जाजल्लदेव का लेख).

c28.s1.10

ग—दू. और ती. ६; चौ. १६.

c28.s1.11

घ—दू. ८; ती. २३ (जोधपुर का लेख); चौ. २५ (उदेपुर का लेख); पां. २५ (उज्जैन का लेख).

c28.s1.12

ङ—प. बुद्धगया के स्तंभ से; दू. १८ (‘ङ्शो’ में); ती. २५ (उज्जैन का लेख).

c28.s1.13

च—दू. ६; ती. २५ (उज्जैन का लेख)

c28.s1.14

छ—दू. ६; ती. २५ (उज्जैन का लेख); चौ. तीसरे से बना.

c28.s1.15

ज—दू. ७; ती. २१ (झालरापाटन का लेख); चौ. २५ (उज्जैन का लेख.)

c28.s1.16

झ—'झ' का यह रूप जैन शैली की नागरी लिपि में प्रचलित है. दू. ६ (वासिष्ठीपुत्र का लेख); ती. २१ (कोटा का लेख).

c28.s1.17

झ—'झ' का यह रूप दक्षिणी शैली की नागरी में प्रचलित है. इसके पहिले तीन रूप पूर्व के 'झ' के समान हैं. चौ. २६ (हस्तलिखित पुस्तकों से); पां. चौथे से बना.

c28.s1.18

ञ—दू. ८; ती. १६ (‘ञ्ज’ में)

c28.s1.19

ट—दू. १६; ती. २१ (झालरापाटन का लेख).

c28.s1.20

ठ—प. २ (अशोक का देहली का लेख); दू. ती. २५ (उज्जैन का लेख).

c28.s1.21

ड—'ड' का यह रूप जैन शैली की नागरी में प्रचलित है. दू. ८; ती. १६; चौ. १८; पां. चौथे से बना; छ. २७ (सूधा के लेख की पंक्ति के अंत में).

c28.s1.22

ड—पहिले तीन रूप पूर्व के 'ड' के समान; चौ. २७.

c28.s1.23

ढ—नागरी लिपि की वर्णमाला में केवल यही अक्षर ऐसा है जो अपने मूल रूप में बना रहा है. केवल सिर की आड़ी लकीर बढ़ी है.

c28.s1.24

ण—दू. ६; ती. दूसरे से बना (देखो, लिपिपत्र ६ में 'ण' का चौथा रूप); चौ. १८; पां. १६ (उष्णीषविजयधारणी).

c28.s1.25

ण—'ण' का यह रूप दक्षिणी शैली की नागरी में प्रचलित है और नागरी के 'ण' के 'ए' जैसे अंश को चलती कलम से मिलवां लिखने से बना है.

c28.s1.26

त—दू. पहिले का रूपांतर (देखो, लिपिपत्र ४); ती. २७.

c28.s1.27

थ—दू. ती. १८; चौ. २५ (उज्जैन का लेख).

c28.s1.28

द—दू. ५ (पभोसा का लेख); ती. ५ (शोडास का मथुरा का लेख); चौ. ६; पां. १८; छ. १६ (उष्णीषविजयधारणी).

c28.s1.29

ध—दू. २०; ती. २५ (उज्जैन का लेख); चौ. २७ (ओरिआ का लेख).

c28.s1.30

न—दू. ६; ती. २०.

c28.s1.31

प—दू. ५ (शोडास का लेख); ती. १६.

c28.s1.32

फ—दू. १८; ती. १७ (पाली का दानपत्र); चौ. सीयदौनी के लेख से.

c28.s1.33

ब—दू. २०; ती. २३ (जोधपुर का लेख); चौ. १६; पां. चौलुक्य भीमदेव के दानपत्र से. 'व' और 'ब' में भेद न रहने से 'ब' को स्पष्ट बतलाने के लिये 'व' के भीतर बिंदी लगाई जाने लगी जो पीछे से कुछ तिरछी लकीर के रूप में परिणत हो गई.

c28.s1.34

भ—दू. ३ (नानाघाट का लेख); ती. ५ (शोडास का लेख); चौ. १६; पां. २६ (जाजल्लदेव का लेख).

c28.s1.35

भ—'भ' का यह रूप दक्षिणी शैली की नागरी लिपि में प्रचलित है. पूर्व के 'भ' के पांचवें रूप में बाईं ओर के अंश में ऊपर की तरफ़ ग्रंथि लगाने से यह बना है.

c28.s1.36

म—दू. ५ (शोडास का लेख); ती. १६; चौ. १८ ('म्' में).

c28.s1.37

य—दू. १; ती. दूसरे रूप को चलती कलम से पूरा लिखने से बना (देखो, लिपिपत्र ६ में मथुरा के लेखों के 'र्य्य' और 'श्य' में); चौ. १६ (बुद्धगया का लेख).

c28.s1.38

र—दू. १८; ती. २०; चौ. २३ (जोधपुर का लेख).

c28.s1.39

ल—दू. ६; ती २१ (दुर्गगण का लेख); चौ. २१ (ओसियां का लेख).

c28.s1.40

व—दू. ती. ५ (मथुरा के चार जैन लेख); चौ. २३; पां. २४.

c28.s1.41

श—प. २ (अशोक का खालसी का लेख); दू. ६; ती. १८; चौ. १६ (उष्णीषविजयधारणी); पां. २०.

c28.s1.42

ष—प. ३ (घोसुंडी के लेख के 'र्षे' में); दू. ६; ती. १८; चौ. तोरमाण के लेख से.

c28.s1.43

स—दू. ५ (मथुरा के जैन लेख); ती. १७ (करंडांडा का लेख); चौ. बिलसद के लेख से; पां. १६ (उष्णीषविजयधारणी).

c28.s1.44

ह—दू. ५ (शोडास का लेख); ती. ८; चौ. अप्सद के लेख से; पां. २५ (उज्जैन का लेख).

c28.s1.45

ळ—प. दू. ७; ती. दूसरे का रूपांतर (देखो लिपिपत्र ५० में चेब्रोलू के लेख का 'ळ').

c28.s1.46

क्ष—प. ७; दू. ८; ती. १६; चौ. १६ (उष्णीषविजयधारणी); पां. २७ (चीरवा का लेख).

c28.s1.47

ज्ञ—प. ८; दू. पहिले का रूपांतर; ती. २१ (ओसियां का लेख).

c28.s1.48

वर्तमान नागरी लिपि के ई, ऌ, ओ और औ ये चार अक्षर उनके मूल अक्षरों के रूपांतर नहीं हैं. 'ई', 'इ' के ऊपर रेफ का सा चिह्न लगा कर१; 'ऌ', ल् के साथ ऋ की मात्रा जोड़ कर; 'ओ' और 'औ', 'अ' के साथ क्रमशः उक्त स्वरों की मात्राएं लगा कर, बनाये जाते हैं. 'ऊ' और 'ऐ' प्राचीन अक्षरों के रूपांतर ही हैं. 'ऋ' प्राचीन 'ऋ' के स्थानापन्न हो ऐसा पाया जाता है (देखो, लिपिपत्र १६ में दी हुई 'उष्णीषविजयधारणी' के अंत की वर्णमाला का 'ऋ'). वर्तमान 'ओं' में जो 'ओ' का रूप ॐ लिखा जाता है वह प्राचीन 'औ' का रूपांतर है (देखो, लिपिपत्र १८, १६, २१ और ३५ में दिया हुआ 'औ'), परंतु उज्जैन के लेख के अंत की पूरी वर्णमाला (लिपिपत्र २५) में 'ओ' का रूप वैसा ही दिया है जिससे अनुमान होता है कि ई. स. की ११ वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में नागरी के लेखक 'ओ' के स्थान में 'औ' के प्राचीन रूप का व्यवहार करने और 'औ' के लिये नया चिह्न लिखने लग गये थे. 'झ' का वर्तमान नागरी रूप किसी प्राचीन रूप से नहीं बना, नवीन कल्पित है.

c28.s1.49

१ नागरी में इस प्रकार के 'ई' की कल्पना का कुछ कुछ पता ई. स. की ६ ठी शताब्दी से लगता है. 'उष्णीषविजयधारणी' के अंत की वर्णमाला में 'इ' पर बिंदी (लिपिपत्र १६) और राजा भोज के 'कूर्मशतक' में रेफ सा चिह्न मिलता है (लिपिपत्र २५).

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