भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c28.s1.48
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c28.s1.48
- Language
- Hindi
c28.s1.48
वर्तमान नागरी लिपि के ई, ऌ, ओ और औ ये चार अक्षर उनके मूल अक्षरों के रूपांतर नहीं हैं. 'ई', 'इ' के ऊपर रेफ का सा चिह्न लगा कर१; 'ऌ', ल् के साथ ऋ की मात्रा जोड़ कर; 'ओ' और 'औ', 'अ' के साथ क्रमशः उक्त स्वरों की मात्राएं लगा कर, बनाये जाते हैं. 'ऊ' और 'ऐ' प्राचीन अक्षरों के रूपांतर ही हैं. 'ऋ' प्राचीन 'ऋ' के स्थानापन्न हो ऐसा पाया जाता है (देखो, लिपिपत्र १६ में दी हुई 'उष्णीषविजयधारणी' के अंत की वर्णमाला का 'ऋ'). वर्तमान 'ओं' में जो 'ओ' का रूप ॐ लिखा जाता है वह प्राचीन 'औ' का रूपांतर है (देखो, लिपिपत्र १८, १६, २१ और ३५ में दिया हुआ 'औ'), परंतु उज्जैन के लेख के अंत की पूरी वर्णमाला (लिपिपत्र २५) में 'ओ' का रूप वैसा ही दिया है जिससे अनुमान होता है कि ई. स. की ११ वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में नागरी के लेखक 'ओ' के स्थान में 'औ' के प्राचीन रूप का व्यवहार करने और 'औ' के लिये नया चिह्न लिखने लग गये थे. 'झ' का वर्तमान नागरी रूप किसी प्राचीन रूप से नहीं बना, नवीन कल्पित है.