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भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c30.s12: तांबा

भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c30.s12

Language
Hindi

तांबा

c30.s12.1

लेखन सामग्री के संबंध में धातुओं में तांबा सब से अधिक काम में आता था. राजाओं तथा सामंतों की तरफ़ से मंदिर, मठ, ब्राह्मण, साधु आदि को दान में दिये हुए गांव, खेत, कुए आदि की सनदें तांबे पर प्राचीन काल से ही खुदवा कर दी जाती थीं और अब तक दी जाती हैं जिनको ‘दानपत्र’, ‘ताम्रपत्र’, ‘ताम्रशासन’ या ‘शासनपत्र’ कहते हैं. दानपत्रों की रचना अमात्य (मंत्री), सांधिविग्रहिक६, बलाधिकृत (सेनापति) या अक्षपटालिक७ आदि अधिकारियों८ में से कोई स्वयं करता या किसी विद्वान् से कराता था. कहीं उस काम के लिये एक अधिकारी८ भी रहता था. फिर उसको सुंदर अक्षर लिखनेवाला लेखक तांबे के पत्रे पर स्याही से लिखता और सुनार, ठठेरा, लुहार या कोई शिल्पी उसे खोदता था. कभी कभी ताम्रलेख रूप में नहीं किंतु बिंदियों९ से खुदे हुए भी मिलते हैं. जिस पुरुष की मारफ़त भूमिदान की सनद तय्यार करने की राजाज्ञा पहुंचती उसको ‘दूतक१०’ कहते थे. दूतक का नाम बहुधा दानपत्रों में लिखा रहता है. दक्षिण से मिले

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१ क; आ. स. रि; जि. २, पृ. १३० और प्लेट ५६.

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६ ‘सांधिविग्रहिक’ उस राजमंत्री को कहते थे जिसको ‘संधि’ (सुलह) और ‘विग्रह’ (युद्ध) का अधिकार होता था.

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७ ‘अक्षपटलिक’ राज्य के उस अधिकारी को कहते थे जिसके अधीन हिसावसंबंधी काम रहता था परंतु कभी इस शब्द का प्रयोग राज्य के दफ़्तर के अध्यक्ष के लिये भी होता था. अतएव संभव है कि दफ़्तर और हिसाब दोनों ही कहीं कहीं एक ही अधिकारी के अधीन रहते हों.

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८ कश्मीर के राजा ताम्रपत्र तय्यार करने के लिये ‘पट्टोपाध्याय’ नामक अधिकारी रखते थे. यह अधिकारी अक्षपटलिक के अधीन रहता था (कल्हणकृत राजतरंगिणी; तरंग ४, श्लो. ३६७-६८).

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९ देखो, ऊपर पृ. १००, टिप्पण ३.

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१० दूतक कभी कभी राजकुमार, राजा का भाई, कोई राज्याधिकारी आदि होते थे. कभी राजा स्वयं आज्ञा देता था. राजपूताने में ई. स. की १४ वीं शताब्दी के आस पास से ताम्रपत्र राजस्थानी हिंदी में लिखे जाने लगे तो भी दूतक का नाम रहता था (अत हुए).

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हुए किसी किसी दानपत्र के अक्षर इतने पतले हैं कि वे पहिले स्याही से लिखे गये हों ऐसा प्रतीत नहीं होता. संभव है कि तांबे के पत्नों पर पहिले मुलसानी मिट्टी या ऐसा ही कोई और पदार्थ पोतने के बाद दक्षिणी शैली के ताड़पत्रों की नांई उनपर तीखे गोल मुंह की लोहे की कलम से लेखक ने अक्षर बनाये हों जिनको खोदनेवाले कारीगर ने किसी तीक्ष्ण औज़ार से खोदा हो. उत्तरी हिंदुस्तान से मिलनेवाले दानपत्र बहुधा एक या दो पत्रों पर ही खुदे मिलते हैं परंतु दक्षिण से मिलनेवाले अधिक पत्रों पर भी खुदे हुए मिलते हैं, जैसे कि विजयनगर के वेंकटपतिदेव महाराज का मदुरा से मिला हुआ शक सं. १५०८ (ई. स. १५८६) का दानपत्र ६ पत्रों१ पर और हॉलैंड देश की लेडन युनिवर्सिटी (विश्वविद्यालय) के म्यूजिअम् में रक्खा हुआ राजेंद्रचोल के २१ वें राज्यवर्ष का दानपत्र २१ पत्रों२ पर खुदा हुआ है. दो से अधिक और ६ से कम पत्नों पर खुदे हुए तो कई एक मिल चुके हैं. कभी कभी ऐसे ताम्रपत्रों की एक तरफ़ के बाईं ओर के हाशिये पर या ऊपर पत्रांक भी खुदे मिलते हैं. जो दानपत्र दो या अधिक पत्रों पर खुदे रहते हैं उनका पहिला और अंत का पत्रा बहुधा एक ही ओर अर्थात् भीतर की तरफ़ से खुदा रहता है. ऐसे दानपत्रों के प्रत्येक पत्रे में यदि पंक्तियां कम लंबाई की हों तो एक, और अधिक लंबाई की हों तो दो, छेद होते हैं जिनमें तांबे की कड़ियां डाली जाती हैं जिनसे सब पत्रे एकत्र रहते हैं. कभी कभी ताम्रपत्रों को एकत्र रखनेवाली कड़ी की संधि पर तांबे का लोंदा लगा कर उसपर राजमुद्रा लगाई जाती थी३, जिसके साथ के लेख के अक्षर उभड़े हुए मिलते हैं. कभी कभी एक ही पत्ने पर खुदे हुए दानपत्र की बाईं ओर राजमुद्रा, जो अलग ढाली जा कर बनाई जाती थी, जुड़ी हुई मिलती है.४ कभी कभी राजमुद्रा पत्रे पर५ ही खोदी जाती थी, जिसके साथ कोई लेख नहीं होता. कितने एक ताम्रपत्रों के अंत में राजाओं के हस्ताक्षर खुदे हुए रहते हैं जिनसे उनके लेखनकला के ज्ञान का भी पता लगता है. ताम्रपत्र छोटे बड़े भिन्न भिन्न लंबाई चौड़ाई के पतले या मोटे पत्रों६ पर खुदवाये जाते थे जो तांबे के पाट को कूट कूट कर बनाये जाते थे. कई ताम्रपत्रों पर हथोड़ों की चोटों के निशान पाये जाते हैं. अब जो ताम्रपत्र बनते हैं वे तांबे की चद्दरों को काट कर उनपर ही खुदवाये जाने हैं. ताम्रपत्र खोदने में यदि कोई अशुद्धि हो जाती तो उस स्थान को कूट कर बराबर कर देते और फिर उसपर शुद्ध अक्षर खोद देते. ताम्रपत्रों पर भी शिलालेखों की तरह कुछ कुछ हाशिया छोड़ा जाता और कभी कभी किनारें ऊंची उठाई जाती थीं. दानपत्रों के अतिरिक्त कभी कोई राजाज्ञा७ अथवा स्तूप, मठ आदि बनाये जाने के लेख८ तथा ब्राह्मणों और जैनों के विविध यंत्र९ भी तांबे के त्रिकोण, गोल या चतुरस्र पत्त्रों पर खुदे हुए मिलते हैं. तांबे आदि के बरतनों पर उनके मालिकों के नाम खुदाये जाने की प्रथा भी प्राचीन है. कभी कभी तांबे के पत्त्रों पर पुस्तकें१ भी खुदवाई जाती थीं.

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१ ऐ. इं; जि. १२, पृ. १७१-८५.

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२ डॉ० बर्जेस संपादित 'तामिल ऐंड संस्कृत इन्स्क्रिप्शन्र्स,' पृ. २०६-१६.

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३ राजमुद्रा में राज्यचिह्न, किसी जानवर या देवता का सूचक होता है. भिन्न भिन्न वंशों के राज्यचिह्न भिन्न भिन्न मिलते हैं जैसे कि वलभी के राजाओं का नंदी, परमारों का गरुड, दक्षिण के चालुक्यों का वराह, सेनवंशियों का सदाशिव आदि.

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४ राजपूताना म्यूज़िअम् में रक्खे हुए प्रतिहार राजा भोजदेव के वि. सं. ९०० (ई. स. ८४३) के दानपत्र की बड़ी राजमुद्रा अलग बनाई जाकर ताम्रपत्र की बाईं ओर झाल कर जोड़ी है. प्रतिहार महेन्द्रपाल (प्रथम) और विनायकपाल के दानपत्रों की मुद्राऐं भी इसी तरह जुड़ी हुई होनी चाहियें (ई. पं; जि. १५, पृ. ११२ और १४० के पास के प्लेट. इन प्लेटों में मुद्रा की प्रतिकृति नहीं दी परंतु बाईं ओर जहां वह जुड़ी थी वह स्थान खाली पाया जाता है).

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५ मालवे के परमारों के दानपत्रों में राजमुद्रा बहुधा दूसरे पन्ने के बाईं ओर के नीचे के कोण पर लगी होती है.

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६ राजपूताना म्यूज़िअम् (अजमेर) में रक्खे हुए दानपत्रों में से सब से छोटा ४ १/२ इंच लंबा और ३ इंच चौड़ा है और तोल में १२ तोले है. सब से बड़ा प्रतिहार राजा भोजदेव का दौलतपुरे (जोधपुर राज्य में) से मिला हुआ मुद्रासहित २ फुट ५ १/२ इंच लंबा और १ फुट ४ इंच चौड़ा तथा तोल में १६ १/२ सेर (३६ १/२ पौंड) के करीब है: ये दोनों एक पत्रे पर ही खुदे हैं.

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७ सोहगौरा के ताम्रलेख में राजकीय आज्ञा है (ए. सो. बंगा. के प्रोसीडिंग्स ई. स. १८६४, प्लेट १).

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८ तक्षशिला के ताम्रलेख में क्षत्रप पतिक के बनाये बौद्ध स्तूप एवं मठ का उल्लेख है (ऐ. इं; जि. ४, पृ. ५४-५६).

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९ राजकोट के सुप्रसिद्ध स्वर्गीय वैद्य बावा मेहता के घर की देवपूजा में तांबे के कई एक छोटे बड़े यंत्र मेरे देखने में आये. मंगल का त्रिकोण यंत्र कई लोगों के यहां मिलता है. अजमेर के संभवनाथ के जैन (श्वेताम्बर) मंदिर में छोटी ढाल जैसा बड़ा एक गोल यंत्र रक्खा हुआ है, जिसको 'वीसस्थानक' का यंत्र कहते हैं.

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