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भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c30.s12.8

भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c30.s12.8

Language
Hindi

c30.s12.8

हुए किसी किसी दानपत्र के अक्षर इतने पतले हैं कि वे पहिले स्याही से लिखे गये हों ऐसा प्रतीत नहीं होता. संभव है कि तांबे के पत्नों पर पहिले मुलसानी मिट्टी या ऐसा ही कोई और पदार्थ पोतने के बाद दक्षिणी शैली के ताड़पत्रों की नांई उनपर तीखे गोल मुंह की लोहे की कलम से लेखक ने अक्षर बनाये हों जिनको खोदनेवाले कारीगर ने किसी तीक्ष्ण औज़ार से खोदा हो. उत्तरी हिंदुस्तान से मिलनेवाले दानपत्र बहुधा एक या दो पत्रों पर ही खुदे मिलते हैं परंतु दक्षिण से मिलनेवाले अधिक पत्रों पर भी खुदे हुए मिलते हैं, जैसे कि विजयनगर के वेंकटपतिदेव महाराज का मदुरा से मिला हुआ शक सं. १५०८ (ई. स. १५८६) का दानपत्र ६ पत्रों१ पर और हॉलैंड देश की लेडन युनिवर्सिटी (विश्वविद्यालय) के म्यूजिअम् में रक्खा हुआ राजेंद्रचोल के २१ वें राज्यवर्ष का दानपत्र २१ पत्रों२ पर खुदा हुआ है. दो से अधिक और ६ से कम पत्नों पर खुदे हुए तो कई एक मिल चुके हैं. कभी कभी ऐसे ताम्रपत्रों की एक तरफ़ के बाईं ओर के हाशिये पर या ऊपर पत्रांक भी खुदे मिलते हैं. जो दानपत्र दो या अधिक पत्रों पर खुदे रहते हैं उनका पहिला और अंत का पत्रा बहुधा एक ही ओर अर्थात् भीतर की तरफ़ से खुदा रहता है. ऐसे दानपत्रों के प्रत्येक पत्रे में यदि पंक्तियां कम लंबाई की हों तो एक, और अधिक लंबाई की हों तो दो, छेद होते हैं जिनमें तांबे की कड़ियां डाली जाती हैं जिनसे सब पत्रे एकत्र रहते हैं. कभी कभी ताम्रपत्रों को एकत्र रखनेवाली कड़ी की संधि पर तांबे का लोंदा लगा कर उसपर राजमुद्रा लगाई जाती थी३, जिसके साथ के लेख के अक्षर उभड़े हुए मिलते हैं. कभी कभी एक ही पत्ने पर खुदे हुए दानपत्र की बाईं ओर राजमुद्रा, जो अलग ढाली जा कर बनाई जाती थी, जुड़ी हुई मिलती है.४ कभी कभी राजमुद्रा पत्रे पर५ ही खोदी जाती थी, जिसके साथ कोई लेख नहीं होता. कितने एक ताम्रपत्रों के अंत में राजाओं के हस्ताक्षर खुदे हुए रहते हैं जिनसे उनके लेखनकला के ज्ञान का भी पता लगता है. ताम्रपत्र छोटे बड़े भिन्न भिन्न लंबाई चौड़ाई के पतले या मोटे पत्रों६ पर खुदवाये जाते थे जो तांबे के पाट को कूट कूट कर बनाये जाते थे. कई ताम्रपत्रों पर हथोड़ों की चोटों के निशान पाये जाते हैं. अब जो ताम्रपत्र बनते हैं वे तांबे की चद्दरों को काट कर उनपर ही खुदवाये जाने हैं. ताम्रपत्र खोदने में यदि कोई अशुद्धि हो जाती तो उस स्थान को कूट कर बराबर कर देते और फिर उसपर शुद्ध अक्षर खोद देते. ताम्रपत्रों पर भी शिलालेखों की तरह कुछ कुछ हाशिया छोड़ा जाता और कभी कभी किनारें ऊंची उठाई जाती थीं. दानपत्रों के अतिरिक्त कभी कोई राजाज्ञा७ अथवा स्तूप, मठ आदि बनाये जाने के लेख८ तथा ब्राह्मणों और जैनों के विविध यंत्र९ भी तांबे के त्रिकोण, गोल या चतुरस्र पत्त्रों पर खुदे हुए मिलते हैं. तांबे आदि के बरतनों पर उनके मालिकों के नाम खुदाये जाने की प्रथा भी प्राचीन है. कभी कभी तांबे के पत्त्रों पर पुस्तकें१ भी खुदवाई जाती थीं.