भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c30.s9: ईंट
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c30.s9
- Language
- Hindi
ईंट
c30.s9.1
बौद्ध लोग पत्थर की नांई मिट्टी की ईंटों पर भी अपने धर्मसंबंधी सूत्रों आदि को खुदवाते थे. मथुरा के म्यूज़ियम् में कितने एक बड़ी बड़ी ईंटों के टुकड़े रक्खे हुए हैं जिनकी मोटाई पर एक तरफ की लंबाई की ओर ई. स. पूर्व की पहिली शताब्दी के आसपास की लिपि में बड़े अक्षरों की एक एक पंक्ति खुदी हुई है. अनुमान होता है कि ये ईंटे दीवार आदि में एक पंक्ति में लगाई गई होंगी कि उनपर खुदा हुआ आशय क्रम से पढ़ा जावे. गोरखपुर ज़िले के गोपालपुर गांव से तीन ईंटें अखंडित और कुछ के टुकड़े मिले हैं जिनके दोनों ओर बौद्ध सूत्र खुदे हैं. ये ईंटें ११ १/२ से ६ १/२ इंच तक लंबी और ४ १/२ से ४ १/२ इंच तक चौड़ी हैं और उनकी एक ओर १२ से १० और दूसरी तरफ १२ से ६ तक पंक्तियां ई. स. की तीसरी या चौथी शताब्दी की लिपि में खुदी हुई हैं२. नैनीताल ज़िले के तराई परगने में काशीपुर के निकट के उज्जैन नामक प्राचीन क़िले से दो ईंटें मिली हैं जिनमें से एक पर ‘...त्तस्य राज्ञोः श्रीपृथिविमित्तस’ और दूसरी पर ‘राज्ञो मातृमित्तपुत्त’ लेख खुदा हुआ है३. ये लेख ई. स. की तीसरी शताब्दी के आसपास के होने चाहिये. कच्ची ईंटों पर लेख खोद लेने के बाद वे पकाई जाती थीं.
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१ स्फटिक के टुकड़े पर खुदा हुआ एक छोटा लेख भट्टिप्रोलु के स्तूप से मिला है (एं. इं; जि. २, पृ ३९८ के पास का प्लेट.)
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२ एशियाटिक सोसाइटी बंगाल के प्रोसीडिंग्ज़, ई. स. १८६६, पृ. १००-१०२. डें; बु. इं; पृ. १२२ के पास का प्लेट.
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३ इन लेखों की प्रतिकृतियां ई. स. १६०१ ता. ६ डिसंबर के ‘पायोनिअर’ नामक अलाहाबाद के दैनिक अंग्रेज़ी पत्र में प्रसिद्ध हुई थीं.
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ईंटों के अतिरिक्त कभी मिट्टी के पात्रों४ पर भी लेख खुदवाये जाते थे और मिट्टी के ढेलों पर भिन्न भिन्न पुरुषों, स्त्रियों आदि की मुद्राएं लगी हुई मिलती हैं, जिनके अक्षर उभड़े हुए होते हैं. पुरुषों की५ मुद्राओं के अतिरिक्त कितने एक ढेलों पर बौद्धों के धर्ममंत्र ‘ये धर्महेतुप्रभवा०’ की मुद्रा लगी हुई भी मिलती हैं. बरतन एवं ढेले लेख के खुदने और मुद्रा के लगने के बाद पकाये जाते थे.
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४ वलभीपुर (वळा, काठियावाड़ में) से मिले हुए मिट्टी के एक बड़े पात्र के टुकड़े पर ‘[२००] ४० ७ श्रीगुहसेनः घटा...’ लेख है (इं. ऐं; जि. १४, पृ. ७५). यह पात्र वलभी के राजा गुहसेन (दूसरे) के समय का गुप्त सं. २४७ (ई. स. ५६६-७) का होना चाहिये
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५ आ. स. रि; ई. स. १६०३-४, प्लेट ६०-६२.