भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c31.s1: १—सप्तर्षि संवत्
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c31.s1
- Language
- Hindi
१—सप्तर्षि संवत्
c31.s1.1
सप्तर्षि संवत् को लौकिककाल, लौकिक संवत्३, शास्त्र संवत्४, पहाड़ी संवत्५ या कच्चा संवत्६ भी कहते हैं. यह संवत् २७०० वर्ष का कल्पित चक्र है जिसके विषय में यह मान लिया गया है कि सप्तर्षि नाम के सात तारे अश्विनी से रेवती पर्यंत २७ नक्षत्रों में से प्रत्येक पर क्रमशः सौ सौ वर्ष तक रहते हैं७. २७०० वर्ष में एक चक्र पूरा हो कर दूसरे चक्र का प्रारंभ होता है. जहां जहां यह संवत् प्रचलित रहा या है वहां नक्षत्र का नाम नहीं लिखा जाता, केवल १ से १०० तक के वर्ष लिखे जाते हैं. १०० वर्ष पूरे होने पर शताब्द्दी का अंक छोड़ कर फिर एक से प्रारंभ करते हैं. कश्मीर के पंचांग८ तथा कितने एक पुस्तकों९ में कभी कभी प्रारंभ से भी वर्ष लिखे हुए मिलते हैं. कश्मीरवाले इस संवत् का प्रारंभ कलियुग
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१ 'संवत्' शब्द 'संवत्सर' शब्द का संक्षिप्त रूप है जिसका अर्थ 'वर्ष' है. कभी कभी इसके और भी संक्षिप्त रूप 'संव', 'सं,' या 'सव' और 'स' (प्राकृत लेखों में) मिलते हैं. संवत् शब्द को कोई कोई विक्रम संवत् का ही सूचक मानते हैं परंतु वास्तव में ऐसा नहीं है. यह शब्द केवल 'वर्ष' का सूचक होने से विक्रम संवत्, गुप्त संवत् आदि प्रत्येक संवत् के लिये आता है और कभी कभी इसके पूर्व उक्त संवतों के नाम भी (विक्रम संवत्, वलभी संवत् आदि) लिखे मिलते हैं. इसके स्थान में वर्ष, अब्द, काल, शक आदि इसी अर्थवाले शब्दों का भी प्रयोग होता है.
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२ सप्तर्षि नामक ७ तारों की कल्पित गति के साथ इसका संबंध माना गया है जिससे इसको 'सप्तर्षि संवत्' कहते हैं.
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३ कश्मीर आदि में शताब्दियों के अंकों को छोड़ कर ऊपर के वर्षों के अंक लिखने का लोगों में प्रचार होने के कारण इसको 'लौकिक संवत्' या 'लौकिक काल' कहते हैं.
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४ विद्वानों के शास्त्रसंबंधी ग्रंथों तथा ज्योतिःशास्त्र के पंचांगों में इसके लिखने का प्रचार होने से ही इसको शास्त्र संवत् कहते हैं.
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५ कश्मीर और पंजाब के पहाड़ी प्रदेश में प्रचलित होने से इसको पहाड़ी संवत् कहते हैं.
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६ इस संवत् के लिखने में शताब्दियों को छोड़ कर ऊपर के ही वर्ष लिखे जाने से इसे कच्चा संवत् कहते हैं.
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७ एकैकस्मिन्नृक्षे शतं शतं ते (मुनयः) चरन्ति वर्षाणाम् (वाराही संहिता, अध्याय १३, श्लोक ४). सप्तर्षीणां तु यौ पूर्वौ दृश्येते उदितौ दिवि। तयोस्तु मध्ये नक्षत्रं दृश्यते तत्समं निशि॥ तेनैत ऋषयो युक्तास्तिष्ठन्त्यब्दशतं नृणाम् (भागवत, स्कंध १२, अध्याय २, श्लोक २७-२८. विष्णुपुराण, अंश ४, अध्याय २४, श्लोक ५३-५४). पुराण और ज्योतिष के संहिताओं में सप्तर्षियों की इस प्रकार की गति लिखी है वह कल्पित है. 'सिद्धांततत्वविवेक' का कर्ता कमलाकर भट्ट भी ऐसी गति को स्वीकार नहीं करता (अद्यापि कैरपि नरैर्गतिरायर्सृष्टेर्नैव न यात्र कथिता किल संहितासु। तत्काव्यमेव हि पुराणवदत्र तज्ज्ञास्तेनैव तत्वविषयं गदितुं प्रवृत्ताः॥ (सिद्धांततत्वविवेक, भग्रहयुत्यधिकार, श्लोक ३२).
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८ श्रीसप्तर्षिचारानुमतेन संवत् ४९६६ तथा च संवत् ६६ चैत्रसुति १ श्रीशाकाः १७१५ करणागताव्दा(ब्दाः) १०२८ दिनगणाः ४१२०१० श्रीविक्रमादित्यसंवत् १६५० कल्पगताव्दा(ब्दाः) १६७२६४८८६४ शेषाव्दा(ब्दाः) २३४७०५११०६...कलेर्गतवर्षाणि ४८६४ शेषवर्षाणि ४२७१०६ (विक्रम संवत् १८५० का पंचांग, इं. ऍ.; जि. २०, पृ. १५०).
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९ सप्तर्षिः(र्षि)संवत् ४८५१ अ[श्वि]नयु[क्त]कृष्णसप्तमी मंगल(ल)वासरे(रे) (हस्तलिखित 'ध्वन्यालोक'; इं. ऍ; जि. २०, पृ. १५१).
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के २५ वर्ष पूरे होने पर१ (२६ वें वर्ष से) मानते हैं परंतु पुराण तथा ज्योतिष के ग्रंथों में इस का प्रचार कलियुग के पहिले से होना माना गया है२.
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(अ). 'राजतरंगिणी' में कल्हण पंडित लिखता है कि 'इस समय लौकिक [संवत्] के २४ वें (वर्तमान) वर्ष में शक संवत् के १०७० वर्ष बीत चुके हैं'३. इस हिसाब से वर्तमान४ लौकिक संवत् और गत शक संवत् के बीच का अंतर (१०७०-२४=) १०४६=४६ है. अर्थात् शताब्दी के अंकसहित सप्तर्षि संवत् में ४६ जोड़ने से शताब्दोरहित शक (गत), ८१ जोड़ने से चैत्रादि विक्रम (गत), २५ जोड़ने से कलियुग (गत) और २४ या २५ जोड़ने से ई. स. (वर्तमान) आता है.
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(आ). चंबा से मिले हुए एक लेख में विक्रम संवत् (गत) १७१७, शक संवत् १५८२ (गत) और शास्त्र संवत् ३६ वैशाख वति (वदि)५ १३ बुधवार६ लिखा है. इससे भी वर्तमान शास्त्र संवत् और [गत] विक्रम संवत् (१७१७-३६=१६८१=८१) तथा शक संवत् (१५८२-३६= १५४६=४६) के बीच का अंतर ऊपर लिखे अनुसार ही आता है.
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२ क; ई; ई; पृ. ४.
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४ सप्तर्षि संवत् के वर्ष वर्तमान और कलियुग, विक्रम तथा शक संवतों के वर्ष पंचांगों में गत लिखे रहते हैं. ता० १२ एप्रिल ई. स. १८९८ को जो चैत्रादि विक्रम संवत् १९५५ और शक संवत् १८२० प्रवेश हुआ उसको लोग वर्तमान मानते हैं. परंतु ज्योतिष के हिसाब से वह गत है, न कि वर्तमान. मद्रास इहाते के दक्षिणी विभाग में अबतक शक संवत् के वर्तमान वर्ष लिखे जाते हैं तो वहां का वर्ष बंबई इहाते तथा उत्तरी भारतवर्ष के पंचांगों के शक संवत् से एक वर्ष आगे रहता है.
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५ 'शुदि' (सुदि) और 'बदि' या 'वदि' का अर्थ शुक्लपक्ष और बहुल (कृष्ण) पक्ष माना जाता है परंतु वास्तव में इन शब्दों का अर्थ 'शुक्लपक्ष का दिन' और 'बहुल (कृष्ण) पक्ष का दिन' है. ये स्वयं शब्द नहीं हैं किंतु दो दो शब्दों के संक्षिप्त रूपों के संकेत मात्र हैं जिनको मिला कर लिखने से ही उनकी शब्दों में गणना हो गई है. प्राचीन लेखों में संवत्सर (संवत्), ऋतु, पक्ष और दिन या तिथि ये सब कभी कभी संक्षेप से भी लिखे जाते थे. जैसे संवत्सर के संक्षिप्त रूप संवत्, संव, सं आदि मिलते हैं (देखो, ऊपर पृ. १५६, टि. १) वैसे ही ग्रीष्मः (प्राकृत में गिम्हाण) का संक्षिप्त रूप 'ग्री', या 'गृ' और 'गि' (प्राकृत लेखों में); 'वर्षाः' का 'व'; 'हेमन्तः' का 'हे'; 'बहुलपक्ष' या 'बहुल' (कृष्ण) का 'ब'; 'शुक्लपक्ष' या 'शुक्ल' का 'शु'; 'दिवसे' का 'दि' और 'तिथि' का 'ति' मिलता है. 'बहुल' और 'दिवसे' के संक्षिप्त रूप 'ब' और 'दि' को मिला कर लिखने से 'बदि' और उससे 'वदि' (वबयोरैक्यम्) शब्द बन गया, ऐसे ही 'शुक्ल' के 'शु' और 'दिवसे' के 'दि' को साथ लिखने से 'शुदि' और उससे 'सुदि' ('श' के स्थान में 'स' लिखने से) बन गया. कश्मीरवाले 'दिवस' के स्थान में 'तिथि' शब्द का प्रयोग करते रहे जिससे उनके यहां बहुधा 'शुति' और 'वति' शब्द मिलते हैं. देहली के अशोक के स्तंभ पर अजमेर के चौहान राजा वीसलदेव (विग्रहराज) के तीन लेख खुदे हुए हैं जिनमें से दो संवत् १२२० वैशाख शुदि १५ के हैं. उन दोनों में 'शुति' खुदा है (संवत् १२२० वैशाखशुति १५. ई. एं; जि. १९, पृ. २१७-१८). व्याकरण के पिछले आचार्यों ने 'शुदि' और 'बदि' (वदि) शब्दों की उत्पत्ति न जान कर ही उनकी अव्ययों में गणना कर दी है. 'शुदि' या 'शुति' और 'बदि' या 'वति' (वति) के पीछे 'तिथि' शब्द (श्रावणशुदि पंचम्यां तिथौ) लिखना भी अशुद्ध है क्योंकि 'शुदि' और 'वदि' में तिथिसूचक 'दिवस' शब्द मौजूद है. केवल उप- र्युक्त शब्दों के ही संक्षिप्त रूप लेखादि में मिलते हैं ऐसा ही नहीं किंतु अनेक दूसरे शब्दों के भी संक्षिप्त रूप मिलते हैं, जैसे कि 'ठक्कुर' का 'ठ०' 'महन्तम' का 'महं०', श्रेष्टिन' का 'श्रे०', 'ज्ञातीय' या 'ज्ञाति' का 'ज्ञा०', 'उत' (पुत्र का प्राकृत रूप) का 'उ०' (इं. इं; जि. ८, पृ. २१६-२२) आदि अनेक. ऐसे संक्षिप्त रूपों के साथ कहीं कुंडल (०) लगाया मिलता है और कहीं नहीं भी.
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(इ). पूना के दक्षिण कॉलेज के पुस्तकालय में शारदा (कश्मीरी) लिपि का 'काशि- कावृत्ति' पुस्तक है जिसमें गत विक्रम संवत् १७१७ और सप्तर्षि संवत् ३६ पौष वति (वदि)
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१ कोलेर्गतेः सायकनेत्र(२५)वर्षैः सप्तर्षिवर्यास्त्रिदिवं प्रयाताः । लोके हि संवत्सरपत्रिकायां सप्तर्षिमानं प्रवदन्ति सन्तः ॥ (डॉ. बूलर की कश्मीर की रिपोर्ट; पृ. ६०).
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३ लौकिकाब्दे चतुर्विंशे शककालस्य सांप्रतम् । सप्तत्याम्यधिकं यातं सहस्त्रं परिवत्सराः (राजतरंगिणी, तरंग १, श्लोक ५२).
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६ श्रीमन्नृपतिविक्रमादित्यसंवत्सरे १७१७ श्रीशालिवाहनशके १५८२ श्रीशास्त्रसंवत्सरे ३६ वैशाख(ख)वदि त्रयोदश्यां बु(ध)वासरे मेषार्कसंक्रान्तौ (इं. पं; जि. २०, पृ. १५२).
c31.s1.21
३ रवि वार और तिष्य (पुष्य) नक्षत्र लिखा है.१ इससे भी सप्तर्षि और विक्रम संवत् के बीच का अंतर ऊपर लिखे अनुसार (१७१७-३६=१६८१=८१) ही आता है.
c31.s1.22
सप्तर्षि संवत् का प्रारंभ चैत्र शुक्ला १ से होता है और इसके महीने पूर्णिमांत हैं. इस संवत् के वर्ष बहुधा वर्तमान२ ही लिखे जाते हैं. प्राचीन काल में इस संवत् का प्रचार कश्मीर और पंजाब में था परंतु अब कश्मीर तथा उसके आस पास के पहाड़ी इलाकों में ही, विशेष कर ज्योतिषियों में, रह गया है.
Cites (8)
- Bhāgavatapurāṇa — Vyāsa, Sanskrit
- Rājataraṅgiṇī — Kalhaṇa, Sanskrit
- Bṛhatsaṃhitā — Varāhamihira, Sanskrit
- Dhvanyāloka — Ānandavardhana, Sanskrit
- Indian Antiquary
- Viṣṇupurāṇa — Vyāsa, Sanskrit
- Siddhāntatattvaviveka — Kamalākarabhaṭṭa 1633, Sanskrit
- Lucknow Museum copper-plate grant of the Mahasamanta Balavarmadeva — Sanskrit