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भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c31.s1.16

भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c31.s1.16

Language
Hindi

c31.s1.16

५ 'शुदि' (सुदि) और 'बदि' या 'वदि' का अर्थ शुक्लपक्ष और बहुल (कृष्ण) पक्ष माना जाता है परंतु वास्तव में इन शब्दों का अर्थ 'शुक्लपक्ष का दिन' और 'बहुल (कृष्ण) पक्ष का दिन' है. ये स्वयं शब्द नहीं हैं किंतु दो दो शब्दों के संक्षिप्त रूपों के संकेत मात्र हैं जिनको मिला कर लिखने से ही उनकी शब्दों में गणना हो गई है. प्राचीन लेखों में संवत्सर (संवत्), ऋतु, पक्ष और दिन या तिथि ये सब कभी कभी संक्षेप से भी लिखे जाते थे. जैसे संवत्सर के संक्षिप्त रूप संवत्, संव, सं आदि मिलते हैं (देखो, ऊपर पृ. १५६, टि. १) वैसे ही ग्रीष्मः (प्राकृत में गिम्हाण) का संक्षिप्त रूप 'ग्री', या 'गृ' और 'गि' (प्राकृत लेखों में); 'वर्षाः' का 'व'; 'हेमन्तः' का 'हे'; 'बहुलपक्ष' या 'बहुल' (कृष्ण) का 'ब'; 'शुक्लपक्ष' या 'शुक्ल' का 'शु'; 'दिवसे' का 'दि' और 'तिथि' का 'ति' मिलता है. 'बहुल' और 'दिवसे' के संक्षिप्त रूप 'ब' और 'दि' को मिला कर लिखने से 'बदि' और उससे 'वदि' (वबयोरैक्यम्) शब्द बन गया, ऐसे ही 'शुक्ल' के 'शु' और 'दिवसे' के 'दि' को साथ लिखने से 'शुदि' और उससे 'सुदि' ('श' के स्थान में 'स' लिखने से) बन गया. कश्मीरवाले 'दिवस' के स्थान में 'तिथि' शब्द का प्रयोग करते रहे जिससे उनके यहां बहुधा 'शुति' और 'वति' शब्द मिलते हैं. देहली के अशोक के स्तंभ पर अजमेर के चौहान राजा वीसलदेव (विग्रहराज) के तीन लेख खुदे हुए हैं जिनमें से दो संवत् १२२० वैशाख शुदि १५ के हैं. उन दोनों में 'शुति' खुदा है (संवत् १२२० वैशाखशुति १५. ई. एं; जि. १९, पृ. २१७-१८). व्याकरण के पिछले आचार्यों ने 'शुदि' और 'बदि' (वदि) शब्दों की उत्पत्ति न जान कर ही उनकी अव्ययों में गणना कर दी है. 'शुदि' या 'शुति' और 'बदि' या 'वति' (वति) के पीछे 'तिथि' शब्द (श्रावणशुदि पंचम्यां तिथौ) लिखना भी अशुद्ध है क्योंकि 'शुदि' और 'वदि' में तिथिसूचक 'दिवस' शब्द मौजूद है. केवल उप- र्युक्त शब्दों के ही संक्षिप्त रूप लेखादि में मिलते हैं ऐसा ही नहीं किंतु अनेक दूसरे शब्दों के भी संक्षिप्त रूप मिलते हैं, जैसे कि 'ठक्कुर' का 'ठ०' 'महन्तम' का 'महं०', श्रेष्टिन' का 'श्रे०', 'ज्ञातीय' या 'ज्ञाति' का 'ज्ञा०', 'उत' (पुत्र का प्राकृत रूप) का 'उ०' (इं. इं; जि. ८, पृ. २१६-२२) आदि अनेक. ऐसे संक्षिप्त रूपों के साथ कहीं कुंडल (०) लगाया मिलता है और कहीं नहीं भी.