भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c31.s10: १०—गुप्त संवत्
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c31.s10
- Language
- Hindi
१०—गुप्त संवत्
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इस संवत् के लिये शिलालेखादि में ‘गुप्तकाल’, ‘गुप्तवर्ष’६ आदि शब्द लिखे मिलते हैं जिससे पाया जाता है कि यह संवत् गुप्तवंशी किसी राजा ने चलाया हो. इस विषय का लिखित प्रमाण तो अब तक नहीं मिला, परंतु समुद्रगुप्त के अलाहाबाद के लेख में गुप्त वंश के पहिले दो राजाओं (गुप्त और घटोत्कच) के नामों के साथ केवल ‘महाराज’७ विरुद्ध और घटोत्कच के पुत्र चंद्रगुप्त (पहिले) के नाम के साथ ‘महाराजाधिराज’ विरुद्ध लिखा रहने तथा चंद्रगुप्त (प्रथम) के पौत्र और समुद्रगुप्त के पुत्र चंद्रगुप्त (दूसरे) के समय के गुप्त सं. ८२८ से ६३९ तक के शिलालेखों१० के मिलने से विद्वानों का यह अनुमान है कि गुप्तवंश में पहिले पहिल चंद्रगुप्त (पहिला) प्रतापी राजा हुआ हो और उसके राज्य पाने के समय से यह संवत् चला हो. गुप्तों के पीछे काठियावाड़ में वलभी के
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१ इं. ऐं; जि. १७, पृ. २१५. ऐं; जि. २, पृ. २६६.
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२ आश्विन शुक्ला १ से लगा कर माघ के प्रारंभ के आसपास तक अर्थात् जनवरी मास के लगने से पहिले के कुछ महीनों में ही ई. स. और वर्तमान कलचुरि संवत् का अंतर २४८ रहता है बाकी अधिकतर महीनों में २४६ रहता है.
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३ कन्हेरी से मिला हुआ ताम्रपत्र (केवंटैएल्स ऑफ वेस्टर्न इंडिया, पृ. ५८).
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६ संवत्सराणामधिके शते तु त्रिंशद्द्भिरन्यैरपि पञ्चभिरेव । शतौ दिने प्रौष्ठपदस्य पक्षे गुप्तप्रकाले गणनां विधाय ॥........वर्षशतेष्टाविंशे गुप्तानां काल....(गिरनार के पास के अशोक के लेखवाले चटान पर खुदे हुए स्कंदगुप्त के समय के लेख से. फ़्ली; गु. इं; पृ. ६०, ६१). मोरबी (काठियावाड़ में) से मिले हुए गुप्त संवत् ५८५ के दानपत्र में ‘पंचाशीत्या युतेतीते समानां शतपंचके । गोप्ते ददावदो नृपः सोपरागार्कंमंडले’ (इं. ऐं; जि. २, पृ. २५८). वर्षशते गुप्तानां सचतुःपंचाशदुत्तरे भूमिम् । शासति कुमारगुप्ते मासे ज्येष्ठे द्वितीयायाम् (सारनाथ से मिली हुई बुद्ध की मूर्ति के आसन पर का लेख. भं. कॉ. वॉ; पृ. २०३). गुप्तानां समतिक्रांते सप्तपंचाशदुत्तरे । शते समानां पृथिवीं बुधगुप्ते प्रशासति (सारनाथ से मिली हुई बुद्ध की मूर्ति के आसन पर का लेख. भं. कॉ. वॉ; पृ. २०३). परिव्राजक महाराज हस्तिन् के गुप्त संवत् १६१ के दानपत्र में ‘एकनवत्युत्तरेऽब्दशते गुप्तनृपराज्यभुक्तौ श्रीमत्ति प्रवर्द्धमानमहाचैत्रसंव(त्)त्सरे माघमासबहुलपंचदश्यान्तिथायाम्’ (फ्ली; गु. इं; पृ. १०७) लिखा मिलता है, और अल्बेरूनी अपने मूल अरबी पुस्तक में गुप्तकाल या ‘गुब्तकाल’ (=गुप्तकाल) ही लिखता है (फ्लो; गु. इं; भूमिका, पृ. २६, ३०).
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७ ‘विरुद्ध ‘महाराज’ का प्रयोग सामंत के लिये होता था. मेवाड़ के गुहिल राजा अपराजित के समय के वि. सं. ७१८ के लेख में उसको ‘राजा’ और उसके सेनापति वराहसिंह को ‘महाराज’ लिखा है (ऐं. इं; जि. ४, पृ. ३१), परंतु कन्नौज के प्रतिहारों के दानपत्रों में यही विरुद्ध उन प्रबल स्वतंत्र राजाओं के नामों के साथ लगा हुआ भी मिलता है (इं. ऐं; जि. १५. पृ. ११२, १४०; ऐं. इं; जि. ५, पृ. २११-१२).
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८ फ़्ली; गु. इं; पृ. २५.
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९ फ़्ली; गु. इं; पृ. ३१-३२.
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१० चंद्रगुप्त (दूसरे) का सब से पिछला शिलालेख गुप्त संवत् ६३ का और उसके पुत्र कुमारगुप्त (पहिले) का सब से पहिला शिलालेख गुप्त संवत् ६६ का मिला है, जिससे चंद्रगुप्त (दूसरे) के राज्य की समाप्ति गुप्त संवत् ६५ के आसपास होनी चाहिये. गुप्त संवत् का प्रारंभ चंद्रगुप्त (पहिले) के राज्य पाने के समय से मानने से उन तीन राजाओं (चंद्रगुप्त, समुद्रगुप्त और चंद्रगुप्त दूसरे) का राज्यत्वकाल करीब ६५ वर्ष मानना पड़ता है जो सरसरी तौर से देखनेवालों को अधिक प्रतीत होगा परंतु तीन राजाओं के लिये वह समय अधिक नहीं है क्योंकि अकबर, जहांगीर और शाहजहां इन तीन बादशाहों का राज्यत्वकाल १०२ (ई. स. १५५६-१६५८) वर्ष होता है.
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राज्य का उदय हुआ जिसके अस्त होने के पीछे वहांवालों ने गुप्त संवत् का ही नाम 'वलभी संवत्'१ रक्खा.
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अल्बेरूनी लिखता है कि 'वलभीपुर के राजा वलभ२ के नाम से उसका संवत् वलभी संवत् कहलाया. यह संवत् शक संवत् के २४१ वर्ष पीछे शुरू हुआ है. शक संवत् में से ६ का घन और ५ का वर्ग ( २१६ + २५ = २४१ ) घटाने से वलभी संवत् रह जाता है. गुप्तकाल के विषय में लोगों का कथन है कि गुप्त लोग दुष्ट [ और ] पराक्रमी थे और उनके नष्ट होने पर भी लोग उनका संवत् लिखते रहे. अनुमान होता है कि वलभ उन ( गुप्तों ) में से अंतिम था क्यों कि वलभी संवत् की नांई गुप्त संवत् का प्रारंभ भी शक काल से २४१ वर्ष पीछे होता है. श्रीहर्ष संवत् १४८८, विक्रम संवत् १०८८, शककाल ९५३ और वलभी तथा गुप्तकाल ७१२ ये सब परस्पर समान हैं'३. इससे विक्रम संवत् और गुप्तकाल का अंतर ( १०८८-७१२= ) ३७६ आता है अर्थात् गुप्त संवत् में ३७६ मिलाने से चैत्रादि विक्रम संवत्, २४१ मिलाने से शक संवत् और ३१९-२० मिलाने से ई. स. आता है.
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गुजरात के चौलुक्य अर्जुनदेव के समय के वेरावल ( काठियावाड़ में ) के एक शिलालेख में रसूल महंमद संवत् ( हिजरी सन् ) ६६२, विक्रम संवत् १३२०, वलभी संवत् ९४५ और सिंह संवत् १५१ आषाढ़ कृष्णा १३ रविवार लिखा है४. इस लेख के अनुसार विक्रम संवत् और वलभी ( गुप्त ) संवत् के बीच का अंतर ( १३२०-९४५= ) ३७५ आता है परंतु यह लेख काठियावाड़ का होने के कारण इसका विक्रम संवत् १३२० कार्तिकादि५ है जो चैत्रादि १३२१ होता है जिससे चैत्रादि विक्रम संवत् और गुप्त ( वलभी ) संवत् का अंतर ३७६ ही आता है जैसा कि ऊपर लिखा गया है. चैत्रादि पूर्णिमांत विक्रम संवत् और गुप्त ( वलभी ) संवत् का अंतर सर्वदा ३७६ वर्ष का और कार्तिकादि अमांत विक्रम संवत् और गुप्त ( वलभी ) संवत् का अंतर चैत्रशुक्ला १ से आश्विन कृष्णा अमावास्या तक ३७५ वर्ष का और कार्तिक शुक्ला १ से फाल्गुन कृष्णा अमावास्या तक ३७६ वर्ष का रहता है.
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२ अल्बेरूनी ने 'वलभी संवत्' को वलभीपुर के राजा वलभ का चलाया हुआ माना है और उक्त राजा को गुप्त वंश का अंतिम राजा बतलाया है परंतु ये दोनों कथन ठीक नहीं हैं क्योंकि उक्त संवत् के साथ जुड़ा हुआ 'वलभी' नाम उक्त नगर का सूचक है न कि वहां के राजा का, और न गुप्त वंश का अंतिम राजा वलभ था. संभव है कि गुप्त संवत् के प्रारंभ से ७०० से अधिक वर्ष पीछे के लेखक अल्बेरूनी को 'वलभी संवत्' कहलाने का ठीक ठीक हाल मालूम न होने के कारण उसने ऐसा लिख दिया हो अथवा उसको लोगों ने ऐसा ही कहा हो.
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३ सा; अ. इं; जि. २, पृ. ७. फ्लीं; गु. इं; भूमिका, पृ. ३०-३१.
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४ रसुलमहमदसंवत् ६६२ तथा श्रीमन्नृप[वि]क्रमसं १३२० तथा श्रीमद्वलभीसं ९४५ तथा श्रीसिंहसं १५१ वर्षे आषाढवदि १३ रवौ ( इं. ऐं; जि. ११, पृ. २४२ ).
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५ वेरावल के उक्त लेख के विक्रम संवत् को कार्तिकादि मानने का यह भी कारण है कि उसमें लिखा हुआ हिजरी सन् ६६२ चैत्रादि विक्रम संवत् १३२० मार्गशीर्ष शुक्ला २ को प्रारंभ हुआ था. अतएव हि. स. ६६२ में जो आषाढ़ मास आया वह चैत्रादि वि. सं. १३२१ ( कार्तिकादि १३२० ) का ही था.
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गुप्त संवत् का प्रारंभ चैत्र शुक्ला १ से और महीने पूर्णिमांत हैं. इस संवत् के वर्ष बहुधा गत लिखे मिलते हैं और जहां वर्तमान लिखा रहता है वहां एक वर्ष अधिक६ रहता है.
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१ काठिआवाड़ में गुप्त संवत् के स्थान में 'वलभी संवत्' लिखे जाने का पहिला उदाहरण ऊना गांव ( जूनागढ़ राज्य में ) से मिले हुए कन्नौज के प्रतिहार राजा महेंद्रपाल के चालुक्यवंशी सामंत बलवर्मन् के वलभी संवत् ५७४ ( ई. स. ८६४ ) माघ शुद्ध ६ के दानपत्र में मिलता है ( एं. इं; जि. ६, पृ. ६ ).
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६ खेडा से मिले हुए वलभी के राजा धरसेन ( चौथे ) के गुप्त संवत् ३३० के दानपत्र में उक्त संवत् में मार्गशिर मास अधिक होना लिखा है ( सं. ३०० ३० द्विमार्गगीशरशु २. इं. ऐं; जि. १५, पृ. ३४० ). गत गुप्त संवत् ३३० गत विक्रम संवत् ( ३३०+३७६= ) ७०६ के मुताबिक होता है. गत विक्रम संवत् ७०६ में कोई अधिक मास नहीं था परंतु वि. स. ७०५ में मध्यम मान से मार्गशिर मास अधिक आता है इस लिये उक्त ताम्रपत्र का गुप्त संवत् ३३० वर्तमान ( ३२६ गत ) होना चाहिये.
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पहिले यह संवत् नेपाल से काठियावाड़ तक चलता था. इसका अंतिम लेख वलभी (गुप्त) संवत् ६४५ (ई. स. १२६४) का मिला है जिसके पीछे इसका प्रचार बिलकुल ही उठ गया.