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भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c31.s12: १२—हर्ष संवत्

भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c31.s12

Language
Hindi

१२—हर्ष संवत्

c31.s12.1

यह संवत् थानेश्वर के बैसवंशी राजा हर्ष ( श्रीहर्ष, हर्षवर्द्धन, शीलादित्य ) के राज्यसिंहासन पर बैठने के समय से चला हुआ माना जाता है परंतु किसी लेख में इस संवत् के साथ हर्ष का नाम जुड़ा हुआ अब तक नहीं मिला. स्वयं राजा हर्ष के दोनों दानपत्रों में भी केवल 'संवत्' ही लिखा है१.

c31.s12.2

अलबेरूनी लिखता है कि 'मैने कश्मीर के एक पंचांग में पढ़ा है कि श्रीहर्ष विक्रमादित्य से ६६४ वर्ष पीछे हुआ२. यदि अलबेरूनी के इस कथन का अर्थ ऐसा समझा जावे कि विक्रम संवत् ६६४ से हर्ष संवत् का प्रारंभ हुआ है तो हर्ष संवत् में ६६३ जोड़ने से विक्रम संवत् तथा ६०६-७ जोड़ने से ईसवी सन् होगा.

c31.s12.3

नेपाल के राजा अंशुवर्मन् के लेख में संवत् ३४ प्रथम पौष शुक्ला २ लिखा है३. संभव है कि उक्त लेख का संवत् हर्ष संवत् हो. केंब्रिज के प्रोफेसर ऐडम्स और विएना के डॉक्टर थाम ने हर्ष संवत् ० = ई. स. ६०६ ( वि. संं. ६६३ ) मान कर गणित किया तो 'ब्रह्मसिद्धांत' के अनुसार ई. स. ६४० अर्थात् वि. सं. ६६७ में पौष मास अधिक आता है४. इससे भी वि. सं. और हर्ष संवत् के बीच का अंतर ( ६६७-३४= ) ६६३ तथा ई. स. और हर्ष संवत् का अंतर ६०६ आता है जैसा कि ऊपर बतलाया गया है. यह संवत् बहुधा संयुक्त प्रदेश तथा नेपाल में करीब ३०० वर्ष प्रचलित रह कर अस्त हो गया.

c31.s12.4

२ सा; अ. इं; जि. २, पृ. ५.

c31.s12.5

३ संवत् ३० ४ (=३४) प्रथमपौषशुक्लद्वितीयायाम् ( की; लि. इं. नॉ. इं; पृ. ७३, लेखसंख्या ५३० ).

c31.s12.6

अलबेरूनी ने विक्रम संवत् १०८८ के मुताबिक जिस श्रीहर्ष संवत् १४८८ का होना लिखा है ( देखो, ऊपर पृ. १७५ ) वह इस हर्ष संवत् से भिन्न होना चाहिये परंतु उसका प्रचलित होना किसी शिलालेख, दानपत्र या पुस्तक से पाया नहीं जाता.

c31.s12.7

१ बांसखेड़ा से मिले हुए राजा हर्ष के दान पत्र में 'संवत् २० २ (=२२) कात्ति[क]वदि १' ( एँ. इं; जि ४, पृ. २११ ) और मधुबन से मिले हुए दानपत्र में 'संवत् २० ५ (=२५) मार्गशीर्षवदि ६' ( ऍ. इं; जि. १, पृ. ७२ ) लिखा है.

c31.s12.8

४ इं. ऍ; जि. १५, पृ. ३३८.