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भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c31.s15.3

भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c31.s15.3

Language
Hindi

c31.s15.3

३ डॉ. भगवानलाल इंद्रजी को मिली हुई नेपाल की वंशावली में जयदेवमल्ल का नेवार (नेपाल) संवत् चलाना लिखा है परंतु जनरल कनिंगहाम लिखता है कि राजा राघवदेव ने ई. स. ८८० में नेपाल में यह संवत् प्रचलित किया (क; इं. ई; पृ. ७४). राघवदेव का नाम डॉ. भगवानलाल इंद्रजी की वंशावली तथा नेपाल के इतिहास के अंग्रेजी पुस्तकों में नहीं मिलता परंतु नेपाल के राजा जयस्थितिमल्ल (ई. स. १३८०-१३६४) के समय की लिखी हुई वंशावली की पुस्तक में जो प्रो. सेसिल बेंडाल को नेपाल से मिला, उक्त राजा का नाम मिलता है और नेपाल से मिले हुए हस्तलिखित संस्कृत पुस्तकों के अंत में मिलनेवाले वहां के राजाओं के नाम और संवतों को देखते हुए राघवदेव का यह संवत् चलाना अधिक \* शंकराचार्यप्रादुर्भावस्तु विक्रमार्कसमयादतीते पंचचत्वारिंशदधिकाष्टशतीमिते संवत्सरे केरलदेशे कालपीग्रामे....। तथा च संप्रदायविद आहुः। निधिनागेभवह्व्यब्दे विभवे मासि माधवे। शुक्ले तिथौ दशम्यां तु शंकराचार्योदयः स्मृतः ॥ इीत ३८८९। .... तथा च शंकरमंदारसौरभे नीलकंठभट्टा अपि एवमाहुः। प्रासूत तिष्यशरदाम् अतियातवत्याम् एकादशाधिकशतो नचतुःसहस्र्याम् । ३८८९ । (यज्ञेश्वर शास्त्री का 'आर्यविद्यासुधाकर' पृ. २२६, २२७). संभव प्रतीत होता है. राघवदेव ठाकुरी वंश (प्रथम) के राजा जयदेव का पूर्वज होना चाहिये. डॉ० भगवानलाल इंद्रजी को मिली हुई वंशावली में जयदेवमल्ल का ई. स. ८८० में विद्यमान होना लिखा है परंतु उसका ठीक समय ई. स. १२५२ और १२६० के बीच होना चाहिये.

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