भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c31.s21: २१—बार्हस्पत्य संवत्सर (१२ वर्ष का)
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c31.s21
- Language
- Hindi
२१—बार्हस्पत्य संवत्सर (१२ वर्ष का)
c31.s21.1
यह बार्हस्पत्य संवत्सर १२ वर्ष का चक्र है और इसका संबंध बृहस्पति की गति से है. इसके वर्षों के नाम कार्तिकादि १२ महीनों के अनुसार हैं परंतु कभी कभी महीनों के नाम के पहिले ‘महा’ लगाया जाता है जैसे कि ‘महाचैत्र’, ‘महावैशाख’ आदि.
c31.s21.2
सूर्य समीप आने से बृहस्पति अस्त हो कर जब सूर्य उससे आगे निकल जाता है तब (२५ से ३१ दिन के बाद) जिस नक्षत्र पर फिर वह (बृहस्पति) उदय होता है उस नक्षत्र के अनुसार संवत्सर (वर्ष) का नाम नीचे लिखे क्रम से रक्खा जाता है—
c31.s21.3
कृत्तिका या रोहिणी पर उदय हो तो महाकार्तिक (कार्तिक); मृगशिर या आर्द्रा पर महामार्गशीर्ष (मार्गशीर्ष); पुनर्वसु या पुष्य पर महापोष; आश्लेषा या मघा पर माहमाघ; पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी या हस्त पर महाफाल्गुन; चित्रा या स्वाति पर महाचैत्र; विशाखा या अनुराधा पर महावैशाख; ज्येष्ठा या मूल पर महाज्येष्ठ; पूर्वाषाढ़ा या उत्तराषाढा पर महाआषाढ; श्रवण या धनिष्ठा पर महाश्रावण; शतभिषा, पूर्वाभाद्रपदा या उत्तराभाद्रपदा पर महाभाद्रपद और रेवती, अश्विनी या भरणी पर उदय हो तो महाआश्वयुज (आश्विन) संवत्सर कहलाता है१. इस चक्र में १२ वर्षों में एक संवत्सर क्षय२ हो जाता हैं. प्राचीन शिलालेख और दानपत्रों में बार्हस्पत्य संवत्सर दिये हुए मिलते हैं,३ जो सब ई. स. की ७ वीं शताब्दी के पूर्व के हैं. उसके पीछे इस का प्रचार सामान्य व्यवहार से उठ गया और केवल पंचांगों में वर्ष का नाम४ बतलाने में ही रह गया जो अब तक चला जाता है.
c31.s21.4
४ पं. श्रीधर शिवलाल के वि. सं. १६७४ के पंचांग में 'वर्षनाम आश्विन' और १६७५ के पंचांग में 'वर्षनाम कार्तिक' लिखा है. ये वर्षनाम १२ बरसवाले बार्हस्पत्य संवत्सर के ही हैं.