भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c31.s28: २८—फसली सन्
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c31.s28
- Language
- Hindi
२८—फसली सन्
c31.s28.1
हिंदुस्तान में मुसल्मानों का राज्य होने पर हिजरी सन् उनका राजकीय सन् हुआ परंतु उसका वर्ष शुद्ध चांद्र होने के कारण सौर वर्ष से वह करीब ११ दिन छोटा होता है इससे महीनों एवं फसलों का परस्पर कुछ भी संबंध नहीं रहता. दोनों फसलों (रबी और खरीफ़) का हासिल नियत महीनों में लेने में सुभीता देख कर बादशाह अकबर ने हिजरी सन् ९७१ (ई. स. १५६३=वि. सं. १६२०) से यह सन् जारी किया. इसीसे इसको फसली सन् कहते हैं. सन् तो हिजरी (९७१) ही रक्खा गया परंतु महीने सौर (या चांद्रसौर) माने गये जिससे इसका वर्ष सौर (या चांद्रसौर) वर्ष के बराबर हो गया. अत एव फसली सन् भी शाहूर सन् की नांई हिजरी सन् का प्रकारांतर मात्र है. पहिले इस सन् का प्रचार पंजाब और संयुक्त प्रदेश में हुआ और पीछे से जब बंगाल आदि देश अकबर के राज्य में मिले तब से वहां भी इसका प्रचार हुआ. दक्षिण में इसका प्रचार शाहजहां बादशाह के समय में हुआ. अब तक यह सन् कुछ कुछ प्रचलित है परंतु भिन्न भिन्न हिस्सों में इसकी गणना में अंतर है.
c31.s28.2
पंजाब, संयुक्त प्रदेश तथा बंगाल में इसका प्रारंभ आश्विन कृष्णा १ (पूर्णिमांत) से माना जाता है जिससे इसमें ५६२-६३ मिलाने से ई. स. और ६४६-५० मिलाने से विक्रम संवत् बनता है.
c31.s28.3
दक्षिण में इसका प्रचार बादशाह शाहजहां के समय हिजरी सन् १०४६ (ई. स. १६३६=वि. सं. १६६३) से हुआ और वहां इसका प्रारंभ उसी सन् से गिना गया जिससे उत्तरी और दक्षिणी फसली सनों के बीच करीब सवा दो वर्ष का अंतर पड़ गया. बंबई इहाते में इसका प्रारंभ शाहूर सन् की नांई सूर्य के मृगशिर नक्षत्र पर आने के दिन से (तारीख ५, ६ या ७ जून से) माना जाता है और महीनों के नाम मुहर्रम आदि ही हैं. मद्रास इहाते में इस सन् का प्रारंभ पहिले तो आडि (कर्क) संक्रांति से ही होता रहा परंतु ई. स. १८०० के आसपास से तारीख १२ जुलाई से माना जाने लगा और ई. स. १८५५ से तारीख १ जुलाई से प्रारंभ स्थिर किया गया है. दक्षिण के फसली सन् में ५९०-६१ जोड़ने से ई. स. और ६४७-४८ जोड़ने से वि. सं. बनता है.