भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c31.s3: ३—वीरनिर्वाण संवत्
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c31.s3
- Language
- Hindi
३—वीरनिर्वाण संवत्
c31.s3.1
जैनों के अंतिम तीर्थंकर महावीर (वीर, वर्द्धमान) के निर्वाण (मोक्ष) से जो संवत् माना जाता है उसको 'वीरनिर्वाण संवत्' कहते हैं. उसका प्रचार बहुधा जैन ग्रंथों में मिलता है तो भी कभी कभी उसमें दिये हुए वर्ष शिलालेखों में भी मिल आते हैं.
c31.s3.2
(अ) श्वेतांबर मेरुतुंगसूरि ने अपने 'विचारश्रेणि' नामक पुस्तक में वीरनिर्वाण संवत् और विक्रम संवत् के बीच का अंतर ४७० दिया है१. इस हिसाब से विक्रम संवत् में ४७०, शक संवत् में ६०५ और ई. स. में ५२७ मिलाने से वीरनिर्वाण संवत् आता है.
c31.s3.3
(आ) श्वेतांबर अंबदेव उपाध्याय के शिष्य नेमिचंद्राचार्य रचित 'महावीरचरियं' नामक प्राकृत काव्य में लिखा है कि 'मेरे (महावीर के) निर्वाण से ६०५ वर्ष और ५ महीने बीतने पर शक्क राजा उत्पन्न होगा२. इससे भी वीरनिर्वाण संवत् और शक संवत् के बीच ठीक वही अंतर आता है जो ऊपर लिखा गया है.
c31.s3.4
२ छंहिं वासाणासएहिं पंचहिं वासेहिं पंचमासेहिं। मम निव्वुागयस्स उ उप्पज्जिस्सइ सगो राया॥ (महावीरचरियं). यह पुस्तक वि. सं. ११४१ (ई. स. १०८४) में बना था.
c31.s3.5
(इ) दिगंबर संप्रदाय के नेमिचंद्र रचित 'त्रिलोकसार' नामक पुस्तक में भी वीरनिर्वाण से ६०५ वर्ष और ५ महीने बाद शक राजा का होना लिखा है३. इससे पाया जाता है कि दिगंबर संप्रदाय के जैनों में भी पहिले वीरनिर्वाण और शक संवत् के बीच ६०५ वर्ष का अंतर होना स्वीकार किया जाता था जैसा कि श्वेतांबर संप्रदायवाले मानते हैं, परंतु 'त्रिलोकसार' के टीकाकार माधवचंद्र ने त्रिलोकसार में लिखे हुए 'शक' राजा को भूल से 'विक्रम'४ मान लिया जिससे कितने एक पिछले दिगंबर जैन लेखकों ने विक्रम संवत् से ६०५५ (शक संवत् से ७४०) वर्ष पूर्व वीरनिर्वाण होना मान लिया जो ठीक नहीं है. दिगंबर जैन लेखकों ने कहीं शक संवत् से ४६१, कहीं ६७६५ और कहीं १४७६३६ वर्ष पूर्व वीरनिर्वाण होना भी लिखा है परंतु ये मत स्वीकार योग्य नहीं हैं.
c31.s3.6
१ विक्रमरज्जारंभा परउ सिरिवीरनिव्वुई भणिया। सुन्न मुणिवेयजुत्तो विक्कमकालउ जिणकालो॥ विक्रमकालाज्जिनस्य वीरस्य कालो जिनकालः शून्यमुनिवेदयुक्तः चत्वारिशतानि सप्तत्यधिकवर्षाणि श्रीमन्महावीरविक्रमादित्ययोरंतरमित्यर्थः (विचारश्रेणि). यह पुस्तक ई. स. १३१० के आस पास बना था.
c31.s3.7
३ पणछस्सयवस्सं पणमासजुदं गमिअ वीरनिव्वुइदो सगराजो० (त्रिलोकसार, श्लो. ८४८). यह पुस्तक वि. सं. की ११ वीं शताब्दी में बना था. हरिवंशपुराण में भी वीरनिर्वाण से ६०५ वर्ष बीतने पर शक राजा का होना लिखा है और मेघर्नदि के श्रावकाचार में भी ऐसा ही लिखा है (इं. ऐं; जि. १२ पृ. २२).
c31.s3.8
४ श्रीवीरनाथनिर्वृत्तेः सकाशात् पंचोत्तरषट्छतवर्षाणि पञ्चमासयुतानि गत्वा पश्चात् विक्रमाङ्क शकराजोऽजायत (त्रिलोकसार के उपर्युक्त श्लोक की टीका).
c31.s3.9
५ दिगंबर जैनों के प्रसिद्ध तीर्थस्थान श्रवणबेल्गोला के एक लेख में वर्धमान(वीर) निर्वाण संवत् २४६३ में विक्रम संवत् १८८८ और शक संवत् १७५२ होना लिखा है जिसमें वीरनिर्वाण संवत् और विक्रम संवत् का अंतर ६०५ आता है (इं. ऐं; जि. २४, पृ. ३४६). इस अशुद्धि का कारण माधवचंद्र की अशुद्ध गणना का अनुसरण करना ही हो.
c31.s3.10
६ वीरजिणं सिद्धिगदे चउसदइगिसिढिवासपरिमाणो। कालंमि अदिक्कते उप्पण्णो एत्थ सगराओ॥ अथवा वीरे सिद्धे सहस्साणवक्कंमि सग(त)सयभहिये। पणासीदिंमि चेतादे पणमासे सगसिओ जादा (पाठान्तरं)॥ चोद्दससहस्ससग(त)सयतेणउदीवासकालविच्छेदे। वीरेसर- सिद्धीवो उप्पणणो सगणिग्रो अहवा (पाठान्तरं) ।। (त्रिलोकप्रज्ञप्ति—देखो, 'जैनहितैषी मासिक पत्र', भाग १३, अंक १२, दिसंबर १९१७, पृ. ५३३).
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- Indian Antiquary
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